ज्योतिष

गर्भपात – ज्योतिषीय अध्ययन

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव 8178677715, 9811598848

वैवाहिक जीवन में प्रवेश का मुख्य उद्देश्य पारिवारिक वंश परम्पराओं को आगे बढ़ाना है. विवाह के उपरान्त कुछ वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद यदि किसी कारण वश संतान सुख प्राप्त नहीं हो पाए तो परिवार और समाज पति पत्नी का जीवन मुश्किल कर देते है. ऐसी में महिला को अनेक प्रकार के तानों की स्थिति से गुजरना पड़ता है. उसका जीवन अत्यंत कष्टमय हो जाता है.

संतान कामना से जुडी अपनी इच्छाओं और पारिवारिक जीवन को पूर्ण करने के लिए संतान सुख महत्वपूर्ण हो जाता है. अनेक धर्म शास्त्र भी कहते है की जीवन के अनेक धर्म कार्य केवल संतान ही पूर्ण कर सकती है.

संतान का ना होना मानसिक और सामाजिक दोनों प्रकार से कष्ट देता है. यही वजह है की माता-पिता बनने की कामना प्रत्येक दंपत्ति रखता है. हर स्त्री मातृत्व सुख पाना चाहती है. शास्त्रों ने तो यहां तक कह दिया है की मातृत्व सुख के बिना स्त्री पूर्ण हो ही नहीं सकती।

चिकित्सीय जांच से भी कई बार लाभ नहीं मिल पता है. जब प्राकृतिक और चिकित्सीय सहयोग भी काम ना आये तो इस स्थिति में पति-पत्नी दोनों की कुंडली किसी योग्य ज्योतिषीय से करा लेना उपयोगी रहता है.

ज्योतिष शास्त्र जीवन में होने वाली घटनाओं का मार्गदर्शक होता है. इसे सहज रूप सम्पूर्ण जीवन में घटित होने वाली घटनाओं का मैप या सूचना पट भी कहा जा सकता है. इस विद्या में ग्रहों के माध्यम से आने वाली घटनाओं को ग्रह स्थिति और योग के माध्यम से समझा जा सकता है.

इन संकेतों को समझने के लिए ग्रह स्थिति, दशाएं और ग्रह गोचर का प्रयोग किया जाता है. कुंडली के बारीक अध्ययन से यह जाना सकता है की जातक को जीवन में संतान प्राप्ति हो भी पाएगी या नहीं.

वैवाहिक जीवन की शुरुआत देर से होना आज के आधुनिक समय में कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं रह गयी है, करियर बनाने को अधिक महत्व देने के कारण विवाह की औसत आयु बढ़ती ही जा रही है.

विवाह का देर से होना बहुत कष्टमय नहीं होता, परन्तु यदि विवाह के बाद संतान सुख प्राप्त नहीं हो पाए तो निश्चित रूप से यह दंपत्ति के लिए मानसिक कष्ट का कारण बनता है. इस पर भी कई बार बार बार यदि किसी स्त्री को गर्भपात का सामना करना पड़े तो स्थिति दयनीय हो जाती है. इस स्थिति में चिकित्सीय जांच और परामर्श बहुत उपयोगी साबित होता है.

चिकित्सकीय जांच के साथ साथ ज्योतिषीय सलाह और उपाय करने से परिणाम बेहतर प्राप्त किए जा सकते है. ज्योतिषीय विद्या से संतान सुख की सम्भावनाएं, संतान सुख में देरी और गर्भपात के कारण ज्ञात किए जा सकते है. संतान सुख में देरी की समस्या को दूर करने के लिए निम्न उपाय करने लाभप्रद सिद्ध हो सकते हैं-

जैसा की यह सर्वविदित है कि ज्योतिष एक सूचना शास्त्र है जिसमें ग्रहों के माध्यम से जीवन की घटनाओं से संबंधित संकेत प्राप्त किए जाते हैं। जीवन के किसी भी विषय और घटनाओं को जानने समझने के लिए ग्रहों की स्थिति तथा दशाओं का आकलन किया जाता है।

विवाह यदि देर से हों तो यह उतना अधिक कष्टमय नहीं होता जितना संतान सुख में बाधा होने या बार-बार गर्भपात होने पर मानसिक कष्ट का अनुभव ज्यादा होता है। कई बार चिकित्सकीय परामर्श अनुसार उपाय भी कारगर साबित नहीं होते हैं किंतु ज्योतिष विद्या से संतान सुख में बाधा गर्भपात का कारण ज्ञात किया जा सकता है तथा उस बाधा से निजात पाने हेतु ज्योतिषीय उपाय लाभप्रद साबित होते हैं-

जन्मपत्री से संतान प्राप्ति का विश्लेषण करने के लिए चंद्र, मंगल, सूर्य और गुरु का सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाता है, ये चार ग्रह गर्भाधान में खास महत्व रखते है, परन्तु इससे पूर्व कुंडली में संतान प्राप्ति के योग अवश्य होने चाहिए.

