ज्योतिष

भारत का प्राचीन वैभव तीन शास्त्रों में एकत्र

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव कुंडली विशेषज्ञ और प्रश्न शास्त्री 8178677715, 9811598848

भारत का प्राचीन वैभव तीन शास्त्रों में एकत्र है, ऐसा कहा जाता है कि तीन शास्त्र है –
1 भारतीय ज्योतिष अर्थात् गणित
2. भारतीय वैद्यिक शास्त्र अर्थात् आयुर्वेद
3. भारतीय संगीत अर्थात नादयोग

ये तीनों शास्त्र मनुष्य के साथ यथावत् निरन्तर चले आ रहे है। पृथ्वी के ऊपर आकाश में ग्रहों की दो महत्वपूर्ण घटनाओं में जो घनिष्ठ सम्बन्ध है वह प्रतिदिन दिखाई देता है। सूर्य का उदय होना अस्त होना, चन्द का क्षीण होते होते लुप्त हो जाना और उसी के साथ होने वाला ऋतु परिवर्तन मनुष्य के ध्यान में आया। उसे सूर्य चन्द्र के अतिरिक्त आकाश में उदय और अस्त होने वाले स्थिर रहने वाले तथा स्थिर न रहने वाले अनेक नक्षत्र उसे दिखाई दिये। उनकी गति से तथा उनके से निकट होने से पृथ्वी पर होने वाली घटनाएं दूरी होने पर भी प्रभावित होती है। यह समझ लेने पर उसने कुछ स्थिर निर्णय लिये इस प्रकार प्रचीनतम् संस्कृति में ज्योतिष शास्त्र का सवरूप अस्तित्व में था। आकाश में भ्रमण करने वाले ग्रह अपनी गति या भ्रमण करते समय एक विशिष्ट प्रकार कि ध्वनि का निर्माण करते है। और उन ध्वनियों के मिश्रण से एक प्रकार के संगीत की निर्मिति होती है।

यह सिद्धान्त प्राचीन विचारकों ने निश्चित किया ऐसे प्रचीन विचारकों में पाइथागोरस कानाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भारत तथा अन्य देशों का भ्रमण करने के उपरांत पायथागोरस ने यह सिद्धान्त निरूपित किया कि प्रत्येक ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र और तारा भ्रमण करते समय ध्वनि उत्पन्न करता है तथा उन ध्वनियों के मिलने पर एक प्रकार का संगीत का निर्माण होता है। यह नक्षत्र संगीत तथा नक्षत्र नाद मनुष्य के जन्म के समय उसके चित या मन पर अंति हो जाताहै।

वस्तुतः वह उसका जीवन वाद्य अथवा जीवन संगीत ही होता है इस संगीत से यदि उसका व्यवहार या जीवन शैली सुसंवादी हुई, तब तो उस जीवन सुखी हो जाताहै। अन्यथावह दुःखी रहता है। अतः कहे तो मनुष्य का स्वास्थ्य भी इस नक्षत्र संगीत के ससंवादित्व पर अवलंबित है। यह सम्पूर्ण विश्व एक पूर्ण शरीर ही है कोई भी भाग अलग अलग नहीं है अखिल विश्व एक सम्पूर्ण देह के समान है यह विराट विश्व देह के किसी भाग को कुछ हुआ तो उसका परिणाम पूरे शरीर पर होगा।

