तेंदूपत्ता संग्राहकों को 02 अरब 38 करोड़ 26 लाख रूपये का भुगतान

न्यूनतम समर्थन मूल्य पर लघु वनोपज खरीदी में संग्राहकों को 18 करोड़ 55 लाख रूपये का भुगतान

उत्तर बस्तर कांकेर 24 सितम्बर 2021: छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा बीते ढाई सालों में वनवासियों एवं लघु वनोपज संग्राहकों के जीवन में बदलाव लाने के क्रांतिकारी फैसलों ने औने-पौने दाम में बिकने वाले लघु वनोपज को अब मूल्यवान बना दिया है, जिसका सीधा लाभ यहां के वनोपज संग्राहकों को मिलने लगा है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ राज्य आज लघु वनोपज के संग्रहण के मामले में देश का अव्वल राज्य बन गया है। देश का 73 प्रतिशत वनोपज क्रय कर छत्तीसगढ़ राज्य में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। छत्तीसगढ़ देश का एक मात्र राज्य है, जहां 52 प्रकार के लघु वनोपज को समर्थन मूल्य पर क्रय किया जा रहा है, इससे वनवासियों एवं वनोपज संग्राहकों को सीधा लाभ मिल रहा है। कांकेर जिले में ईमली, महुआ, टोरा, चिरौंजी, कुसुमी लाख, रंगीनी लाख, हर्रा, बेहड़ा, सालबीज, कचरिया इत्यादि लघु वनोपज का संग्रहण किया जाता है।

लघु वनोपज की खरीदी महिला स्व-सहायता समूह के माध्यम से किया जा रहा है, इससे संग्राहकों के साथ-साथ महिला स्व-सहायता समूह को भी रोजगार के अवसर प्राप्त हो रहे हैं। कांकेर जिले में वर्ष 2019 से 2021 तक 06 लाख 42 हजार 589 क्विंटल लघु वनोपज की खरीदी की गई है, जिसके लिए संग्राहकों को 18 करोड़ 55 लाख 77 हजार रूपये का भुगतान किया गया है। इसी अवधि में सरकार द्वारा कांकेर जिले में 05 लाख 95 हजार 661 मानक बोरा तेंदूपत्ता की खरीदी 04 हजार प्रति मानक बोरा की दर से खरीदा गया, जिसके लिए संग्राहकों को 02 अरब 38 करोड़ 26 लाख 49 हजार रूपये का भुगतान किया गया है।

प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की विशेष पहल पर वनोपज संग्राहकों को उनकी मेहनत का वाजिब दाम दिलाने के लए लघु वनोपज के क्रय मूल्य में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ तेंदूपत्ता संग्रहण की दर को 2500 रूपये प्रति मानक बोरा से बढ़ाकर सीधे 04 हजार रूपये प्रति मानक बोरा किया गया, साथ ही महुआ के समर्थन मूल्य को 17 रूपये से बढ़ाकर 30 रूपये प्रति किलोग्राम, ईमली 25 रूपये से बढ़ाकर 36 रूपये, चिरौंजी गुठली 93 रूपये से बढ़ाकर 126 रूपये प्रति किलो की दर से समर्थन मूल्य पर क्रय की जाने लगी है। इसका सीधा लाभ ग्रामीण संग्राहक परिवारों को प्राप्त हो रहा है। अन्य वनोपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने और खरीदी की व्यवस्था करने से ग्रामीणों को अतिरिक्त लाभ होने लगा है।

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