कुंडली के योगों में संतान की संभावनाएं यदि हैं तो उपाय करने से स्थिति में सुधार होकर, संतान प्राप्ति की कामना पूर्ण हो सकती है. चंद्र ग्रह गर्भाधान की तिथि, सूर्य ग्रह से माह, गुरु ग्रह से गर्भाधन का वर्ष जाना जा सकता है.

स्त्री कुंडली में लग्न भाव कमजोर हो और पंचम भाव अर्थात संतान भाव का राहु/केतु प्रभाव में होना या शनि की दृष्टि होना संतान की संभावनाओं को कमजोर करता है. इसके अतिरिक्त सातवें भाव और आठवें भाव पर मंगल का प्रभाव गर्भपात का कारण बन सकता है.

विवाह के बाद यदि पंचमेश या पंचम भाव से संबंधित ग्रहों की दशा मिलती है तो संतान सुख की संभावनाओं को बल मिलता है. इसके अतिरिक्त शनि और गुरु ग्रह की दशाओं में भी गर्भपात की संभावनाओं में कमी होती है. स्त्री कुंडली में मासिक धर्म की स्थिति का विचार करने के लिए चंद्र और मंगल का अध्ययन किया जाता है.

• जन्म चंद्र से गोचर चंद्र का ३,६,१० और ११ वें भाव पर गोचर करना तथा मंगल से संबंध बनाने पर मासिक धर्म गर्भधारण का रुप लेता है.

• पति-पत्नी दोनों की कुंडलियों में जब जन्म राशि से शनि १,५,७ या ११वें भाव में शनि तथा गुरु गोचर करता है तो गर्भाधान के योग मजबूत होते है.

• इसके अतिरिक्त लग्न भाव, संतान भाव, भाग्य भाव पर शनि एवं संतान भाव को गुरु गोचर में दृष्ट करें तो गर्भधारण संभावित होता है.

• विवाह के बाद यदि पंचमेश या पंचम भाव से संबंधित ग्रहों की दशा मिलती है तो संतान सुख की संभावनाओं को बल मिलता है. इसके अतिरिक्त शनि और गुरु ग्रह की दशाओं में भी गर्भपात की संभावनाओं में कमी होती है. स्त्री कुंडली में मासिक धर्म की स्थिति का विचार करने के लिए चंद्र और मंगल का अध्ययन किया जाता है.

• जन्म चंद्र से गोचर चंद्र का ३,६,१० और ११ वें भाव पर गोचर करना तथा मंगल से संबंध बनाने पर मासिक धर्म गर्भधारण का रुप लेता है.

• पति-पत्नी दोनों की कुंडलियों में जब जन्म राशि से शनि १,५,७ या ११वें भाव में शनि तथा गुरु गोचर करता है तो गर्भाधान के योग मजबूत होते है.

• इसके अतिरिक्त लग्न भाव, संतान भाव, भाग्य भाव पर शनि एवं संतान भाव को गुरु गोचर में दृष्ट करें तो गर्भधारण संभावित होता है.

• जन्मपत्री में मंगल और शुक्र दोनों की स्थिति, युति या पूर्ण दृष्टि संबंध और इन ग्रहों का १,५ एवं ११वें भाव से संबंध होना संतान प्राप्ति की संभावनायें देता है.

• यदि चंद्रमा ६, ८ और १२वें भाव में हो तो महिला को गर्भधारण में अधिक कष्ट उठाना पड़ता है. चंद्र का इन भावों में जाना अधिक संवेदनशील और नकारात्मक बनाता है.

• जिस स्त्री की कुंडली में चंद्र लग्न, शुक्र धन, शनि एवं बुध बारहवें भाव और राहु संतान भाव में हो, उस स्त्री का एक से अधिक बार गर्भपात हो सकता है.