उदाहरण के तौर पर अगर हमारे हाथ पर चोट लगती है तो सिर्फ हाथ ही नहीं पूरा शरीर पीड़ित होता है वैसे ही विश्व के किसी भाग में बदलाव आता है तो पूरा ब्रह्माण्ड विश्व प्रभावित होता है अतः यह भी निश्चित है कि ग्रह, तारे, नक्षत्र से पृथ्वी पर के अणु-परमाणु तक प्रभावित होते है। और जब ऐसा होता है तो यह निश्चित है कि आकाश में व्याप्त ग्रह नक्षत्रों का नाद संगीत भी पृथ्वी के अणु प्ररमाणु को प्रभावित करता है। यह प्रतीत होता है कि संगीत और ज्योतिष दोनों परस्पर पूरक है। क्रियात्मक दृष्ट से ज्योतिष शास्त्र के सिद्धान्त को दो भागों में विभक्त किया गया है प्रथम भाग गणित एवं द्वितीय भाग फलित। ज्योतिष के प्रथम गणित भाग में शुद्ध गणित के साथ-साथ समय तन्त्र एवं सिद्धान्त ये तीन भेद है। इसी प्रकार फलितभाग को जातक ताजिक मुहूर्त प्रश्न एवं शकुन इन पांच भदो में विभक्त किया गया है। फलित ज्योतिष ज्ञान के लिये तिथि, नक्षत्र, योग, करण (समय) एवं वार इन

पांचों अवयवों के बारे में प्रारम्भिक जानकार परमावश्यक है। इन पांचों अवयवों से मिलकर ‘‘पंचांग शब्द बना है इन पांचों अवयवों का आवश्यक विवरण में कुण्डली के लिये तिथि, करण आवश्यक है।

तिथि –

चन्द्रमा की एक कला को तिथि कहते है। तिथि का मान चन्द्र एवं सूर्य के अंशों के अन्तर से निकाला जाता है। प्रतिदिन 12 अंशों का अन्तर सूर्य एवं चन्द्रमा के भ्रमण काल में होता है। ज्योतिष शास्त्र विज्ञान में तिथियों की गणना शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से की जाती है किसी भी दिन या क्षण में तिथि को मालुम करने के लए उस क्षण प चन्दमा की राशि अंश कला के मान मे से सूर्य के राशि अंश कला के मान को घटाया जाताहै। यदि उपरोक्त अन्तर 12 अंश तक हो तो उस दिन या क्षण पर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा होगी। जैसे ही यह अन्तर 12 अंशें से आगे बढ़ेगा। उस क्षण से द्वितीय तिथि का आरंभ होगा एवं 24 अंश तक द्वितीय तिथि रहेगी इसी 12 अंश के अन्तरल में तिथियाँ बढ़ती रहेगी।

चन्द्रमा अपनी कला के एक भाग 12 घण्टे पूरे करता है यह हमारे एस्ट्रोनोमी में वर्णित है कि सूर्य के चारो ओर पृथ्वी परिक्रमा लगाती है। वह एक दिन में 24 घण्टे लगाती है। सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने में और चन्द्रमा पृथ्वी के चारो चक्कर लगाते है। चन्द्रमा आकाश में 12 घण्टे अपना प्रकाश देता है। 12 घण्टे वह पृथ्वी और सूर्य के बीच रहता है। जिससे पृथ्वी पर सूर्य का प्रकाश नही पहुंच पाताहै। इससे पृथ्वी पर 12 घण्टे अन्धेरा व जब चन्द्रमा सूर्य क ेसामने से हटने लगाताहै तो पृथ्वी पर सूर्य का पूरा प्रकाश पहुंचने लगता है। सूर्य, पृथ्वी व चन्द्रमा की आपसी परिक्रमा से ही मानव जीवन चलता है सूर्य की क्रिया व पृथ्वी की परिक्रमा व चन्द्रमा की कला में कुछ भी परिवर्तन होने से मानव जीवन में भी परिवतन होता है। जैसे सुबह मनुष्य सूर्य के उदय के उपरान्त अपना कार्य प्रारम्भ करता है। गर्मी में अधिक गर्मी का ताप होने से मनुष्य को अपनी दिनचर्या पूरी करनी में परेशानी होती है। वैसे सर्दी सूर्य ना निकलने पर सर्दी का असर ज्यादाहोने से काम उसके हिसाब से होता है। वैसे पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगाती है। अगर व परिक्रमा ना करे तो एक ही जैसा वातावरण रहेगा। हमेशा पृथ्वी पर उजाला रहेगा।

