मध्यप्रदेश

अशोक गहलोत सरकार के 2 साल, कितना काम, कितना बवाल, पढ़िए पूरा विश्लेषण

बावजूद इसके सरकार के इस साल को काम की बजाय बवाल के लिए ज्यादा याद रखा जाएगा।

जयपुर। राजस्थान विधानसभा चुनाव 2018 जीतकर सत्ता में वापसी के बाद 17 दिसम्बर को अशोक गहलोत सरकार की दूसरी सालगिरह थी। प्रदेश की जनता को गहलोत सरकार के काफी उम्मीदें थीं। सरकार ने भी उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश जरूर की। बावजूद इसके सरकार के इस साल को काम की बजाय बवाल के लिए ज्यादा याद रखा जाएगा।

होटलों में कैद रही गहलोत सरकार

राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार के दूसरे कार्याकाल में सड़क से लेकर सदन तक ऐसा बवाल मचा कि कई दिनों तक पूरी सरकार होटल में कैद रहीा। कार्यकाल का दूसरा साल शुरू होते ही सरकार कोटा के जेके लोन अस्पताल में बच्चों की मौत को लेकर कटघरे में खड़ी थी। ठीक एक साल पहले दिसंबर का ही महीना था। गहलोत सरकार एक तरफ पहली सालगिरह का जश्न मनाने की तैयारी कर रही थी।

कोटा बच्चों की मौत का मामला

दूसरी ओर कोटा में मरने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। इस घटना ने गहलोत सरकार को झकझोर कर रख दिया। देशभर के मीडिया में बच्चों की मौत की खबर सुर्खियां बनीं और सरकार के लिए जवाब देना मुश्किल हो गया था। विरोधी तो विरोधी सरकार के अपने भी जवाब मांगने लगे। तत्कालीन डिप्टी सीएम सचिन पायलट ने तो इस घटना के लिए सीधे-सीधे चिकित्सा मंत्री डॉ. रघु शर्मा की जवाबदेही तय करने की बात कह दी। गहलोत सरकार कार्यकाल के दूसरे साल के करीब 10 महीने कोरोना संकट में गुजर गए।

भाजपा ने मनाया काला दिवस

महीनेभर से ज्यादा सरकार खुद बाड़ेबंदी में बैठी रही। बाकी बचे दिनों में कितना काम हुआ होगा। इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि सरकार का दावा है कि उसने चुनाव में किए आधे से ज्यादा वादे पूरे कर दिए हैं। वहीं, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया का आरोप है कि सरकार ने एक भी वादा पूरा नहीं किया है। लिहाजा बीजेपी इसे काले दिन के रूर में मना रही है।

अशोक गहलोत ने दिखाई सियासी जादूगरी

बता दें कि वैसे तो मौजूदा साल में कोरोना संकट हावी रहा। लेकिन राजस्थान सरकार के लिए इससे भी बड़ा एक संकट आया जब पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट और उनके करीबी विधायकों ने गहलोत को कुर्सी से हटाने के लिए विद्रोह कर दिया। उस वक्त ऐसा लगने लगा था कि सरकार किसी भी वक्त गिर सकती है, लेकिन राजनीति के जादूगर गहलोत आसानी से सरकार बचाने में कामयाब रहे।

इन घटनाओं ने भी बढ़ाई गहलोत सरकार की मुश्किल

इसके बाद डूंगरपुर हिंसा और बारां गैंगरेप केस ने गहलोत सरकार की खूब किरकिरी करवाई। शिक्षक भर्ती को लेकर डूंगरपुर में कई दिन तक हिंसा का तांडव चला। करोड़ों रुपए की निजी और सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान हुआ। इसके बाद बारां जिले में दो सगी बहनों के साथ गैंगरेप की घटना हुई। जिसको लेकर बीजेपी ने गहलोत सरकार को कटघटे में खड़ा किया।

नगर निगम चुनाव में मिली थोड़ी राहत

तमाम दुश्वारियों के बीच 3 शहरों के 6 नगर निगमों में चुनाव हुए। 6 में से 4 निगमों में कांग्रेस अपना बोर्ड बनाने में सफल रही। ठीक इसके कुछ दिन बाद पंचायती राज चुनाव हुए, जहां कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। 21 जिलों में हुए चुनाव में कांग्रेस सिर्फ 5 जिलों में अपना बोर्ड बना पाई। साल के आखिरी महीने में हुए राजस्थान नगर पालिका के चुनावों ने कांग्रेस को थोड़ी राहत जरूर दी। सरकार के दो साल पूरे हो चुके हैं। पायलट को पीसीसी मुखिया के पद से हटाए जाने के बाद से करीब 6 महीने गुजर चुके हैं, लेकिन अब तक संगठन में नई तैनातियां नहीं की जा सकी हैं। इसकी वजह से पार्टी को कई बार छोटे चुनावों में खराब प्रदर्शन का सामना करना पड़ा।

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