अलविदा 2017: बड़े राजनीतिक बदलावों का वर्ष, सरकार ने लिए ये 9 बड़े फैसले

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भारी बहुमत से भाजपा जीतकर आई। 2016 के नवंबर में हुई नोटबंदी के बाद ये पहले चुनाव थे

अलविदा 2017: बड़े राजनीतिक बदलावों का वर्ष, सरकार ने लिए ये 9 बड़े फैसले

वर्ष 2017 सत्तारूढ़ दल भाजपा के लिए विजय का वर्ष रहा तो कांग्रेस ने राहुल गांधी को अध्यक्ष की कमान सौंपकर 2019 की तैयारियों का आगाज किया। कहीं धुर राजनीतिक विरोधी एक हुए तो कहीं गठबंधन टूटे भी। साल भर की राजनीतिक उथल-पुथल को पेश करती मदन जैड़ा की रिपोर्ट

श में इस साल कई अहम राजनीतिक बदलाव हुए। कुछ बदलाव ऐसे हैं, जो प्रत्यक्ष दिखते हैं। और कई ऐसे बदलाव भी हुए, जिनका प्रत्यक्ष प्रभाव अभी नहीं दिखता, लेकिन भविष्य के लिए वह संकेत जरूर हैं। यही कारणहै कि 2019 में होने वाले आम चुनावों से एक साल पूर्व राजनीति में हुए इन बदलावों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पक्ष और विपक्ष के पास इन बदलावों को अपने पक्ष में ढालने के लिए महज एक साल का वक्त है।साल की शुरुआत में ही सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए जीत का सिलसिला शुरू हो गया था। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भारी बहुमत से भाजपा जीतकर आई। 2016 के नवंबर में हुई नोटबंदी के बाद ये पहले चुनाव थे। आशंका थी कि नोटबंदी के कारण पार्टी को हार का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन दोनों राज्यों में पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और नोटबंदी से नुकसान की आशंका निमरूल साबित हुई। भाजपा की जीत दो राज्यों तक सीमित नहीं रही। गोआ एवं मणिपुर में भी वह बड़े दल के रूप में उभरकर सामने आई और इन राज्यों में भी कुछ आलोचनाओं के साथ सरकार बनाने में सफल रही।दूसरी तरफ साल की शुरुआत में हुए चुनाव में जहां कांग्रेस, उत्तराखंड, गोआ और मणिपुर में अपनी सरकार बचाने में विफल रही, वहीं पंजाब में जीत ने उसे थोड़ी राहत प्रदान की। लेकिन साल के आखिरी महीने में हिमाचल प्रदेश में फिर कांग्रेस की हार हुई, पर इसी वक्त गुजरात में कांग्रेस ने अपना प्रदर्शन सुधार कर कार्यकर्ताओं में एक तरह से नई जान फूंक दी।

हालांकि भाजपा ने यहां प्रतिष्ठा की लड़ाई लड़ते हुए राज्य की सत्ता को कांग्रेस के हाथों जाने से बचा लिया, लेकिन इसके लिए उसे कठिन परिश्रम करना पड़ा। गुजरात चुनावों में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में पैदा की गई चुनौती भाजपा के लिए संकेत भी है, जिसे लेकर पार्टी अब सतर्क हो गई है। आम चुनाव के ठीक एक साल पहले के गुजरात के संकेतों को पार्टी सबक के रूप में ले रही है।

राहुल युग की शुरुआत
कांग्रेस में राहुल युग की शुरुआत, इस साल की बड़ी राजनीतिक घटना है। लंबे समय तक अध्यक्ष रहने के बाद सोनिया गांधी ने कमान राहुल गांधी को सौंप दी है। इसके प्रभाव अभी सामने नहीं आए हैं, लेकिन राहुल को कमान सौंपने के पीछे 2019 के चुनावों को राहुल गांधी बनाम मोदी बनाने की रणनीति माना जा रहा है। वैसे, एक राहत की बात यह है कि गुजरात चुनावों के बाद राहुल गांधी राजनीतिक रूप से परिपक्व नेता के रूप में उभर रहे हैं। विपक्ष के नेता के रूप में उनकी स्वीकार्यता बढ़ रही है।

1- अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देना : अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग को संवैधानिक दर्जा प्राप्त है, लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग को यह दर्जा नहीं था, जिसके कारण आयोग को कार्रवाई करने का अधिकार नहीं मिल पाता था। अब सरकार ने इसे भी संवैधानिक दर्जा देने का फैसला किया है। पिछले सत्र में विधेयक पारित नहीं हो पाया था, लेकिन इस सत्र में सरकार इसे पारित करने की पूरी तैयारी में है।

2- अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर जातियों के लिए आरक्षण सुनिश्चित करना : अन्य पिछड़ा वर्ग को सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है, लेकिन इसका लाभ कुछ ही जातियों को मिल पाता है, जबकि इस दायरे में कई जातियां आती हैं। अब सरकार जरूरतमंद अन्य पिछड़़ा वर्ग में जातियों को लाभ पहुंचाने के लिए इस 27 फीसदी के भीतर श्रेणियां बना रही है, ताकि जरूरतमंदों को ओबीसी आरक्षण का लाभ मिल सके।

3- 11 लाख अप्रशिक्षित शिक्षकों के लिए ऑनलाइन ट्र्रेंनग : देश के सरकारी एवं निजी प्राथमिक स्कूलों में करीब 11 हजार अप्रशिक्षित शिक्षक कार्य कर रहे थे। शिक्षा के अधिकार कानून के तहत इनके पास पेशेवर योग्यता होनी चाहिए। पेशेवर योग्यता नहीं होने के कारण इनकी नौकरी खतरे में पड़ी हुई थी, लेकिन सरकार ने इन्हें ओपन स्कूल के जरिये ऑनलाइन ट्र्रेंनग देने का कार्यक्रम शुरू किया है। साथ ही इसके लिए समय सीमा 2019 तक बढ़ा दी है। इसके लिए बाकायदा कानून में संशोधन किया गया।

4- कोरोनरी स्टेंट की कीमतों में 85 फीसदी और घुटना प्रत्यारोपण की कीमतों में 67 फीसदी कमी करना: कोरोनरी स्टेंट की कीमत डेढ़ लाख रुपये तक थी, जबकि घुटना प्रत्यारोपण पर तीन लाख रुपये से ज्यादा खर्च होता था। सरकार ने कोरोनरी स्टेंट और घुटना प्रत्यारोपण को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाकर इनके अधिकतम दाम तय कर दिए हैं। कोरोनरी स्टेंट की कीमतें इससे 85 फीसदी तक कम हो गई हंै, जबकि नी इंप्लांट की कीमतें 67 फीसदी घटी हंै। मरीजों को यह बड़ी राहत है। अब अन्य चिकित्सकीय उपकरणों को भी इसके दायरे में लाने की तैयारी की जा रही है।

5- आईआईएम को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान बनाने के लिए कानून: इसी सत्र में राज्यसभा से भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) विधेयक पारित हुआ है। इस विधेयक के पारित होने से देश में चल रहे सभी 20 आईआईएम को राष्ट्रीय महत्व के संस्थान का दर्जा मिल जाएगा। दूसरे, अब ये संस्थान छात्रों को अपनी डिग्री दे सकेंगे और पीएचडी करा सकेंगे। इससे संस्थान को विदेशों में अपने परिसर स्थापित करने में भी मदद मिलेगी। अभी तक आईआईएम के संचालन के लिए कोई अधिनियम नहीं था, जिसके चलते वे डिग्री नहीं दे पाते थे।

6- तीन तलाक को प्रतिबंधित करने के लिए विधेयक तैयार: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक को प्रतिबंधित करने के लिए विधेयक तैयार कर लिया है। इसी सत्र में इसे संसद में पेश किया जाएगा, जिसके तहत तीन तलाक देने पर तीन साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।

7- एनटीए का गठन : सरकार ने हाल में नेशनल र्टेंस्टग एजेंसी (एनटीए) के गठन का फैसला किया है। यह एजेंसी सभी प्रतियोगी प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन करेगी। अभी यह कार्य सीबीएसई करती थी। नई एजेंसी के गठन की प्रक्रिया चल रही है। सभी प्रवेश परीक्षाएं ऑनलाइन होंगी और साल में दो बार आयोजित की जाएंगी।

