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क्रिकेट फैंस के दिमाग में पिंक बॉल या गुलाबी गेंद को लेकर काफी कौतूहल

पहली बार इंटरनेशनल टेस्ट मैच में होगा इस्तेमाल

नई दिल्ली: भारत और बांग्लादेश पहली बार डे नाइट टेस्ट खेल रही हैं. इस मैच में गुलाबी गेंद का इस्तेमाल किया जाएगा जिसका किसी भी टीम को कोई अनुभव नहीं है.

ऐसे में फैंस, दर्शकों के अलावा यह मैच खिलाड़ियो के लिए भी किसी रोमांच से कम नहीं है. इस मैच में एसजी पिंक बॉल का उपयोग होगा. जो कि पहली बार इंटरनेशनल टेस्ट मैच में इस्तेमाल की जा रही है.

इससे पहले क्रिकेट में परंपरागत लाल गेंद का उपयोग होता था. लेकिन इस गेंद के साथ रात को सफेद रोशनी के साथ खेलने में कुछ परेशानियां होती हैं खास तौर पर जब गेंद पुरानी हो जाती है. यहीं पर गुलाबी गेंद का विचार सामने आया जो कि सफेद रोशनी में ज्यादा अच्छे से दिखाई देती है. इस वजह से यह परंपरागत लाल गेंद से कुछ अलग हो गई है.

भारत में इस गेंद का उपयोग होता है

टेस्ट क्रिकेट में अब तक लाल गेंद का ही उपयोग होता था. ये गेंदें भी दो तरह की होती है. एक कूकाबूरा और दूसरी एसजी गेंद दोनों गेंदों में मूलभूत अंतर उसके बनाने की प्रक्रिया का है. एसजी गेंद में सिलाई जहां हाथ से होती है जबकि कूकाबूरा गेंद में सिलाई मशीन से होती है. भारत में एसजी गेंदों का उपयोग ज्यादा होता है. जबकि कूकाबूरा का चलन ऑस्ट्रेलिया में ज्यादा होता है. ग

तो फिर पिंक बॉल इनसे कितनी अलग

दरअसल पिंक बॉल की भी लाल गेंद की तरह यही दो श्रेणियां हैं. अंतर केवल रंग का आ जाता है. लाल गेंद में लाल रंग की केवल एक परत होती है तो वहीं गुलाबी गेंद में गुलाबी रंग की दो परत होती हैं जिससे गेंद का रंग जल्दी न निकले.

इससे गेंदबाजों को खासकर स्पिनर्स को गेंदबाजी में, लाल गेंद के मुकाबले थोड़ी मुश्किलें होती हैं. वहीं गुलाबी गेंद की चमक लंबे समय तक रहने से यह तेज गेंदबाजों को ज्यादा देर तक मददगार बनी रहती है.

अब कौन सी पिंक बॉल

वैसे तो भारत में एसजी लाल गेंद ही उपयोग में लाई जाती रही है, लेकिन बीसीसीआई पिछले कुछ समय से घरेलू क्रिकेट में कूकाबूरा पिंक बॉल का ही उपयोग कर रही है. वहीं बहुत से घरेलू खिलाड़ी कूकाबूरा गुलाबी गेंद के पक्ष में नहीं हैं क्योंकि उनका मानना है कि कूकाबूरा गेंद की सीम जल्दी ही नर्म हो जाती है जिससे बल्लेबाजों को फायदा होता है. ऐसे में गेंद से किसी भी तरह की स्विंग, परांपरागत या रिवर्स दोनों कराने में परेशानी होती है.

यह चुनौती भी है पिंक बाल के लिए

वैसे तो गुलाबी गेंद बनाते समय इस बात का खास ध्यान रखा ही जाता है कि गेंद अपना रंग जल्दी न छोड़े. इसके बावजूद भी पिंक गेंद को पिच, आउट फील्ड जैसे कारकों से उतना अंतर नहीं पड़ेगा जितना की ओस से नुकसान हो सकता है.

ओस गुलाबी गेंद का रंग जल्दी निकाल सकती है. इस बात के बारे में सही तरीके से तो मैच में ही पता चलेगा. इतना तय है कि जितना बीसीसीआई डे नाइट मैच को सफल बनाने को बेताब है. वहीं गुलाबी गेंद बनाने वाले भी मैच से पहले चैन से नहीं बैठ पाएंगे.

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