• जन्मपत्री में पंचमेश का शुभ और पाप ग्रहों की युति, दृष्टि और प्रभाव में आने पर भी गर्भपात हो सकता है.

• संतान भाव के स्वामी का वक्री अवस्था में और संतान कारक गुरु का राहु/केतु प्रभाव में होना भी एक से अधिक बार गर्भपात करा सकता है.

• संतान भाव यदि राहु/केतु अक्ष पर हो, पंचम भाव पर शनि की सातवीं दृष्टि, दूसरे भाव में चंद्र और मंगल की स्थिति होने पर गर्भधारण करने में परेशानियां आती है.

• स्त्री की कुंड्ली में चंद्र, मंगल पर शनि, राहु/केतु का प्रभाव आ रहा हो तो स्त्री को मासिक धर्म में अनियमितताओं का सामना करना पड़ता है.

• उपरोक्त योग स्त्री की कुंडलियों में होने पर मानसिक तनाव, डिप्रेशन, क्रोध और आवेश देता है. जिसके कारण स्वभाव प्रभावित होता है.

• चंद्र और मंगल दोनों का एक साथ आठवें भाव में स्थित होना गर्भपात दे सकता है.

• संतान भाव का स्वामी आठवें भाव में स्थित हो, पंचम भाव में उच्चस्थ गुरु उत्तम शिक्षा तो देता है परन्तु संतानहीनता देता है.

• शनि-मंगल की युति को पाप ग्रहों की युति, दृष्टि और स्थिति का प्रभाव प्राप्त होने पर रक्त विकारों के कारण संतान की कमी का सामना करना पड़ता है.

• स्त्री की कुंडली में यदि आठवां भाव में सूर्य एवं शनि हो तो संतानहीनता की स्थिति देता है.

• इसी प्रकार आठवें भाव में सूर्य और मंगल का एक साथ होना भी गर्भपात दे सकता है.

• सूर्य, गुरु और शुक्र एक साथ अष्टम भाव में हो तो मृत संतान का जन्म हो सकता है.

• सूर्य, चंद्र और बुध की स्थिति अष्टम भाव में होने पर स्त्री को संतानहीनता का सामना करना पड़ सकता है.

• अष्टम भाव में मंगल, शुक्र और गुरु तीनों हों तो गर्भस्त्राव समय से पहले होना शुरु हो जाता है.

• विवाह के बाद यदि पंचमेश या पंचम भाव से संबंधित ग्रहों की दशा मिलती है तो संतान सुख की संभावनाओं को बल मिलता है. इसके अतिरिक्त शनि और गुरु ग्रह की दशाओं में भी गर्भपात की संभावनाओं में कमी होती है. स्त्री कुंडली में मासिक धर्म की स्थिति का विचार करने के लिए चंद्र और मंगल का अध्ययन किया जाता है.

• जन्म चंद्र से गोचर चंद्र का ३,६,१० और ११ वें भाव पर गोचर करना तथा मंगल से संबंध बनाने पर मासिक धर्म गर्भधारण का रुप लेता है.

• पति-पत्नी दोनों की कुंडलियों में जब जन्म राशि से शनि १,५,७ या ११वें भाव में शनि तथा गुरु गोचर करता है तो गर्भाधान के योग मजबूत होते है.

• इसके अतिरिक्त लग्न भाव, संतान भाव, भाग्य भाव पर शनि एवं संतान भाव को गुरु गोचर में दृष्ट करें तो गर्भधारण संभावित होता है.

• जन्मपत्री में मंगल और शुक्र दोनों की स्थिति, युति या पूर्ण दृष्टि संबंध और इन ग्रहों का १,५ एवं ११वें भाव से संबंध होना संतान प्राप्ति की संभावनायें देता है.

• यदि चंद्रमा ६, ८ और १२वें भाव में हो तो महिला को गर्भधारण में अधिक कष्ट उठाना पड़ता है. चंद्र का इन भावों में जाना अधिक संवेदनशील और नकारात्मक बनाता है.

• जिस स्त्री की कुंडली में चंद्र लग्न, शुक्र धन, शनि एवं बुध बारहवें भाव और राहु संतान भाव में हो, उस स्त्री का एक से अधिक बार गर्भपात हो सकता है.

• जन्मपत्री में पंचमेश का शुभ और पाप ग्रहों की युति, दृष्टि और प्रभाव में आने पर भी गर्भपात हो सकता है.