उसी तरह चन्द्रमा अगर पृथ्वी की परिक्रमा ना करे तो कभी रात ना हो न मनुष्य को आराम करने का समय मिलेगा। पृथ्वी पर कभी रात नहीं होगी। अतः हम कह सकते है कि ब्रह्माण्ड में निरन्तरता में कुछ परिवर्तन से होने से मनुष्य के जीवन परअसर होगा उसी तरह संगीत में प्रयोग होने वाले स्तर तथा रागों का मनुष्य के जीवन पर प्रभाव पड़ता है। अतः हम कह सकते है कि स्वर तथा ग्रहों राशि का मनोविज्ञान से गहरा सम्बन्ध है मानव मन तथा भाव की अवस्था दिन गुजरने के साथ्ज्ञ साथ बदलती रहती है। यह इसलिये होता है क्योंकि दिन गुजरने के साथ-साथ वातावरण भी बदलता रहता है जो भाव प्रातःकाल होता है। वह रात में नहीं होता। इसका कारण ही वातावरण भौतिक तथ मनौविज्ञानिक के साथ अन्तक्रिया है। इन वातावरणों में असंख्या घटकों के का करण निरन्तर परिवर्तन आते रहते है।

यदि ये परिवर्तन मानव के अनुकूल हो तो मानव के भाव अच्छे बने रहेंगे। अन्यथा व्यक्ति परिशान चिंतित, तनावग्रस्त रहेगा। अतः हम कह सकते है कि ब्रह्माण्ड में होने वाली क्रिया का मनुष्य के व्यवहार एवं उसकी संगीत की अभिरूचि में असर पड़ता है। उसी तरह समय का संगीत अभिरूचि पर प्रभाव डालता है।

समय-

कहा जाता है समय एक जैसा नही होता। इस कथन का अर्थ सत्य है। अर्थात् मनुष्य का जो समय चल रहा है वही समय सम्पूर्ण जीवन नही चलता। क्योंकि पूरी सृष्टि हमारे सौर मण्डल पर आधारित है। सुबह उठने से रात के सोनेतक। जैसा हमें ज्ञात है हमारे जीवन में या ज्योतिष शास्त्र की भाषा में कहे तो हमारा जीवन कुण्डली के 12 भाव में रहने वाले 9 ग्रहों से है। यह ग्रह चल है यह हमेशा एक ही भावफल या राशि में नही रहते है। कभी ये कुण्डली के प्रथम भाव में कोई ग्रह होता है तो कुछ महीने बाद दूसरा। (सूर्य ग्रह) प्रत्येक ग्रह की अपनी अपनी विशेषता होती है उसी आधार पर यह मानव जीवन में परिवर्तन लाता है। कुण्डली में प्रत्येक ग्रह की 3 दृष्टि होती है उसी के आधार पर यह अपने फल दिखाता है तथा प्रत्येक ग्रह जिस भाव में होता है। वहाँ से 7 स्थानों पर ग्रह की एक जैसी दृष्टि होती है। समय जैसे परिवर्तन लाता है इनके कार्य में भी परिवर्तन आने लगता है। अर्थात जातक जब जन्म लेता है तभी से संगीत व ज्योतिष विद्या उसके साथ जन्म लेती है। संगीत में भी समय का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। समय के आधार पर 12 स्वरों का अध्ययन करने मानव जीवन को सुखद बनाया जा सकता है जिस तरह ज्योतिष शास्त्र में 24 घण्टों को 2-2 भागों में बांट कर 12 भाग बनाये है उसी सगीत में स्वरों को गाने के लिए या हम कहे किस समय कौन सा स्वर ज्यादा प्रभावी होगा इसके लिये संगीत में भी 12 भाग माने है।

