छत्तीसगढ़

40 से 50 पौधे रोपने खर्च कर दिए गए 3,22,698..? फिर भी नहीं हुआ कोई घोटाला..?

लोहरसिंह में मनरेगा के तहत रोपे गए पौधों की कहानी…

हिमालय मुखर्जी ब्यूरो चीफ रायगढ़

रायगढ़। शीर्षक पढ़कर आपको समझ में आ ही गया होगा कि यहां जनहित के लिए बनाई गई किसी सरकारी योजना की बात हो रही है और यह भी समझ में आ गया होगा कि उस योजना का क्या हाल हुआ है। इस योजना में अगर एक मोटा मोटी हिसाब किताब लगाया जाए तो फाइनली सरकार को एक पौधा 6000 से ऊपर कीमत का पड़ा! ऐसा कैसे..? हम आपको बताते हैं, लोहरसिंह में मनरेगा के तहत रोपे गए पौधों की कहानी…

रायगढ़ जिले के अंतर्गत एक ग्राम है लोहरसिंह। यहां मनरेगा के तहत ₹626300 के राशि से वृक्षारोपण होना था लेकिन इस पंचायत में ऐसा कारनामा कर दिखाया जिसे आप देखकर भौचक रह जाएंगे। वैसे तो यहां सिर्फ आधी राशि ही खर्च की गई लेकिन उसमें एक अनूठा कारनामा पंचायत के उपसरपंच रोजगार सहायक व पूर्व सरपंच ने कर दिखाएं।

क्या है पूरा मामला

यहां 322778 रुपए में 606 पौधे लगाए जाने के बाद कहीं जा रही है, तथा 140442 रुपए की सामग्री क्रय की गई यह भी जांच का विषय है। लेकिन उसे लगाने में जिस स्थल का चयन किया गया; शायद वही गलत था! यह हम नहीं कह रहे हैं! यह जमीनी सच्चाई देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि लगाए गए 606 पौधों में मात्र 40 से 50 पहुंचे ही जीवित बचे हैं अगर इसका आकलन करें तो 1 पौधों लगाने में ₹6453 की बड़ी राशि खर्च की गई जिससे यह कहा जा सकता है कि यह वृक्षारोपण कही न कही आर्थिक अनियमितता को जन्म देता है। इससे बेहतर तो यह होता कि प्रत्येक ग्रामीणों को पौधे दे दिए जाते हैं तो शायद बहुत ही कम खर्च में यह पौधे रोप भी दिए जाते और जीवित भी रहते।

ऐसा नहीं कि इसकी किसी ने शिकायत नहीं की। इसकी शिकायत भी हुई। जांच टीम भी बैठी! किंतु जांच टीम ने अपना काम बेहद ही नाटकीय ढंग से निभाया, उससे यह स्पष्ट हुआ कि पौधे तो 606 पौधे रोपे तो गए थे परंतु असामाजिक तत्वों ने इन पौधों को इसे तोड़ दिया। शायद कोई पर्यावरण का दुश्मन रहा होगा, जिसने पौधे उखाड़ने के काम को एक मिशन की तरह लिया और 500 से अधिक पर उखाड़ दिये। खैर जो भी हो पंचायत ने भी अपना काम कर दिया है और उस अज्ञात असामाजिक तत्वों के खिलाफ थाने में सूचना भी दे दी है। मतलब कि यहाँ पर अपना कागज पक्का कर लिया है।

लगभग 3 फीट के पौधे रोपने का प्रावधान

एक और् गौर करने वाली बात यह है कि जो पौधे इस पंचायत में रोपे गए उनका स्वरूप क्या था, क्या वह बेहद ही छोटे तो नहीं थे। वैसे लगभग 3 फीट के पौधे रोपने का प्रावधान है लेकिन हकीकत माने तो सिर्फ कोरम पूरा करने 4 इंच के पौधे भी रोपित किए गए तथा देखरेख के अभाव में वह मर भी गए होंगे, तो बड़ी बात नहीं है। वैसे यहां एक पुरानी कहावत फिट बैठती है कि जंगल में मोर नाचा किसने देखा. .? अब पौधे 4 इंच के थे या 3 फीट के, अगर वह जिंदा होते तो शायद पता चलता।

दूसरी एक और बात यहां देखने को मिली कि यहां किसी तरह का रोड मैप नहीं दिखा। वृक्षारोपण जैसे गंभीर पर्यावरणीय मामले में कुछ खास बातों का ध्यान बिल्कुल नहीं रखा गया जैसे कि पौधे लगाने कहां है, पौधों का स्वरूप क्या होना चाहिए, क्या कोई पौधों को क्षति तो नहीं पहुंचाएगा, सबसे खास बात कि इसमें गरीब तबके के लोगों से ही काम नहीं लिया बल्कि 20 एकड़ खेत के मालिक एवं संपन्न परिवार के लोगों ने भी नियम कानून के तहत जॉब कार्ड बनवा कर यहां कार्य करने की अनूठी भूमिका निभाई है?

पूर्व सरपंच व उपसरपंच भोजराम से राशि की वसूली

जैसे जांच में स्पष्ट हुआ कि उपसरपंच भोजराम नायक उनकी पत्नी तथा उनकी 64 वर्षीय माताजी ने भी इसमें का कार्य किया है यह कोरी कल्पना प्रतीत नहीं होती है तो और क्या है..? लेकिन नियम के आगे सारी बातें सिर्फ कोरी कल्पना साबित होती है। इसमें जांच टीम ने पूर्व सरपंच व उपसरपंच भोजराम से राशि की वसूली की बात भी कही; लेकिन फिर वही नियम का हवाला देते हुए मात्र एक पंचनामा देकर इन्होंने साबित कर दिया की संपन्न परिवार के लोगों ने इसमें अपनी अमूल्य भूमिका निभाई है और इसके लिए मजदूरी भी प्राप्त की है।

भ्रष्टाचार के इस मामले को हम एक मिसाल के तौर पर देख सकते हैं तथा ऊपर वीडियो में रोजगार सहायक के इस कथन से आप अंदाजा लगा सकते हैं के ग्राम लोहार सिंह में वृक्षारोपण जैसी महत्वाकांक्षी योजना किस तरह परवान चढ़ी।

क्या कागजी कार्यवाही के आधार पर गोलमाल करने वालों को क्लीन चिट दे दी जाएगी?

इसमें मामले में क्या होगा यह तो समय के गर्भ में है?

यूं तो यह मात्र एक ग्राम पंचायत का मामला है। ऐसे कई चौंकाने वाले मामले सामने आएंगे। जिससे आपको ग्राम पंचायत में किए जा रहे हैं वृक्षारोपण और उसकी मॉनिटरिंग कर रहे अधिकारियों की गंभीरता से भी अवगत कराएगे।

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