एक ऐसा मंदिर, जहां सालभर में एक ही दिन होती है पूजा

राज शार्दूल

कोण्डागांव :

ब्लॉक मुख्यालय फरसगांव से लगभग 8 किलोमीटर दूर पश्चिम में बैठ डोंगर मार्ग पर स्थित ग्राम आलोर में ऐसा ही एक शिवलिंग व माता स्वरूप में है जिसे लोग लिंगई माता का नाम से जानते हैं. गुफा के भीतर मौजूद शिवलिंग को लिंगई माता के रूप में पूजा जाता है यह मंदिर प्रतिवर्ष भादो माह की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के बाद आने वाले बुधवार को खोला जाता है।

इस मंदिर में अधिकांश श्रद्धालु संतान की कामना को लेकर पहुंचते हैं. इस प्रकृति मंदिर में प्रतिदिन पूजा अर्चना नहीं होती है. साल में सिर्फ एक दिन खोलने वाला यह मंदिर इस बार 19 सितम्बर को खुलेगा। श्रद्धालु महाराष्ट्र उड़ीसा से भी आते हैं. इस्तुपनुमा मंदिर का प्रवेश द्वार इतना छोटा है कि यहां बैठ कर या लेट कर ही प्रवेश किया जा सकता है, लेकिन भीतर शिवलिंग के चारों ओर 15 से 20 लोग बैठ कर पूजा कर सकते हैं.

इस मंदिर में राज्य तक ही नहीं बल्की उड़ीसा महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से भी बड़ी संख्या में विवाहित जोड़ों का पहुंचना शुरू हो जाता है खिरे का मिलता है प्रसाद इस मंदिर में संतान की कामना लेकर आए हुए दंपत्ति छोटा सा खीरा ककड़ी जब लिंगई माता को भेंट करते हैं तब पुजारी द्वारा प्रसाद के रूप में उसे चढ़े हुए खीरे को वापस देता है तब कड़वे भाग को ना फेकते हुए नाखून से उस ककड़ी को टुकड़े कर मंदिर परिसर में बैठ कर खाया जाता है.

पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा और मान्यता के कारण भाद्रपद में 1 दिन ही पूजा होती है. शेष समय लिंगेश्वरी माता गुफा में बंद रहती है. इस दिन स्थानीय जनप्रतिनिधियों द्वारा बाहर से आए हुए लोगों के लिए पूरी व्यवस्था की जाती है. वह साथ ही विशाल भंडारा का आयोजन भी स्थानीय जनप्रतिनिधियों व ग्रामवासियों द्वरा किया जाता है. रात्रि से ही लोग गाव में आकर रहते हैं भारी भीड़ को देखते हुए पुलिश प्रसाशन की पुख्ता इंतजाम किया जाता है।

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