सामवेद में स्वर, राशि और ग्रह की गणना –

सूर्य मानव शरी के व्रान्ति को प्रयुक्त करता है। मेष राशि का सूर्य उच्च तुला राशि का सूर्य नीचे वेद सूर्य के बारे में कहता है ‘‘सूर्यो आत्मा जगतस्थुषचं (सूर्यसुप्त में है) अर्थात् सूर्य शरीर की आत्मा, आत्मा से नाभी स्थान से प्रणव उच्चारण होता है। शास्त्रीय संगीत के सप्त स्वरों जो (सा) स्वर है वह भी नाभि से बोले जाते हैं। अतः हमें सूर्य को गांधर्व स्वर मानना चाहिए। चन्द्रमा मानव शरीर का मन होता है जैसे की मन घटता-बढ़ता है वैसे ही चन्द्रमा की कलाएँ घटती-बढ़ती रहती है। चन्द्रमा कर्क राशि का मालिक (स्वामी) होता है वृश्षिक वृषभ राशि में उच्च का वेद कहता हैं – चन्द्रमा मनसु जातकः (13-14 मन्त्र) अर्थात् मानव का शरीर का मन ही चन्द्रमा है। यदि हम चन्द्रमा को सप्त स्वरों में माने तो ऋषभ स्वर चन्द्रमा का स्वर है। क्योंकि ऋषभ का उच्चारण मन के स्थान का उच्चारण हुआ।

मन स्थान का स्थायी चन्द्रमा मानव शरीर का रक्त वह मगल ग्रह पर आधारित है। वेद में अग्निमुरधादिवाहा ककुदपातितः अर्थात् मानव शरीर मूरधा (दांत और तालु के बीच का स्थान) का सम्बन्ध सीधा कपाल से है।पृथ्वी हमारा शरीर है। सप्त स्वरों में मंगल का स्वर धैवत है। धैवत का उच्चारण मुरधा है तथा गंधार स्वर का उच्चारण भी मुरधा है। मेष व वृश्चिक राशि मंगल की होगी। (मेषः वृश्चिकयो भोमः) मेष राशि भोम की होती है। बुद्धि तत्व मानव शरीर तत्व का स्वामी बुध कहता है। (उद बुधस्यवाग्ने) अर्थात् मानव शरीर में जो ज्ञानेन्द्रियाँ है, उन्हें बुध माना है सप्त स्वरों में पंचम स्वर है। वहीं बुध का मालिक है या स्वामी पंचम स्वर बुध का मालिक है पंचम स्वर मध्यम है। बुध, मिथुन व कन्या राशि का स्वामी है। बृहस्पति (गुरु) ग्रह को वेदों में आत्मबल माना है। ‘‘बृहस्पति अति आतरियो’’ (अर्थात् मानव की कनइन्द्रियाँ) उसका मालिक गुरु है। धनु और मीन राशि का स्वामी गुरु ग्रह है। मध्यम स्वर का मालिक अर्थात् सामवेद के आधार (पंचम) है। इसका उच्चारण कंठ स्थान से किया जाता है। शुक्र ग्रह पुरूष-स्त्रीत्व होता है। शरीर में ‘‘वीर्यरितस’’ कहा जाता है। वेद कहता है ‘‘अनाथ परिश्रुतोरसमः’’ अर्थात् हमारे शरीर में जो भोजन प्रक्रिया द्वारा जो रस बनता है उस रस का जो परिसत्व है वह शुक्र है। ‘वृषभ-तुला शुक्रस्य स्वामी’ अर्थात् वृषभ व तुला राशि का स्वामी शुद्र है। सप्तस्वरों में (6) स्वर नि है। इसका उच्चारण दांत व ओस्ट का मालिक शुक्र है। नि स्वर में होता है। शनि ग्रह वह हमारे वायु स्तत्व का मालिक है (शनौ वाताहाः) अर्थात् वायु तत्व का मालिक शनि है। ‘मकर राशि तुला मकर तुम्भयो शनि’ अर्थात् मकर तथा कुम्भ राशि का स्वर शनि है। नि का मालिक शनि है। (वात शनि) राहु ग्रह पीत का स्थान पर स्थिति ‘‘कयानास्तः चित्रा आदहुति’’ (कफ हेतु) अर्थात् मंत्र के आधार पर देखा जाये तो वायु पीत हो गया राहु। अर्थात् हमारा पीत्राश्य और इसको विकृत स्वरों में राहु ग्रह उपस्थित रहता है। राहु की व्यक्तिश्य कोई राशि नहीं होती है। फिर भी कन्या राशि को राहु की उच्च राशि माना गया है। केतु ग्रह कफ तत्व का मालिक है, वेद मंत्र कहता है।कते क्वन्ति केतवः अर्थात् शरीर में जो अस्थमा रोग का कारक केतु होता है विकृत स्वरों में जो शास्त्रीय संगीत स्वर का मालिक केतु होता है। इस आधार पर 2-2 घण्टों के अन्तराल ने जन्म लेने वाले जातक के व्यवहार में परिवर्तन आने लगता है। उसी प्रकार संगीत विज्ञान को भी दिन के 24 घण्टों को 2-2 घण्टों में विभक्त करके स्वरों को व्यवहार परिवर्तन के आधार पर 12 स्वरों को अलग-2 समय में बांटा गया है। जिसे संगीत में राग स्वर समय चक्र बोला गया।यदि इस समय सिद्धान्त को हम सांगेतिक दृष्टि से देखे तो समय अतः हम इन दोनों गणना से यह कह सकते है कि मनुष्य का जीवन ज्योतिष शास्त्र व संगीत पर आधारित है। ज्योतिष व संगीत का सम्बन्ध है किन्तु राग समय चक्र के समय सिद्धान्त तथा जातक के समय सिद्धान्त के अनुपात के आधार पर निम्न समय में अमुख स्वरतथा उन स्वरों की राग व समय के आधार पर जातक पर प्रभाव डालने वाली राशि इस प्रकार है –