• संतान भाव के स्वामी का वक्री अवस्था में और संतान कारक गुरु का राहु/केतु प्रभाव में होना भी एक से अधिक बार गर्भपात करा सकता है.

• संतान भाव यदि राहु/केतु अक्ष पर हो, पंचम भाव पर शनि की सातवीं दृष्टि, दूसरे भाव में चंद्र और मंगल की स्थिति होने पर गर्भधारण करने में परेशानियां आती है.

• स्त्री की कुंड्ली में चंद्र, मंगल पर शनि, राहु/केतु का प्रभाव आ रहा हो तो स्त्री को मासिक धर्म में अनियमितताओं का सामना करना पड़ता है.

• उपरोक्त योग स्त्री की कुंडलियों में होने पर मानसिक तनाव, डिप्रेशन, क्रोध और आवेश देता है. जिसके कारण स्वभाव प्रभावित होता है.

• चंद्र और मंगल दोनों का एक साथ आठवें भाव में स्थित होना गर्भपात दे सकता है.

• संतान भाव का स्वामी आठवें भाव में स्थित हो, पंचम भाव में उच्चस्थ गुरु उत्तम शिक्षा तो देता है परन्तु संतानहीनता देता है.

• शनि-मंगल की युति को पाप ग्रहों की युति, दृष्टि और स्थिति का प्रभाव प्राप्त होने पर रक्त विकारों के कारण संतान की कमी का सामना करना पड़ता है.

• स्त्री की कुंडली में यदि आठवां भाव में सूर्य एवं शनि हो तो संतानहीनता की स्थिति देता है.

• इसी प्रकार आठवें भाव में सूर्य और मंगल का एक साथ होना भी गर्भपात दे सकता है.

• सूर्य, गुरु और शुक्र एक साथ अष्टम भाव में हो तो मृत संतान का जन्म हो सकता है.

• सूर्य, चंद्र और बुध की स्थिति अष्टम भाव में होने पर स्त्री को संतानहीनता का सामना करना पड़ सकता है.

• अष्टम भाव में मंगल, शुक्र और गुरु तीनों हों तो गर्भस्त्राव समय से पहले होना शुरु हो जाता है.

• सूर्य, शनि अथवा राहु इन तीनों में से कोई दो ग्रह यदि पंचम या पंचमेश दोनों पर प्रभाव डालें तो गर्भपात होने की संभावनाएं बनती है.

• पंचम भाव, पंचमेश और गुरु का मंगल से युत या दृष्ट होना गर्भपात की आंशिक संभावनाएं बनाता है.

• कुंडली में इन तीनों का पीडित होना संतान में विलंब और देरी देता है. इन तीनों पर जितने अधिक ग्रहों का अशुभ प्रभाव होगा संतान प्राप्ति में उतना ही विलंब होगा.

• जन्मपत्री में पंचमेश यदि त्रिक भावों अर्थात ६,८ और १२वें भाव में हो तो संतान प्राप्ति की संभावनाओं में कमी होती है. यह कई बार गर्भपात एवं संतान हानि भी देता है.

• पंचम भाव में संतान कारक गुरु का स्थित होना, संतान भाव की हानि करता है. इस स्थिति में जातक को संतान होने की संभावनाएं कुछ कम होती है.

• जब जन्मपत्री के संतान भाव में मंगल स्थित हों और राहु स्थित हो तो संतान संबंधित कष्ट रहने की संभावनाएं बनती है.

• गर्भाधान मुहुर्त के समय यदि व्यय भाव के स्वामी पर शुभ ग्रहों की दृष्टि, युति या प्रभाव होना गर्भ की रक्षा करता है. इसके अलावा जब चंद्र केंद्र में या त्रिकोण भाव में हों तब भी गर्भपात की संभावनाएं कम बनती है.

• गर्भाधान के समय पर यदि लग्न भाव पर सूर्य का प्रभाव हो तब भी संतान और माता व पिता सभी सुरक्षित रहने के योग बनते है.

• सूर्य पहले, तीसरे, पांचवे या नवम भाव में हो या इनके स्वामियों से शुभ संबंध में हो तो इस समय में गर्भाधान करने पर गर्भ बने रहने के योग बनते है.

• प्रसव के समय यदि संतान भाव, लग्न भाव या एकादश भाव पर शनि व मंगल का प्रभाव होने पर संतान का जन्म शल्यक्रिया के द्वारा होता है.

उपाय

• संतान प्राप्ति और संतान सुख प्राप्ति के लिए पंचमेश का रत्न धारण करना लाभकारी रहता है.

