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दो टूक (श्याम वेताल): पथभ्रष्ट हो गयी अमित शाह की वाणी ?

Vetal-Sir
श्याम वेताल

किसी को अपशब्द कहना या गाली देना एक ऐसी मानवीय प्रवृत्ति है जो युगों से चलती आ रही है. किसी को अपमानित करने अथवा तिरस्कृत करने के लिए जिस ओछी भाषा या शब्दों को प्रयोग किया जाता है, उसे गाली माना जाता है. सामान्य रूप से गालियों का प्रयोग उस समय किया जाता है जब दो पक्षों में संघर्ष हो रहा हो या किसी ने कोई अप्रिय कार्य किया हो. ईर्ष्या के वशीभूत होकर भी लोग गालियों का प्रयोग करते हैं.

चूँकि गाली देना एक मानवीय कमजोरी है इसलिए इसे खत्म तो नहीं किया जा सकता है लेकिन सभ्य समाज में खुले तौर पर गाली देना अशोभनीय एवं असभ्य व्यवहार माना जाता है.

राजनीति में वैचारिक संघर्ष सामान्य सी बात है लेकिन आवेग या आवेश में आकर कुछ भी ऐसा बोलना जो असंसदीय हो, राजनीतिज्ञ को शोभा नहीं देता बल्कि इसे उसकी कमजोरी माना जाता है.

भारतीय जनता पार्टी के स्थापना दिवस पर अध्यक्ष अमित शाह ने विपक्षी दलों के बारे में ऐसा ही कुछ बोला जिसे असंसदीय माना जा रहा है. कुछ राजनीतिक दल तो अमित शाह के प्रलाप को गाली ही मान रहे हैं.

अमित शाह विपक्षी एकता पर बोले कि जब कहीं भीषण बाढ़ आती है तो पेड़-पौधे पानी में बह जाते हैं, एक वटवृक्ष बच जाता है. ऐसे वक्त पर कई जीव-जंतु अपनी जान बचाने के लिए वटवृक्ष पर शरण लेते हैं. इन जीव-जंतुओं में सांप-नेवला, कुत्ते-बिल्ली, चीता शेर सभी शामिल रहते हैं. ये जीव-जंतु इस विपत्ति-काल में अपनी आपस की दुश्मनी भुला कर एक स्थान पर एकत्र हो जाते हैं. इस समय देश में जो मोदी जी की बाढ़ आयी है, उसे देखकर सभी विपक्षी दल आपस का बैर भाव छोड़कर एक साथ होने की कोशिश कर रहे हैं.

मुंबई में अमित शाह ने अपने भाषण में विपक्षी दलों की तुलना सांप-नेवले, कुत्ते-बिल्ली से कर जिस अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया उसका संदेश अच्छा नहीं रहा. आखिर, अमित शाह ने ऐसी तुलना क्यों की ? क्या भाजपा विपक्षी एकता से डर रही है ? क्या उन्हें कर्नाटक चुनाव में पराजय की चिंता सता रही है ? या वे भाजपा इतना मजबूत मानते हैं कि कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता ?

आमतौर पर यह भी देखने को मिलता है कि जब कोई अपने आस-पास के लोगों से ज्यादा बलिष्ठ होता है तो किसी को कुछ नहीं समझता. किसी को भी अपमानित और तिरस्कृत कर देता है. उसकी स्थिति मदांध जैसी होती है. अपने मद में वह किसी को भी गालियां दे देता है. तो क्या भाजपा प्रमुख 20 राज्यों में पार्टी का परचम लहराकर अपने को अपराजित योद्धा मानने लगे हैं ?

वैसे, इतिहास बताता है कि राजनीति में कोई हर हमेशा अजेय नहीं रहता. लोकतंत्र में लोक विरुद्ध कोई भी आचरण आपको आसमान से जमीन पर ला सकता है. इंदिरा गांधी इसका ज्वलंत उदाहरण है. इंदिरा गांधी भी मानती थी कि विपक्ष एक भी हो जाए तो मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा. लेकिन हुआ उलटा…देश की जनता ने उन्हें अर्श से फर्श पर ला पटका.

वैसे, वर्तमान परिदृश्य शनै: शनै: भाजपा एवं मोदी के विरुद्ध होता दिखाई दे रहा है. खासतौर पर दलित समुदाय भाजपा से नाराज होता जा रहा है. अब तक पार्टी के चार दलित सांसद अपनी नाराजगी का सार्वजनिक इजहार कर चुके हैं. 2 अप्रैल को भारत बंद के दौरान जो हिंसक वारदातें हुई वह भी भाजपा के खिलाफ गयी हैं. मुसलमान पहले से भाजपा को अपना विरोधी मानता रहा है. व्यापारी वर्ग, जिसे कभी भाजपा की रीढ़ माना जाता रहा है, नोटबंदी एवं जी एस टी से खिन्न हैं. हिंदू संप्रदाय जिसे राम मंदिर का लालीपॉप दिखाकर आकर्षित करते आ रहे हैं, वह भी भाजपा के बड़बोलेपन से क्षुब्ध हो गया है.

ऐसी स्थिति में भाजपा के पराभव की संभावना बढ़ जाती है. शायद, इसीलिए अमित शाह की वाणी पथभ्रष्ट हो गयी है. अभी तो जिह्वा पर सांप-नेवला, कुत्ता-बिल्ली ही आया है, क्या पता आगे ऐसी ही माहौल रहा तो अध्यक्ष महोदय और अधिक अशुभ व्यवहार करें या अशोभनीय एवं असंसदीय भाषा का प्रयोग करें !!!

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