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महीनों बाद जागा नौकरशाह, पद्मश्री श्यामलाल से मांगा जीने की निशानी

अंकित मिंज :

बिलासपुर: डैडी फिल्म में एक गजल को अभिनेता अनुपम खेर मंच से गुनगुनाते हुए दिखाई देते हैं गजल की लाइन कुछ इस प्रकार है कि आईना फिर मेरी पहली सी सूरत मांगी मेरे अपने मेरे होने की निशानी मांगी।

यह पंक्ति कही फिट बैठे या ना बैठे लेकिन छत्तीसगढ़ के नौकरशाहों पर सौ प्रतिशत सटीक बैठती है। इन पंक्तियों को एक घटनाक्रम से अच्छी तरह से समझा जा सकता है।

लोग हतप्रभ और परेशान है कि आखिर ऐसा कैसे हो सकता है। क्योंकि जिस महान विभूति की जीवित होने की निशानी मांगी जा रही है उसे तो गुजरे एक महीने से अधिक हो चुका है। जबकि इसकी जानकारी पंडित श्यामलाल से जीने की निशानी मांगने वालों को भी है।

बावजूद इसके उनके जीवित होने का प्रमाण मांगा जाना पद्मश्री परिवार को अपमानित करने जैसा है। अब जानकारी मिल रही है कि अब जिला प्रशासन पत्र को विवाद में आने से पहले दबाने का भरसक प्रयास कर रहा है।

सबको मालूम है कि अप्रैल-2018 में दिल्ली स्थित दरबार हाल में देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने बिलासपुर की माटी पुत्र साहित्यकार पंडित श्यामाल को पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया था।

इस मंजर को देश के करोड़ों नागरिकों ने देखा। खासकर छत्तीसगढ़ के लोगों ने पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी की उपलब्धि को अपना मानकर जश्न भी मनाया। पद्मश्री मिलने के बाद बिलासपुर का नाम देश में गर्व से लिया जाने लगा।

नियमानुसार पद्मश्री मिलने के बाद छत्तीसगढ़ की सरकार पंडित श्यामलाल को सम्मान निधि ही भूल गयी। सरकार बदलते ही नौकरशाहों को गलती का अहसास हुआ।

आनन फानन में दो तीन पहले जिला कलेक्टर-संभागायुक्त और तहसीलदार को पत्र जारी कर कहा कि पद्मश्री पंडित श्यामलाल के जीवित होने का प्रमाण पत्र भेजा जाए। ताकि उन्हें सम्मान निधि भेंट किया जा सके।

जीने की निशाने मांगी

मालूम हो कि पद्मश्री पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी का सात दिसम्बर को देहावसान हो चुका है। पंडित श्यामलाल जब तक जीवित थे नौकरशाहों को सम्मान निधि देने का विचार ही नहीं आया। अब जबकि पद्मश्री चतुर्वेदी का निधन हो चुका है। नौकरशाहों को एक महीने बाद पंडित श्यामलाल को सम्मान निधि देने का ख्याल आया है।

जबकि पूरे प्रदेश को मालूम है कि पंडित श्याम लाल का निधन एक महीने पहले हो चुका है। अब लोगों को समझ नहीं आ रहा है कि रायपुर से जारी पत्र का क्या अर्थ निकाला जाए। यह जानते हुए भी कि निधन के बाद पद्मश्री श्यामलाल का सम्मान बहुत ही सामान्य तरीके से किया गया।

जबकि उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया जाना था। अब उनकी आत्मा और परिवार के सदस्यों को अपमानित करने नौकरशाह पत्राचार कर जीवित होने का प्रमाण पत्र मांग रहे हैं।

जीवित रहते नहीं मिला सम्मान, अब आयी याद

मालूम हो कि पद्मश्री पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी को मासिक सम्मान निधि जीवित रहते नहीं मिली। बिलासपुर के संभाग आयुक्त को सामान्य प्रशासन विभाग से अवर सचिव मेरी खेस्स ने 11 दिसम्बर को पत्र जारी किया है।

पत्र में कहा गया है कि पद्मश्री दामोदर गणेश बापटे और पं. श्याम लाल चतुर्वेदी के जीवित होने सम्बन्धी प्रमाण पत्र भेजा जाए। ताकि बजट आबंटन कर सम्मान निधि को प्रदान किया जा सके।

संभागायुक्त के पास पत्र आने के बाद जनवरी में एक पत्र कलेक्टोरेट कार्यालय से भी जारी हुआ है। डिप्टी कलेक्टर ने 31 दिसम्बर यानि करीब 20 दिन बाद, तहसीलदार को पत्र लिखकर प्रमाणित जानकारी कलेक्टोरेट में उपलब्ध कराने का कहा है।

प्रशानिक संवेदनहीनता की खुली पोल

पद्मश्री पंडित चतुर्वेदी के पुत्र पत्रकार सूर्यकांत चतुर्वेदी ने बताया कि निधन के बाद इस प्रकार का पत्राचार प्रशानिक संवेदनहीनता को जाहिर करता है। पिता जी का निधन महीने पहले हो गया।

बावजूद इसके इस प्रकार का पत्र जारी होना अपमानित करने जैसा है। प्रमुख विभूतियों के सम्मान को लेकर प्रशासन में बैठे लोगों को कितनी समझ और संवेदना है..पत्र के माध्यम से जाहिर हो रहा है।

सूर्यकांत ने बताया कि सम्मान निधि कितनी मिलनी है, इसकी जानारी उन्हें नहीं है। लेकिन जिला प्रशासन को अच्छी तरह से मालूम है कि पद्मश्री चतुर्वेदी का निधन हो चुका है। बावजूद इसके पत्र जारी कर पूछना पीड़ा दायक है।

बेहतहर होता कि कि जीवित रहते ही निधि के लिए पत्राचार किया जाता। सम्मानित होने के आठ महीने और निधन के एक महीने बाद इस तरह का पत्राचार दुखद और पीड़ा देने वाला है।

राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री ने दी थी शुभकानाएं

पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी का 7 दिसम्बर को निधन हो चुका है। दो अप्रैल 2018 को राष्ट्रपति भवन के दरबार हाल में उन्हें राष्ट्रपति ने पद्मश्री से सम्मानित किया था। इस दौरान राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द के अलावा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और विदेश मंत्री सुषमा स्वजराज समेत देश के बड़े बड़े नेता मौजूद थे।

पंडित श्यामलाल पद्मश्री से सम्मानित होने के पहले छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्यक्ष रह चुके थे। उन्हें केबिनेट मंत्री का दर्जा हासिल था। निधन होने पर साहित्यकारों ने जिला प्रशासन को इसकी सूचना दी थी। यह भी बताया गया कि उनको हासिल सम्मान और व्यक्तित्व को देखते हुए राजकीय सम्मान मिलना चाहिए।

लेकिन जिला प्रशासन को तब होश नहीं आया। जबकि सामान्य प्रशासन विभाग की गाइड लाइन में स्प्षट है कि किसी भी पद्म पुरस्कारों से सम्मानित और केबिनेट मंत्री दर्जा रखने वालों को अंतिम यात्रा में राजकीय सम्मान मिलना चाहिए। बावजूद पंडित श्यामलाल को यह सम्मान हासिल नहीं हुआ। अब निधन के बाद उनसे जीने की निशानी मांग जा रही है।

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