• बृहस्पति संतान कारक हैं इसलिए बृहस्पति यंत्र का नित्य दर्शन पूजन करना चाहिए.

• जिन स्त्रियों को एक से अधिक बार गर्भपात की स्थिति का सामना करना पड़ रहा हो, उन स्त्रियों को चांदी के सर्प का पूजन दर्शन करना चाहिए. साथ ही संतान गोपाल मंत्र का ५ मुखी रुद्राक्ष माला पर नित्य जाप करना चाहिए.

• जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण का व्रत, पूजन कर संतान की कामना प्रभु के सम्मुख करनी चाहिए.

• संतान कामना पूर्ति के लिए भगवान शिव का दर्शन-पूजन करना चाहिए. संतान प्राप्ति के लिए रुद्राभिषेक करने से भी संतानहीनता में कमी होती है.

• चतुर्दशी तिथि के दिन संतान गोपाल अनुष्ठान कराना साथ ही मंगलवार के व्रत का पालन करना संतान बाधाओं को दूर करता है.

• शुभ मुहूर्त में संतान गोपाल मंत्र का सवा लाभ जाप करने से संतान सुख की प्राप्ति के संयोग बनते है.

• नित्य प्रात: स्नानादि क्रियाओं और ईष्ट देव का दर्शन पूजन करने के बाद लड्डू गोपाल जी का पूजन करना और माखन मिश्री का भोग लगना अति शुभ और संतान प्राप्ति की कामना पूर्ण करता है.

• सर्वप्रथम प्रात: भगवान श्री गणेश को धूप, दीप और फूल से पूजन कर निम्न मंत्र का एक माला जाप रना संतान प्राप्ति देता है.

मंत्र- ऊं क्लीं देवकी सूत गोविंदो वासुदेव जगतपते देहि मे, तनयं कृष्ण त्वामहम् शरणंगता: क्लीं ऊं।।

• पति-पत्नी दोनों एक साथ गुरुवार के दिन केले के वृक्ष के नीचे भगवान बालमुकुंद का पूजन करता है, उसकी संतान प्राप्ति की कामना शीघ्र पूरी होती है.

• इसके साथ ही गुरुवार के दिन कदली वृक्ष की पूजा करने के पश्चात कदली वृक्ष को गुड़ व चने का भोग लगायें. यह उपाय लगातार २१ गुरुवार करने पर संतान प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है.

• प्रदोष व्रत का लगातार ११ बार पालन करने से और भगवान शंकर का रुद्राभिषेक करने से संतान प्राप्ति के योग बनते है.

• संतान कारक गुरु की वस्तुओं जैसे – शिक्षण वस्तुओं का दान किसी शिक्षा स्थल में करने से संतान सुख बढ़ता है. इसके साथ ही गरीब बालक-बालिकाओं के रहन-सहन का व्यय उठाने और कन्याओं की सेवा करने से संतान प्राप्ति के योग प्रबल होते है.

• धर्म शास्त्रों के अनुसार श्रावण माह में आम, आंवले, नीम और पीपल के पौधे लगाने से संतान प्राप्ति की मनोकामनाएं शीघ्र पूरी होती है.

• शुभ मुहूर्त में हरिवंश पुराण का पाठ कराना चाहिए.

• नित्य पति-पत्नी दोनों गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ करें.

• कुंडली के पंचम भाव और सप्तम भाव पर यदि कोई अशुभ प्रभाव हों तो जल्द से जल्द ऐसे ग्रहों का उपचार करायें.

• रात्रि में दूध का सेवन करने की आदत डालें.

• भगवान शिव का विधि-विधान से नित्य पूजन करें.

• गुरुओं और बुजुर्गों का अनादर करने से बचें. यथासंभव गुरुओं की सेवा करें.

• धर्म परायण बनें और धार्मिक आचरण का पालन करें.

• गरीब और जरुरतमंदों की सेवा और मदद करें.

• भंडारों का आयोजन करायें.

• बाल आश्रम या अनाथालय में गुप्त दान करें.