8- राष्ट्रीय मेडिकल आयोग: केंद्र सरकार ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की जगह राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग बनाने का निर्णय किया है, जो चिकित्सा शिक्षा का विनियमन करेगा। एमसीआई पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। वह चिकित्सा शिक्षा के नियमन में सफल भी नहीं रही है। विधेयक को कैबिनेट मंजूरी दे चुकी है।

9- ग्रेच्युटी की सीमा दस लाख से बीस लाख करने के लिए विधेयक : सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार केंद्र सरकार ने सरकारी एवं निजी क्षेत्र में ग्रेच्युटी की राशि दस लाख से बढ़ाकर बीस लाख करने का फैसला किया है। इसके लिए कानून में संशोधन किया गया है।

1- अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देना : अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग को संवैधानिक दर्जा प्राप्त है, लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग को यह दर्जा नहीं था, जिसके कारण आयोग को कार्रवाई करने का अधिकार नहीं मिल पाता था। अब सरकार ने इसे भी संवैधानिक दर्जा देने का फैसला किया है। पिछले सत्र में विधेयक पारित नहीं हो पाया था, लेकिन इस सत्र में सरकार इसे पारित करने की पूरी तैयारी में है।

2- अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर जातियों के लिए आरक्षण सुनिश्चित करना : अन्य पिछड़ा वर्ग को सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है, लेकिन इसका लाभ कुछ ही जातियों को मिल पाता है, जबकि इस दायरे में कई जातियां आती हैं। अब सरकार जरूरतमंद अन्य पिछड़़ा वर्ग में जातियों को लाभ पहुंचाने के लिए इस 27 फीसदी के भीतर श्रेणियां बना रही है, ताकि जरूरतमंदों को ओबीसी आरक्षण का लाभ मिल सके।

3- 11 लाख अप्रशिक्षित शिक्षकों के लिए ऑनलाइन ट्र्रेंनग : देश के सरकारी एवं निजी प्राथमिक स्कूलों में करीब 11 हजार अप्रशिक्षित शिक्षक कार्य कर रहे थे। शिक्षा के अधिकार कानून के तहत इनके पास पेशेवर योग्यता होनी चाहिए। पेशेवर योग्यता नहीं होने के कारण इनकी नौकरी खतरे में पड़ी हुई थी, लेकिन सरकार ने इन्हें ओपन स्कूल के जरिये ऑनलाइन ट्र्रेंनग देने का कार्यक्रम शुरू किया है। साथ ही इसके लिए समय सीमा 2019 तक बढ़ा दी है। इसके लिए बाकायदा कानून में संशोधन किया गया।

4- कोरोनरी स्टेंट की कीमतों में 85 फीसदी और घुटना प्रत्यारोपण की कीमतों में 67 फीसदी कमी करना: कोरोनरी स्टेंट की कीमत डेढ़ लाख रुपये तक थी, जबकि घुटना प्रत्यारोपण पर तीन लाख रुपये से ज्यादा खर्च होता था। सरकार ने कोरोनरी स्टेंट और घुटना प्रत्यारोपण को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाकर इनके अधिकतम दाम तय कर दिए हैं। कोरोनरी स्टेंट की कीमतें इससे 85 फीसदी तक कम हो गई हंै, जबकि नी इंप्लांट की कीमतें 67 फीसदी घटी हंै। मरीजों को यह बड़ी राहत है। अब अन्य चिकित्सकीय उपकरणों को भी इसके दायरे में लाने की तैयारी की जा रही है।

5- आईआईएम को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान बनाने के लिए कानून: इसी सत्र में राज्यसभा से भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) विधेयक पारित हुआ है। इस विधेयक के पारित होने से देश में चल रहे सभी 20 आईआईएम को राष्ट्रीय महत्व के संस्थान का दर्जा मिल जाएगा। दूसरे, अब ये संस्थान छात्रों को अपनी डिग्री दे सकेंगे और पीएचडी करा सकेंगे। इससे संस्थान को विदेशों में अपने परिसर स्थापित करने में भी मदद मिलेगी। अभी तक आईआईएम के संचालन के लिए कोई अधिनियम नहीं था, जिसके चलते वे डिग्री नहीं दे पाते थे।

