फल-फूल रहा है फॉरेंसिक ऑडिट कारोबार

► ऑडिट कंपनियां, जांच एजेंसियां आईबीसी से संबंधित फॉरेंसिक कार्य में जुटी हुर्ई हैं
► आईबीसी से जुड़ा व्यवसाय पिछले कुछ महीनों में हो गया है दोगुना
► बड़ी अकाउंटिंग कंपनियों को दोहरा फायदा, वे बतौर इनसॉल्वेंसी प्रोफेशनल भी कर रही हैं कार्य
► संशोधित आईबीसी के तहत संबद्घ पक्षों की परिभाषा से आईआरपी, ऋणदाताओं की समिति पर बढ़ी है जिम्मेदारी
► परिसंपत्तियां अक्सर प्रतिनिधि मालिकों के तौर पर दिखाई जाती हैं और इन्हें फिर से प्रवर्तकों से नहीं जोड़ा जा सकता
► तरजीही और कम मूल्य वाले लेनदेन जांच के दायरे में

बड़ी ऑडिट कंपनियों और स्वतंत्र जांच एजेंसियों के फॉरेंसिक विभागों में मौजूदा समय में फॉरेंसिक कार्य के लिए बड़े पैमाने पर अनुरोध आ रहे हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि इनसॉल्वेंसी ऐंड बैंगक्रप्टसी कोड (आईबीसी) के तहत फंसे कर्ज से छुटकारा पाने के लिए कंपनियां फॉरेंसिक कार्य पर जोर दे रही हैं।

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कुछ अनुमानों के अनुसार आईबीसी से संबंधित फॉरेंसिक व्यवसाय पिछले कुछ महीनों में दोगुना हो गया है और विश्लेषकों का मानना है कि इसमें अभी और इजाफा होने की संभावना है। इस कार्य में मुख्य रूप से प्रवर्तकों की पृष्ठभूमि की जांच, परिसंपत्तियों की जांच, ऋणदाताओं का सत्यापन, और नकदी प्रवाह की फॉरेंसिक निगरानी आदि शामिल हैं। बड़ी अकाउंटिंग कंपनियों के लिए, यह अच्छे मुनाफे का सौदा है क्योंकि वे इनसॉल्वेंसी पेशेवरों के तौर पर पहले से ही बैंगक्रप्टसी पर काम कर रही हैं।

प्रवर्तकों की पृष्ठभूमि की जांच में इनसॉल्वेंसी ऐंड बैंगक्रप्टसी कोड (आईबीसी) में ताजा संशोधन के बाद तेजी आई है। यह बदलाव इन चिंताओं से पैदा हुआ है कि प्रवर्तक या उनके सहयोगी प्रॉक्सी निवेशकों के जरिये कम मूल्य पर कंपनियों क पुनर्खरीद कर सकते हैं। यह खासकर उस मामले में सही है जब बोलीदाता वैश्विक कंपनी हों या गैर-संबंध उद्योग से आते हों। क्रॉल की प्रबंध निदेशक एवं प्रमुख (दक्षिण एशिया) रेशमी खुराना कहती हैं, ‘हमसे ज्यादातर मामलों में बोलीदाता की पृष्ठभूमि और संपर्कों की जांच करने को कहा जा रहा है। बोलीदाताओं की पृष्ठभूमि, उनके इरादे, फंड के स्रोत और पिछले रिकॉर्ड आदि की जांच खरीदार का चयन करने के संदर्भ में बैंकों के लिए बेहद जरूरी हो गई है।’

विश्लेषकों का कहना है कि संशोधित आईबीसी के तहत संबंधित पक्षों की परिभाषा काफी जटिल है और इसका सार यह है कि अब इनसॉल्वेंसी प्रोफेशनल और ऋणदाताओं की समिति द्वारा शर्तों का पालन किया जा रहा है और जरूरी जांच की जा रही है। विश्लेषकों के अनुसार, पिछले समय में ऐसे मामले सामने आए कि पृष्ठभूमि की जांच से मुखौटा कंपनियों के जरिये बड़े कोष को बेईमानी से निकाले जाने का पता लगाने में मदद मिली।

डिफॉल्ट के मामले में, प्रवर्तकों के लिए उस स्थिति में दिवालिया का दावा करना नई बात नहीं है, जब बैंक प्रवर्तकों को पर्सनल गारंटी के लिए बाध्य करते हैं। गैर-घोषित परिसंपत्तियां बैंकों द्वारा जब्त की जा सकती हैं, साथ ही अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी परिसंपत्तियों का भी ऐसी कंपनियों पर पुन: भुगतान का दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए, बैंकों के लिए दबाव से जूझ रही कंपनियों और उनके प्रवर्तकों की छिपी हुई परिसंपत्तियों की पहचान करना भी जरूरी हो गया है। छिपी हुई संपत्तियों की पहचान करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है क्योंकि ये परिसंपत्तियां अक्सर प्रतिनिधि मालिकों के जरिये रखी जाती हैं, जिन्हें प्रवर्तकों से नहीं जोड़ा जा सकता है। प्रॉक्सी यानी प्रतिनिधि मालिकों में मौजूदा और पूर्व कर्मचारी, प्रवर्तक के नजदीक के विश्वस्त और नाबालिक बच्चे या बुजुर्ग माता-पिता भी शामिल हो सकते हैं।

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