जज मांगे जनता से न्याय

गुजरात विधानसभा चुनाव में मात खाने के बाद भी कांग्रेस- वाम गठजोड़ ने हार नहीं मानी है. कांग्रेस किसी भी तरह देश की सत्ता पर फिर से काबिज होना चाहती है. इसके लिए वह लोकतंत्र,समाज और देश की अखंडता के विरुद्ध कोई भी खतरनाक कदम उठाने से बाज नहीं आ रही. सुप्रीम कोर्ट का विवाद इसी कांग्रेस-वाम गठजोड़ लिखित पटकथा का मंचन है. यह राज उस दिन चंद घंटे बाद ही उजागर हो गया था जिस दिन सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने प्रेस कांफ्रेंस की. जजों के प्रेस कांफ्रेंस के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस की और संविधान विरुद्ध कदम उठाने वाले उन चारों जजों के प्रति सहानुभूति जताते हुए सीबीआई के विश्ोष जज लोया की मौत की जांच के लिए एसआईटी गठित करने की मांग कर दी. इसके कुछ देर बाद भाकपा नेता डी राजा भी प्रेस कांफ्रेंस करने वाले सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस चेलमेश्वर से उनके निवास पर मिलते नजर आए.जजों के प्रेस कांफ्रेंस के तुरंत बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस और डी राजा का जस्टिस चेलमेश्वर से मिलना इस बात का पुख्ता सबूत है कि सुप्रीम कोर्ट को अविश्वसनीय बनाने की यह पटकथा कांग्रेस-वाम गठजोड़ ने लिखी थी. इस पटकथा का उद्देश्य लोकतंत्र और देश की न्याय व्यवस्था को ध्वस्त करना है.

सुप्रीम कोर्ट के चारों जाजों ने प्रेस कांफ्रेंस में जो कहा वह भी कम गंभीर और चिंता की बात नहीं. इन जजों ने देश की सर्वोच्च अदालत के अन्य 21 जजों की ईमानदारी पर तो सवाल उठाया ही,यह कह कर कि अब जनता तय करे उसे क्या करना है , एक प्रकार से जनविद्रोह का आह्वान कर दिया. आजादी के बाद देश में ऐसा पहली बार हुआ. चारों जजों ने इस्तीफा देकर प्रेस कांफ्रेंस की होती तो मामला इतना गंभीर नहीं होता. बिना इस्तीफा दिए उनका ऐसा करना गंभीर अपराध है जिसकी सजा उन्हें उसी तरह मिलनी चाहिए जिस तरह लगभग ऐसे ही अपराध के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस कर्णन को दी गई थी. जस्टिस कर्णन को छह महीने के कारावास की सजा दी गई थी और सजा सुनाने वालों में प्रेस कांफ्रेंस करने वाले जज शामिल थे. जजों ने प्रेस कांफ्रेंस में जो कहा उससे यह लगता है कि वे जिन संवेदनशील मामलों की सुनवाई खुद करने की आस लगाए बैठे थे उनकी सुनवाई करने का अवसर उन्हें नहीं मिला. पहली बात तो यह कि मुकदमों की सुनवाई किस बेंच में होगी यह तय करना मुख्य न्यायाधीश का काम है. उनके इस अधिकार को चुनौती नहीं दी जा सकती. दूसरी बात यह कि किसी खास मामले की सुनवाई करने के लिए ये चारों जज परेशान क्यों थे? जाहिर है कुछ खास मामालों की सुनवाई किसी खास योजना के तहत ये करना चााहते थे जो सफल नहीं हो पाई. यह योजना कांग्रेस-वाम गठजोड़ ने बनाई थी. इस योजना का मकसद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मुश्किल में डाल कर देश की सरकार को अस्थिर करना था. सीबीआई के विशेष जज लोया सोहराबउद्दीन एनकाउंटर मामले की सुनवाई कर रहे थे जिसमें अमित शाह आरोपी हैं. जज लोया की नागपुर में हृदयाघात के कारण मौत हो गई थी. इसके बाद उनकी जगह जिस जज ने इस मामले की सुनवाई की उन्होंने अमित शाह को क्लीन चिट देते हुए केस खारिज कर दिया था. विपक्ष का आरोप है कि जज लोया की हत्या कराई गई ताकि अमित शाह को निर्दोष साबित किया जा सके. सुप्रीम कोर्ट के जजों की प्रेस कांफ्रेंस के पीछे जो योजना थी उसका मकसद राम मंदिर मुद्दे की सुनवाई लोकसभा चुनाव तक टालना भी शामिल है. असंतुष्ट जजों की शिकायत यही है कि कार्यावंटन में निष्पक्षता नहीं बरती जाती. प्रेस कांफ्रेस के बाद एक पत्रकार ने इसीलिए जस्टिस लोया ममाले के बारे में सवाल पूछा जिस पर जस्टिस रंजन गोगोई ने हामी भरते हुए कहा कि हां यह मामला भी है. इसके कुछ देर बाद राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस कर सुप्रीम कोर्ट पर दबाव बनाने के लिए जस्टिस लोया मामले की जांच एसआईटी से कराने की मांग कर दी. ये सारी ऐसी बातें हैं जो सुप्रीम कोर्ट के उन चारों जजों ,जो खुद को ईमानदार मानते हैं उनकी नीयत पर सवाल खड़े करती हैं. ऐसे जजों को अब एक क्षण भी न्याय की कुर्सी पर बैठने का अधिकार नहीं. वे अपना असंतोष राष्ट्रपति के पास जाकर रख सकते थे मगर ऐसा न कर वे सीधे जनता के बीच आ गए और जनविद्रोह का आह्वान कर दिया.