6- तीन तलाक को प्रतिबंधित करने के लिए विधेयक तैयार: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक को प्रतिबंधित करने के लिए विधेयक तैयार कर लिया है। इसी सत्र में इसे संसद में पेश किया जाएगा, जिसके तहत तीन तलाक देने पर तीन साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।

7- एनटीए का गठन : सरकार ने हाल में नेशनल र्टेंस्टग एजेंसी (एनटीए) के गठन का फैसला किया है। यह एजेंसी सभी प्रतियोगी प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन करेगी। अभी यह कार्य सीबीएसई करती थी। नई एजेंसी के गठन की प्रक्रिया चल रही है। सभी प्रवेश परीक्षाएं ऑनलाइन होंगी और साल में दो बार आयोजित की जाएंगी।

8- राष्ट्रीय मेडिकल आयोग: केंद्र सरकार ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की जगह राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग बनाने का निर्णय किया है, जो चिकित्सा शिक्षा का विनियमन करेगा। एमसीआई पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। वह चिकित्सा शिक्षा के नियमन में सफल भी नहीं रही है। विधेयक को कैबिनेट मंजूरी दे चुकी है।

9- ग्रेच्युटी की सीमा दस लाख से बीस लाख करने के लिए विधेयक : सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार केंद्र सरकार ने सरकारी एवं निजी क्षेत्र में ग्रेच्युटी की राशि दस लाख से बढ़ाकर बीस लाख करने का फैसला किया है। इसके लिए कानून में संशोधन किया गया है।

धुर विरोधी एक हुए
आम चुनावों से ठीक पूर्व भाजपा से नाता तोड़ने वाले नीतीश कुमार ने फिर भाजपा का दामन थाम लिया। मोदी के विरोधी माने जाने वाले कुमार ने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की छवि से पीछा छुड़ाने के लिए यह कदम उठाया हो सकता है, लेकिन इसके कई और राजनीतिक मायने भी हैं। मोदी के खिलाफ 2019 के चुनावों में नीतीश कुमार प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर विपक्ष का एक साझा चेहरा हो सकते थे, लेकिन भाजपा से हाथ मिलाकर वे बिहार तक सीमित हो गए हैं। हालांकि भाजपा से दोबारा मिलना नीतीश की पार्टी के भीतर भी कुछ लोगों को स्वीकार नहीं हुआ। विरोध करने वाले वरिष्ठ नेता शरद यादव व अनवर अली को पार्टी व संसद की सदस्यता दोनों से हाथ धोना पड़ा।

कांग्रेस मुक्त हुए संवैधानिक पद
नए राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद और उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू के चुनाव के बाद देश के सभी शीर्ष संवैधानिक पदों से कांग्रेस अलग हो गई है। प्रणब मुखर्जी व हामिद मोहम्मद अंसारी यूपीए कार्यकाल में चुने गए।
सफल कूटनीति

मोदी की विदेश नीति भी सफल साबित हुई। अमेरिका में नई सरकार के साथ संबंध और अच्छे हुए। कई मंचों पर पाक की घेराबंदी में भारत सफल रहा। डोकलाम मुद्दे का कूटनीति के जरिए सफल समाधान किया।

कामयाब सरकार की छवि
विपक्ष भले ही सरकार के कामकाज पर सवाल उठाता रहा हो, लेकिन जनता के बीच मोदी सरकार की छवि अच्छी बनी हुई है। सरकार के फैसलों और प्रधानमंत्री की सक्रियता से लोग संतुष्ट हैं। प्रधानमंत्री ने मंत्रिमंडल में अच्छा कार्य करने वाले मंत्रियों को प्रोन्नति भी दी तो खराब प्रदर्शन करने वालों को दरवाजा भी दिखाया। रोजगार सृजन में विफल रहने व महंगाई नहीं रोक पाने के मुद्दे पर विपक्ष सरकार की घेराबंदी करता नजर आया। साथ ही पर्याप्त तैयारी के बगैर जीएसटी लागू करने को लेकर व्यापारी वर्ग में सरकार की खासी आलोचना हुई। गुजरात चुनावों में जिस तरह जीएसटी फैक्टर खास प्रभावी नहीं रहा, सरकार उसे जनता का समर्थन ही मान रही है।

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