नेत्रहीन महिला को गुजारा भत्ता के लिए 99 बार लगाने पड़े कोर्ट के चक्कर

मोनिका अपने पिता से गुजारा भत्ता मांग रही हैं जो खुद भी करीब 40 फीसदी दिव्यांग हैं

नेत्रहीन महिला को गुजारा भत्ता के लिए 99 बार लगाने पड़े कोर्ट के चक्कर

दिव्यांग लोगों की सहूलियत के लिए देशभर की अदालतें अक्सर निर्देश जारी करती रहती हैं लेकिन वे खुद इसके प्रति कितना संवेदनशील हैं, इसका एक उदाहरण गुजरात में देखने को मिला। गांधीनगर की नेत्रहीन महिला मोनिका भट्टी को गुजारा भत्ता पाने के लिए सिविल कोर्ट में पिछले सात साल में 99 बार पेश होना पड़ा हैं। मोनिका अपने पिता से गुजारा भत्ता मांग रही हैं जो खुद भी करीब 40 फीसदी दिव्यांग हैं।

30 वर्षीय मोनिका पांच जनवरी को 100वीं बार अदालत पहुंचेंगी। यह उनकी अंतिम कोर्ट यात्रा हो सकती है क्योंकि गुजरात हाई कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप किया है और निचली अदालत को निर्देश दिया है कि वह सुनवाई को तेज करे तथा 6 सप्ताह के अंदर मोनिका के आवेदन पर अपना अंतिम फैसला ले।

बता दें, इस मामले की अपनीं जटिलताएं हैं जिसमें वर्ष 1982 से परिवार के सदस्यों ने मुकदमें कर रखे हैं। इसमें घर के स्वामित्व को लेकर दायर कई दीवानी मुकदमें शामिल हैं। मोनिका के पिता भगवानदास पर सबसे पहले उनकी पत्नी ने मुकदमा किया और एक पारिवारिक अदालत ने उन्हें 80 रुपये महीने गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। कुछ महीने बाद पति और पत्नी के बीच सुलह हो गई और मुकदमा वापस ले लिया गया।

इसके बाद वर्ष 2010 में मोनिका ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अपने पिता से गुजारा भत्ता मांगा। मोनिका ने दावा किया कि उनके पिता बिजनस करते हैं और हर महीने 50 हजार रुपये कमाते हैं। उधर, भगवानदास ने अपने बेटे पर गुजारा भत्ता देने के लिए केस किया था। एक पारिवारिक अदालत ने वर्ष 2014 में भगवानदास के बेटे को उन्हें दो हजार रुपये गुजारा भत्ता देने के लिए आदेश दिया।

इससे मोनिका का मुकदमा और ज्यादा लंबा खिंच गया। परेशान मोनिका ने जजों पर आरोप लगाना शुरू कर दिया और वकीलों ने इस मामले से दूरी बन ली। जब 99 बार की सुनवाई में निचली अदालत ने कोई आदेश पारित नहीं किया, तब मोनिका ने जल्द सुनवाई के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाई कोर्ट ने जब इस मामले की जांच की तो गांधीनगर के जजों ने शिकायत की कि मोनिका उनके ऊपर आरोप लगाती है और बताया कि उसने सुनवाई अदालत बदलने के लिए कई आवेदन दिए थे। हाई कोर्ट ने पाया कि आवेदनकर्ता की वजह से ही यह केस इतना लंबा खिंच गया। इसके बाद हाई कोर्ट ने निचली अदालत को छह सप्ताह के अंदर अंतिम फैसला लेने के लिए कहा।

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