गुजरात विधान सभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दलितों और मराठों के बीच हिंसक संघर्ष और फिर दलितों की ओर से आयोजित महाराष्ट्र बंद का हिंसक हो जाना कांग्रेस-वामदल की इसी पटकथा का हिस्सा है. गुजरात में कांग्रेस ने विधान सभा चुनाव जीतने के लिए हर उन विघटनकारी शक्तियों का सहारा लिया जो देश में दलित और ओबीसी के मुद्दे पर आंदोलन कर रहे हैं. जिग्नेश मेवानी और हार्दिक पटेल इस तरह के आंदोलनों के मोहरे हैं जो विदेशी ताकतों के इशारे पर अपनी भूमिकाओं का निर्वाह भर कर रहे हैं.गुजरात चुनाव में परास्त होने के बाद इसीलिए जिग्नेश मेवानी महाराष्ट्र पहुंच गए जहां उन्हें भारत के टुकड़े-टुकड़े करने का सपना साकार करने में लगे गिरोह का साथ मिला. जिग्नेश का संबंध पोपुलर फ्रंट आफ इंडिया से है जिसे आइएसआइएस का भारतीय संस्करण माना जाता है.ध्यान रहे भीमा कोरेगांव में आयोजित दलित सम्मेलन में छात्र नेता उमर खालिद भी था जिसने जेएनयू में भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्ला, इंशा अल्ला और कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी ,जंग रहेगी के नारे लगाए थे. उस सम्मेलन में रोहित बेमुला की मां को भी बुलाया गया था. वाम दल रोहित बेमुला को दलित बताते रहे हैं जबकि वह अन्य पिछड़ी जाति का था. उसकी आत्महत्या का दोष केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर मढ़ा जा रहा है जबकि कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है. भीमा कोरेगांव में जो दलित सम्मेलन हुआ, जिसमें लगभग तीन लाख लोग शामिल हुए वह विघटनकारियों के एक बड़े आंदोलन के षडयंत्र का हिस्सा था. उसी षडयंत्र के तहत सम्मेलन के दूसरे दिन महाराष्ट्र बंद का आयोजन किया गया जिसमें बड़े पैमाने पर हिंसा हुई. मूल बात यह है कि कांग्रेस किसी भी सूरत में केंद्र की सत्ता पर काबिज होना चाहती है. इसके लिए वह कुछ भी कर सकती है. देश के टुकड़े हो जाएं, समाज में दंगा-फसाद हो जाए ,चाहे जो भी हो कांग्रेसियों को इसकी परवाह नहीं.उन्हें सिर्फ देश पर राज करने का अवसर मिलना चाहिए.

महाराष्ट्र बंद के बाद जिग्नेश मेवानी जब दिल्ली के प्रेस क्लब में प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे उस समय वहां प्रेस कांफ्रेंस में उनके साथ राहुल गांधी का एक खास सहायक उपस्थित था. रिपब्लिक चैनल के संवाददाता ने जब उसे देखा तो पूछा- आप यहां कैसे आए सर… राहुल जी ने यह कांफे्रस आयोजित कराई है क्या? इतना सुनते ही वह व्यक्ति वहां से भाग खड़ा हुआ. संवाददाता उसके पीछे-पीछे दौड़ा,उससे सवाल करता रहा मगर वह भागता रहा और अपनी गाड़ी वहीं छोड़ एक आटो पर बैठकर भाग गया. उस प्रेस कांफ्रेंस में जिग्नेश मेवानी ने 09 जनवरी को दिल्ली में प्रदर्शन करने का एलान किया. इस प्रदर्शन में माले की छात्र इकाई आइसा शामिल थी. आइसा के नेता ने फेसबुक पर इस प्रदर्शन में लोगों से शामिल होने की खुली अपील की थी. पुलिस ने प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी फिर भी मेवानी ने प्रदर्शन किया. इन सभी तथ्यों पर गौर करने पर यह हकीकत बेपर्दा हो जाती है कि जिग्नेश मेवानी ,उमर खालिद और हार्दिक पटेल कांग्रेस के चुनावी मोहरे हैं. याद रहे जब जेएनयू में उमर खालिद और कन्हैया कुमार ने देश के टुकड़े करने के नारे लगाने वालों के साथ प्रदर्शन किया था और विरोध करने पर उनके खिलाफ सरकार ने कार्रवाई की तो राहुल गांधी वामपंथी नेताओं के साथ जेएनयू जाकर ऐसे अलगाववादी छात्रों के पक्ष में खड़े हो गए थे. इस समय वही अलगाववादी कांग्रेस के साथ नजर आ रहे हैं. अंत में यह उममीद की जानी चाहिए प्रेस कांफ्रेस करने वाले जजों को सद्बुदिध आएगी और सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा बनी रहेगी. यही देश और लोकतंत्र के हित में है.

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