छत्तीसगढ़

कटघोरा वनमंडल में हाथियों का जमकर उत्पाद, पसान के बाद अब केंदई व जड़गा रेंज में ग्रामीणों का जीना हुआ दूभर, ख़ौफ़ में ग्रामीण कर रहे रातभर रतजगा

अरविन्द शर्मा:

कटघोरा: कटघोरा वन मंडल में इन दिनों हाथियों का जमकर उत्पाद देखने को मिल रहा है।पसान रेंज में तांडव मचाने के बाद अब हाथियों के एक बड़े दल ने केंदई व जड़गा रेंज की ओर रूख अख्तियार किया है, यहाँ रेंज में हाथियों ने आमद देते ही ग्रामीणों द्वारा उपार्जन की हुई फसलो को रौंद कर भारी नुकसान पहुंचाया है तथा कई कच्चे घरो पर भी इनकी जोर आजमाईश देखी जा सकती है जहाँ घरो की दीवारों को खिलौने की तरह ढहा दिया गया है।इतना ही नही इन हाथियों के ख़ौफ़ से ग्रामीण कड़कड़ाती ठंड में परिवार सहित अलाव जलाकर रतजगा करने को मजबूर हैं।वन अमला भी चैन की नींद नही ले पा रहा है, लगातार हाथियों को ट्रेस कर नजर रखे हुए हैं और ग्रामीणों की सुरक्षा को लेकर लगातार ग्रामीणों को समझाईश भी दे रहे हैं।

हाथियों का आतंक भी प्रभावित इलाकों के लिए एक बड़ी विपदा ही है,जहाँ ग्रामीण अपनी जान जोखिम में डाल ख़ौफ़ज़दा जीवन जीने को मजबूर हैं।बीहड़ जंगलो के बीच बसी ग्रामीण बस्तियां जहां शासन की योजनाएं पहुचने से पहले ही दम तोड़ देती हैं यहाँ न तो सुगम पहुँचमार्ग है और न ही आजकल के इंटरनेट या मोबाइल की उत्तम सुविधाएं।ऐसे हालातो में हाथियों की दस्तक ग्रामीणों के लिए एक बड़ी मुसीबत साबित हो रही है,जहाँ समय पर न तो ग्रामीणों को सुरक्षा मुहैया हो पाती है और न ही समय पर स्वास्थ्य सुविधाएं।जटिल अव्यवस्थाओ के बीच वन अमला भी जान जोखिम में डाल हाथी प्रभावित इलाकों में पहुँचकर ग्रामीणों को सुरक्षा मुहैया करा रहे है।ग्रामीण कहते हैं कि भला हाथी के सामने किसकी चलती है,अब वन अमला भी क्या करे इस विशालकाय प्राणी के सामने, आखिर वो भी तो हमारे तरह इंसान ही है।

केंदई रेंज के अंतर्गत ग्राम पंचायत आमाटिकरा में लगभग दो दर्जन से अधिक हाथियों ने डेरा जमाया हुआ है शाम ढलते ही हाथी घने वनों से निकलकर ग्रामीण बस्तियों की ओर कुच करते हैं जहाँ इनको खाने के लिए पर्याप्त मात्रा में किसानों द्वारा उपजाई सब्जी व धान की खरी मिलती है।रातभर हाथी इन बस्तियों में विचरण कर अपनी भूख मिटाते हैं और जमकर उत्पाद भी मचाते हैं।ग्रामीण इनके ख़ौफ़ से घरो को छोड़ अन्यत्र सुरक्षित स्थान पर एकत्र होकर अपनी जान बचाने को मजबूर है।पिछले वर्ष 2019 में भी हाथियों के एक बड़े दल ने जड़गा रेंज के पचरा व सलिहाभाठा में डेरा जमाकर स्थानीय निवासियों में ख़ौफ़ पैदा कर दिया था।इस बार पुनः हाथियों के आमद से यह पूरा छेत्र दहशत में है।शाम होते ही गलियारे सुने पड़ जाते हैं और कड़कड़ाती ठंड में ग्रामीण घरो के आगे अलाव जलाकर रात गुजारते है।ग्रामीण दिन में जंगलो से सूखी लकड़ियां एकत्र करते हैं और रात में अलाव जलाकर अपनी सुरक्षा करते हैं।

फसलो को भारी नुकसान व तोड़े आशियाने।

इन दिनों हाथियों का तांडव इस कदर हावी है मानो इनके रास्ते मे जो भी आया उनकी खैर नही है।कई महीनों की कड़ी मेहनत कर किसान फसल तैयार करते हैं और हाथी महज चंद घण्टो में ही किसानों की फसलो को पाव तले रौंद कर पानी फेर रहे हैंअब ऐसे में किसानों की फसल बर्बाद हो जाने से उनके लिए आय की बड़ी समस्या खड़ी हो गई है।इतना ही नहीं जिस आशियाने में किसान सह परिवार अपनी शरण लेता है उस आशियाने पर भी हाथियों ने सेंध लगा दी और दीवारों को ढहा कर उन्हें भी उजाड़ दिया।भारी नुकसान का सामना कर रहे किसान इन दिनों हाथियों से अपनी जान बचाते फिर रहे हैं।अब ऐसे हालातो में वनमंडल मुआवजा देकर उन किसानों के जख्मो पर मरहम तो लगा सकता है लेकिन एक बात समझ से परे है कि आखिर कब तक किसानों को यू ही वन्यप्राणियों का सामना करना पड़ेगा?क्या वन विभाग के पास वन्यप्राणियों के लिए कोई कारगर इंतजामात वनों में नही है जो इन्हें रहवासी छेत्रों की ओर रुख करना पड़ता है?आखिर कब तक इन हिंसक वन्यप्राणियों को वन अमला एक स्थान से दूसरे स्थान पर खदेड़ कर पल्ला झाड़ते रहेगा?

वन अमला भी ग्रामीण बस्तियों में हाथियों की दस्तक से चैन की नींद नही ले पा रहा है।जड़गा व केंदई रेंज का पूरा अमला इन्हें बस्तियों से दूर जंगलो की ओर खदेड़ने में लगा हुआ है।कटघोरा वनमंडलाधिकारी शमा फारूकी भी लगातार हाथियों का लोकेशन प्राप्त कर रही है और स्वयं भी ग्रामीण बस्ती पहुचकर ग्रामीणों को समझाईश दे रही हैं। पछिम बंगाल से हुल्लड़ पार्टी की मदद भी ली जा रही है ताकि जल्द से जल्द हाथियों को वनों की ओर खदेड़ा जा सके और ग्रामीण सुरक्षित रह सके।फारूकी ने स्थानीय ग्रामीणों से अपील की है कि हाथियों के नजदीक ना जाये और आसपास मौजूद पक्के मकानों में शरण लेकर सुरक्षित रहे।

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