संतान बाधा के योगों में से यदि एक से अधिक योग कुंडली में हों तभी संतान सुख में कमी समझनी चाहिए. संतान प्राप्ति में परेशानियां देने वाले अनेक योग बनने पर ही संतानहीनता समझना चाहिए. इसी तरह जब गर्भपात कराने वाले योग भी दो या दो से अधिक बन रहे हों तभी गर्भपात माना चाहिए. जातक को अशुभ योगों के नाम पर डराना नहीं चाहिए, योग कम और कमजोर हों तोइ केवल सावधानी रखने के लिए कहना चाहिए. साथ ही यह भी देखना चाहिए कि गर्भपात से संबंधित योग होने पर अशुभ ग्रहों से संबंधित दशाएं भी उस समय प्रभावी होनी चाहिए. योग, दशाएं और गोचर सभी अशुभ ग्रहों से जुड़ा आ रहा हो तो उपाय करने की सलाह देनी चाहिए और इस समय में गर्भधारण ना करने के लिए कहना चाहिए.

उदाहरण 1
03 जून 1952, 07:02 प्रात:, आगरा

मिथुन लग्न एवं कन्या राशि की कुंड्ली में हैं। कुंडली का पांचवा भाव षष्ठेश मंगल द्वारा ग्रहित हैं। पंचम भाव को अशुभ राहु की नवम और शुभ ग्रह गुरु की सप्तम दृष्टि प्राप्त हो रही हैं। पंचमेश व द्वादशेश शुक्र व्यय भाव में सूर्य और बुध के साथ हैं। संतान कारक गुरु पर भी रोगेश मंगल की दॄष्टि प्राप्त हो रही हैं। इस प्रकार कुंडली में पंचम, पंचमेश और कारक तीनों पीड़ित है।

उदाहरण २
18/01/1984, १५:३०, नवादा, बिहार

मिथुन लग्न एवं कर्क राशि की कुंडली हैं। पंचम भाव पर उच्चस्थ शनि और रोगेश मंगल स्थित है। पंचमेश शुक्र स्वयं रोग भाव में राहु/केतु अक्ष में स्थित है। कारक गुरु सप्तम भाव में स्वराशिस्थ है जिनपर अष्टमेश शनि की तीसरी दॄष्टि आ रही है। इस प्रकार यहां भी कुंड्ली में पंचम, पंचमेश और कारक गुरु तीनों ही पीडित अवस्था में होने के कारण शुभ फल देने की स्थिति में नहीं है।

उदाहरण ३
8 सितम्बर 1978, ८:४३ प्रात:, दुर्गापुर, पश्चिमी बंगाल।

यह कुंडली तुला लग्न और तुला राशि की हैं। कुंडली के पंचम भाव पर पंचमेश शनि, आयेश सूर्य और द्वादशेश बुध की दृष्टि आ रही हैं। पंचमेश शनि स्वयं सूर्य के निकट होने के कारण अस्त है। यहां कारक गुरु उच्चस्थ हैं, दशम भाव में हैं, जिनपर केतु की दृष्टि आ रही है।

पंचम, पंचमेश और कारक गुरु इस कुंडली में भी कमजोर है। महिलाओं की कुंडली में मंगल का विचार भी किया जाता है, मासिक धर्म का कारक ग्रह मंगल व्यय भाव में राहु के साथ हैं। कुंडली में ग्रह स्थित बहुत अच्छी नहीं बनी हुई है।

उदाहरण ४
03 अक्तूबर 1989, 14:52 , मचीलिपट्ट्नम, आंद्र प्रदेश

उपरोक्त जन्मविवरण से बनाई गई कुंड्ली में मकर लग्न और तुला राशि का उदय हो रहा है। कुंड्ली में पंचम भाव को भावेश शुक्र का बल प्राप्त हो रहा है। पंचमेश शुक्र पर किसी भी ग्रह का शुभ-अशुभ प्रभाव नहीं आ रहा है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि संतान कारक ग्रह गुरु रोग भाव में हैं, जिन पर शनि एवं राहु की दृष्टि आ रही है।

उदाहरण ५
१ जुलाई १९८७, १४:२०, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

कुंड्ली में पंचम भाव पर मारकेश मंगल की अष्टम दॄष्टि आ रही है। पंचमेश शनि वक्री अवस्था में हैं तथा जिन्हें रोग भाव में स्थित राहु का प्रभाव पीडित कर रहा है। इसके अतिरिक्त कुंडली में कारक गुरु मारक भाव में स्थित है। यहां पंचम भाव पर मंगल का प्रभाव आ रहा है। इस स्थिति में प्रसव की अवधि में माता को गहन चिकित्सीय जांच और उपचार का सामना करना पड़ता है। यही स्थिति इनके लिए बनी।

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