सैटेलाइट को मिलेगी स्वदेशी उड़ान, मिसाइल भी पहुंचेगी ठिकाने पर

नई दिल्ली : बड़े और ताकतवर देश अब भारत को उस चिप के लिए शर्ते नहीं गिनवाएंगे जो सैटेलाइट को दिशा दिखाती है और मिसाइल को लक्ष्य। इसरो को इसके लिए अब अन्य देशों पर निर्भर रह तीन से चार साल तक का इंतजार नहीं करना होगा। यह मजबूरी भी नहीं होगी कि चिप चाहिए तो सैटेलाइट का एक हिस्सा भी खरीदो। अब आईआईटी मंडी में स्वदेशी चिप बनेगी।

इसरो के प्रोजेक्ट पर आईआईटी मंडी में काम शुरू हो गया है। दरअसल, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ( इसरो) के लिए एएसआईसी चिप अब मेक इन इंडिया के तहत भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी, हिमाचल प्रदेश में बनेंगी। इसरो ने स्कूल आॅफ कंप्यूटिंग एंड इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग को आधुनिक तकनीक पर आधारित स्वदेशी चिप बनाने के लिए प्रोजेक्ट सौंपा है। आईआईटी के विशेषज्ञ डॉ. सतिंद्र कुमार शर्मा, डॉ. हितेश श्रीमाली व डॉ. राहुल श्रेष्ठा ने चिप पर काम शुरू कर दिया है।

भारतीय चिप की जरूरत क्यों
-एएसआईसी चिप के लिए इसरो विदेशी कंपनियों पर निर्भर है।
-भारत आगे न निकल जाए, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, रूस व चीन जैसे देश कई तरह का अड़चने डालते हैं।
-चिप मिलने में तीन से चार साल तक का समय लगता है।
-कई बार विदेशी कंपनियां चिप के बजाय सैटेलाइट का पूरा हिस्सा जबरन बेचती हैं।

क्या है एएसआईसी चिप
एप्लिकेशन स्पेशल इंटीग्रेटिड सर्किट (एएसआईसी) एक माइक्रो चिप है। यह सिस्टम को आॅन करने व उसे दिशा दिखाने का काम करती है। सैटेलाइट को लॉन्च करने में एएसआईसी चिप की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसमें एंप्लीफायर, फिल्टर व एनालॉग डिजिटल सर्किट होते हैं, जो जाइरोस्कोप में लगे सेंसर को संचालित कर सैटेलाइट को सही दिशा दिखा उसे तय केंद्र में स्थापित करने में मदद करते हैं। मिसाइल अपने लक्ष्य पर खरी उतरे उसमें भी एएसआईसी चिप की अहम भूमिका रहती है। जाइरोस्कोप एक दूरदर्शी यंत्र है, जो वस्तु की कोणीय स्थिति (झुकाव) को मापने के काम आता है।

बहुत ही छोटी लेकिन बड़े काम की
-180 नैनोमीटर की चिप बनेगी शुरूआती चरण में।
-65 नैनोमीटर तक होगा बाद में आकार।
-चिप की डिजाइन से लेकर फैब्रीकेशन तक, सब मंडी में होगा।
-20 नैनो मीटर की चिप अमेरिकी कंपनी इंटेल के लिए पहले ही बना चुकी है यह टीम।

भारतीय उपग्रह कार्यक्रम में आएगी क्रांति
मेक इंन इंडिया के तहत आईआईटी मंडी में एएसआईसी चिप का निर्माण होगा। चिप के लिए विदेशी निर्भरता खत्म हो जाएगी। विदेश से मिलने वाली चिप के मुकाबले स्वेदशी चिप सस्ती व ज्यादा कारगर होगी। इस पर शोध शुरू हो गया है। चिप बनने से सैटेलाइट के क्षेत्र में देश में एक नई क्रांति आएगी। मंगल व अन्य ग्रह तक पहुंचने वाले सैटेलाइट बनाने में भी आसानी होगी।
-डॉ. सतिंद्र कुमार शर्मा, एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईटी मंडी

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