महाराज जोधपुर की बंदूकों की एक झलक और उनके बारे में क‍ि क्‍या है इन बंदूकों की खास‍ियत

जोधपुर में प्राचीन राजवंश की स्‍थापना आठवीं सदी में हुई थी

नई दिल्ली: कहते हैं जान है तो जहान है, सुरक्षा है तो इत्मीनान है. शायद इसीलिए मनुष्य की रक्षा के लिए शस्त्रों के बाद बंदूकों को जगह म‍िली. जोधपुर में आठवीं सदी में हुई प्राचीन राजवंश की स्‍थापना के बाद महाराज जोधपुर की नायाब बंदूकों की चर्चा मुगलों से लेकर अंग्रेजी जमाने में भी खूब होती थी.

आइए यहां देखते हैं महाराज जोधपुर की बंदूकों की एक झलक और उनके बारे में क‍ि क्‍या है इन बंदूकों की खास‍ियत…

मेहौजें बीती सदियों में जब मुगलों ने राजपूतों पर हमला बोल दिया और सुरक्षात्मक हथियारों के अभाव में राजपूतों को मुंह की खानी पड़ी, तो बंदूकों की ज़रूरत को महसूस किया गया. फिर यहां के महाराजाओं द्वारा शुरू हुआ एक से एक बढ़कर एक काबिल, तीसमारखां बंदूकों को ख़रीदने, बनाने व संग्रह का सिलसिला, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहा.

इन्हीं बंदूकों का इतिहास बयां करती एक पहली और एकमात्र किताब द महाराजा ऑफ जोधपुर्स गन्स, जो ब्रिटिश लेखक रॉबर्ट एलगुड द्वारा लिखी और नियोगी बुक्स एवं मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट के संयुक्त तत्वाधान में प्रकाशित की गई है.

बेशक़ीमती बंदूकों से सजी इस अद्भुत किताब में इनके बारे में भरपूर जानकारी, तीन सौ से भी अधिक चित्रों एवं ज्ञान का विस्तृत भंडार है, जिससे यह हर किसी को विस्मित कर देती है. सत्रहवीं सदी के गुजराती मछली के आकार की मदर-ऑफ-पर्ल प्राइमिंग फ्लास्क को पीतल के नाखूनों के साथ लकड़ी के कोर पर सेट करके बनाया गया है. इसकी कुल लंबाई: 25 सेमी है.

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