अतः राग समय सिद्धान्त के वादी सम्वादी स्वर को जातक के जन्म समय के आधार पर अनुपात किया। सर्वेक्षण विधि द्वारा ये पता लगाया कि भारतीय ज्योतिषशास्त्र व संगीत में सम्बन्ध किन्तु प्रयोगात्मक विधि से जातक पर राग समय चक्र व जातक के जन्म समय पर संगीत में प्रयुक्त राग के वाही सम्वाही स्वरों का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। तिथि व लग्न समय मनुष्य की कुण्डली बनाने में महत्वपूर्ण स्थान रखते है। कुण्डली में जिस तरह ग्रह राशि का व नक्षत्र का परिवर्तन होता है। उसी आधार मनुष्य के व्यवहार में परिवर्तन होता है तथा वह परिवर्तन सुख-दुख कैसे भी हो सकते है और हम सब जानते है कि संगीत मनुष्य के रूचि को परिवर्तित कर सकता है इसका कारण यह है कि हमारे ब्रह्माण्ड में 12 राशियाँ व 9 ग्रह तथा 27 नक्षत्र है व भारतीय संगीत में 12 स्वर माने गये हैं तथा हर राशि के प्रवृत्ति व स्वर के स्वभाव के आधार पर और जिस राशि का जो स्वर है वह उस राशि के जातक पर उस स्वर से बहुत प्रभावशाली असर पड़ता है इसलिये हम कह सकते है कि संगीत व ज्योतिष एक दूसरे के पूरक है। 2. ग्रह व राशि कारक तत्व तथा स्वामित्व पर स्वर लगाव 24 घण्टों को 2-2 भाग में बांट कर 12 भाग किये। 2-2 घण्टे के आधार पर मानव के व्यवहार को समझा गया तथा उसी आधार पर संगीत की अभिरूचि को जाना गया। अतः अब ज्योतिष शास्त्र के 9 ग्रह और 12 राशियों व 12 स्वरों के लगाव का अध्ययन करेंगे।
संगीत के सात स्वरों के सम्बन्ध में। स्वर सात ही है सा रे, म, प, ध, नि, किन्तु हम सा रे, म, प, ध, नि, सां कहकर आठ सवर लेते है। अन्तिम सा को लिये बिना पूर्णता नहीं आती है। किन्तु यह अन्तिम सा आठवा स्वर नहीं अपितु प्रथम स्वर सा की पुनरावृत्ति है।

