11 महीने में 132 HIV पीड़ित बनीं मां

122 के बच्चे निगेटिव

रायपुर।

प्रदेश में एचआइवी पीड़ितों की संख्या 31 हजार जा पहुंची है। कहने को तो यह आंकड़ा बहुत बड़ा है, लेकिन यह सजगता को भी दर्शाता है। व्यक्ति एचआइवी को लेकर जागरूक हुए हैं, अस्पताल पहुंचकर जांच करवा रहे हैं। 2018 में 132 एचआइवी पीड़ित महिलाएं मां बनीं। इनमें से 122 के बच्चे पूरी तरह से सामान्य हैं, एचआइवी निगेटिव है। हालांकि होल ब्लड की जांच रिपोर्ट जन्म के 18 महीने बाद होगी, तब एचआइवी निगेटिव पर पूरी तरह से मुहर लगेगी।

एचआईवी पॉजिटिव गर्भवती महिला के बच्चों को एचआइवी वायरस से बचाने के लिए निर्धारित समय में नेवरापिन टेबलेट दी जाती है। जन्म के बाद नवजात शिशु में एचआइवी वायरस है या नहीं, इसकी जांच के लिए ड्राय ब्लड सैंपल (डीबीएस) लेकर कोलकाता लैब भेजा जाता है।

यह जांच डेढ़ माह, छह माह, एक साल और 18 माह में होती है। अधिकांश बच्चों की डेढ़ माह और छह माह की जांच हो चुकी है, ये सभी सेफ हैं। एचआइवी पीड़ित गर्भवती की डिलीवरी मेडिकल कॉलेजों में होती है, जहां स्त्री रोग विभाग तमाम मानकों को पूरा करता है।

इन वजहों से होता है एचआइवी संक्रमण

असुरक्षित यौन संबंधों से- अब स्थिति में बदलाव आया है। लोग जागरूक हुए हैं और कंडोम का इस्तेमाल कर रहे हैं। आज से पांच साल पहले कंडोम को लेकर जो झिझक थी, वह खत्म हो गई है। इसे लेकर लोग खुलकर बात कर रहे हैं।

संक्रमित खून चढ़ाए जाने से- ब्लड डोनेशन से पहले ब्लड की जांच अनिवार्य कर दी गई है। अगर वह संक्रमित है तो उसे डिस्कार्ड कर दिया जाता है।

एचआइवी पॉजिटिव मां से जन्मे बच्चे को- गर्भवती मां को ऐसी दवाइयां दी जाती हैं कि बच्चा सुरक्षित रहे यानी संक्रमण मुक्त। दवा के अच्छे परिणाम हैं और दवाएं नॉको द्वारा मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में उपलब्ध करवाई जा रही है।

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