55 बार रक्तदान करने के बाद RARE ब्लड ग्रुप का पता चला

हेगड़े विदेशी नागरिकों की जान बचाने के लिए भी ब्लड डोनेट कर चुके हैं

55 बार रक्तदान करने के बाद RARE ब्लड ग्रुप का पता चला

हाल ही में चेन्नै में एक गर्भवती महिला की रक्तदान के जरिए जान बचाने वाले आदित्य हेगड़े (34 वर्ष) सुर्खियों में थे। आदित्य नियमित रूप से रक्तदान करते आ रहे हैं लेकिन वह साधारण रक्तदाताओं में से नहीं है दरअसल उनका ब्लड ग्रुप दुर्लभ है जिसका नाम है- बॉम्बे ब्लड ग्रुप।

इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक बात यह है कि आदित्य को 2003 में इस अपने ब्लड ग्रुप का पता चला था। इससे पहले वह 55 बार ब्लड डोनेट कर चुके थे। माना जाता है कि बॉम्बे ब्लड ग्रुप पूरी दुनिया की बेहद कम जनसंख्या- मात्र 0.0004 फीसदी में मौजूद है और ओ रक्त समूह के अंतर्गत आता है। भारत में दस हजार से 17 हजार लोगों में से किसी एक के पास यह दुर्लभ ब्लड ग्रुप होता है। इस तरह का व्यक्ति सिर्फ उसी ब्लड ग्रुप को ही रक्तदान कर सकते हैं।

सिद्दपुर के नजदीक एक गांव से पैदा हुए आदित्य हुबली में पले-बढ़े जहां उन्होंने कॉलेज टाइम में ही रक्तदान मुहिम को जॉइन किया। आदित्य बताते हैं कि मुझे हमेशा लगता था कि मेरा ब्लड ग्रुप ओ नेगेटिव ( यूनिवर्सल डोनर) है। मैंने एक एनजीओ में अपना नाम रजिस्टर कराया और वहां समय-समय पर रक्तदान करता था। इसके बाद 2003 में जब मैं ब्लड टेस्ट के लिए गया तो मुझे बताया गया कि मेरा ब्लड ग्रुप बॉम्बे है और यह बेहद दुर्लभ है। इसके बाद जब मैं 2005 में बेंगलुरु आया तो मैं ब्लड बैंकों से जुड़ गया और रेगुलर डोनर बन गया।

हेगड़े विदेशी नागरिकों की जान बचाने के लिए भी ब्लड डोनेट कर चुके हैं। हेगड़े ने बताया कि आज सोशल मीडिया की मदद से रक्तदान के जरूरतमंद लोगों का पता आसानी से चल जाता है। उन्होंने बताया कि कैसे हेबल के पास एक प्राइवेट अस्पताल में दिल की बीमारी से जूझ रही 80 वर्षीय वृद्धा की उन्होंने मदद की थी और फिर इसी तरह राजा राजेश्वरी नगर में एक गर्भवती महिला को रक्तदान किया।

दूसरे ब्लड ग्रुप की तरह बॉम्बे ब्लड ग्रुप में लाल रक्त कणिकाओं में एच ऐंटीजन की कमी होती है। इस ग्रुप में ए या बी दोनों में से कोई ऐंटीजन नहीं होता है इसलिए इन्हें साधारणतया ओ ग्रुप समझा जाता है इसलिए विशेषकर एच ऐंटीजन टेस्ट से ओ और बॉम्बे ब्लड ग्रुप के बीच अंतर पता किया जाता है। इसकी जांच भी आसान नहीं होती है, क्योंकि यह साधारण जांच में ओ पॉजिटिव ही दिखता है। छोटी लैब में जांच कराने पर व्यक्ति को उसका ब्लड ग्रुप ओ पॉजिटिव ही बताया जाता है। सिर्फ ऑटोमेटेड मशीन की जांच में ही इस ब्लड ग्रुप को पकड़ा जा सकता है। जबकि इस ब्लड में एच एंटीजेंट होता है। यह ब्लड ग्रुप पहली बार बॉम्बे में मिला था इसलिए यह बॉम्बे ब्लड ग्रुप से जाना जाता है। डॉ. चंद्रा ने बताया कि अगर बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले को ओ पॉजिटिव ब्लड चढ़ा दिया जाए तो मरीज की जान को खतरा होता है।

advt
Back to top button