आदिवासी कर रहे सामूहिक खेती

जगदलपुर : बस्तर की सामूहिक खेती की परम्परा जो प्राय: समाप्त हो गई थी अब पुन: जीवित हो रही है । क्योंकि सामूहिक खेती बंद होने के कारण छोटेमोटे किसान खेती नहीं कर पा रहें थे और उनकी खेती लगातार बंजर होती जा रही थी ।

जिला मुख्यालय से करीब 20 किमी दूर रायकोट इलाके का मटकोट गांव की आबादी करीब चार हजार के आसपास होगी। यहां के लोग लंबे समय से सामूहिक तौर पर बंजर जमीन को खेती करने के काबिल बना रहे हैं ।

गांव वालों की हमेशा कोशिश रही कि वे खेती जैसा काम एक साथ मिलकर करें लेंकिन एकजुटता के अभाव में यह काम नहीं हो पा रहा था । गांव के प्रमुख युवक बैठकर निर्णय लिया और अपने निर्णय से पूरे गांव को अवगत कराया । गांव वालों ने खेती का काम मिल जुलकर राजी हो गए और ढेड़ सौ से अधिक ग्रामीण सामूहिक खेती के लिए बंजर जमीन को समतल करने के लिए एकजुट हो गए ।

वे खेती जैसा काम मिलकर करें लेकिन इनके काम में पैसे और संसाधन बाधा बन रहे थे। गांव वालों की इस इच्छा की खबर गांव में तैनात डॉ. जेआर नेताम को लगी तो उन्होंने यह कहानी जिला प्रशासन के अफसरों तक पहुंचाई। इसके बाद अफसरोंं ने इसमें रुचि ली और इलाके में सामूहिक खेती के पहले प्रयास की शुरूआत हो गई।

अभी मटकोट गांव के 130 से ज्यादा लोग सामूहिक खेती के लिए जमीन समतल कर रहे हैं। रोजाना सुबह बड़ी संख्या में महिलाओं के अलावा पुरुष भी काम के लिए जुट रहे हैं। बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने उन्होंने 40 दिन का टारगेट तय किया है। 

बस्तर की आदिवासियों की परम्परा रही कि शुरू से ही सामूहिक खेती करते थे। एक-दूसरों के घरों के खेतों में सामूहिक खेती करने से गरीब किसान को भी इसकी मदद मिलती थी । पैसा और श्रम दोनों बचता था जो प्राय: लुप्त हो गया था अब यह ग्राम मटकोट में पुन: प्रारभ किया जा रहा है ।

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