स्वर सात ही है इन स्वरें के ‘कोमल’ ‘तीव्र’ ऐसे भेद होते है जिनके भेद नहीं होते, वे केवल दो स्वर है- ‘स’ और ‘प’। इसलिए इनको ‘अचल’ स्वर कहते है। ‘रे ग ध नि’ के कोमल और शुद्ध ये दो भेद है। ‘म’ शुद्ध और तीव्र ये दो भेद है। तीव्र स्वर केवल ‘म’ ही है अतः कुल स्वर 7 शुद्ध है व 5 विकृत है। (सा रे रे ग ग म म प ध ध नि नि। )अब हम ज्योतिष शास्त्र को देखे तो विदित हाता है कि ग्रह नौ है किन्तु प्रत्येक ग्रह सात ही है रवि, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरू, शुक्र, शनि। राहु, केतु ये सिर्फ बिन्दु है।

इनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है रवि ओर चन्द्र को छोड़कर शेष सभी ग्रहों को दो दो राशि का स्वामी माना गया है रवि तथा चन्द्र अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रह है। रवि तो सब ग्रहों का पिता है। इसी दृष्टिकोण से यदि संगीत के सम्बन्ध में विचार किया जाये तो ‘सा’ अथवा षड़ज सब स्वरों का पिता है। षडज छः स्वरां का जन्म दाता एक मात्र स्वर है -यह सर्वविदित है कि नौ गृह है। फिर भी प्रत्यक्ष ग्रह सात ही हैं – रवि, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरू, शुक्र और शनि। राहु तथा केतु – ये केवल बिन्दु है इनका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। रवि और चन्द्र को छोड़कर शेष सभी ग्रहों को दो-दो राशि का स्वामी माना गया है। रवि तथा चन्द्र अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रह हैं। रवि तो सब ग्रहों का पिता ही है। इसी दृष्टिकोण से यदि संगीत के संबंध में विचार किया जाए, तो ‘स’ अथवा षड्ज सब स्वरों का पिता माना गया है। षड्ज (स) अन्य छह स्वरों का जन्म-दाता एकमात्र स्वर है, क्योंकि उसी के आधार पर अन्य स्वरों की स्थिति है। इसीलिए यह स्वर ‘षड्ज’ कहलाया और यही कारण है कि रवि और षड्ज का नाता जोड़ने में आता है। रवि को केवल एक राशि का स्वामी माना जाता है और वह है सिंह राशि। षड्ज के कोमल-तीव्र भेद नहीं होते। रवि की भी एक

ही राशि है; वह दो राशियों के गुणधर्म को नहीं दर्शाता। अतः रवि षड्ज का स्वामी हुआ और उसकी राशि हुई सिंह। षड्ज के समान ही महत्वशाली स्वर है पंचम अर्थात् ‘प’। इस स्वर के भी ‘कोमल और तीव्र’ भेद नहीं होते। रवि के ठीक बाद क महत्वपूर्ण ग्रह है चन्द्र, जिसको एक ही राशि दी गई और वह है कर्क। अतः पंचम स्वर का स्वामी चन्द्र तथा उसी क्रम से पंचम स्वर की राशि कर्क होती है। अब अन्य स्वरों एवं ग्रहों का संबंध देखना है। ‘रे’ (ऋषभ) स्वर ‘स’ के निकट है। ‘स’ का स्वामी रवि निश्चित हो चुका। रवि के निकट का ग्रह है बुध। इसलिए ‘रे’ का
स्वामी बुध ठहरता है। इसके बाद आता है स्वर ‘ग’। उधर बुध का पश्चाद्वर्ती ग्रह है शुक्र। अर्थात् शुक्र हुआ ‘ग’ यानी गांधार का स्वामी। अब आता है स्वर ‘म’ यानी मध्यम। इस स्वर का स्वामी है मंगल। इसके बाद ‘प’ के पश्चात् आता है स्वर ‘ध’। इस स्वर का स्वामी होने वाला ग्रह है गुरु। ‘नि’ अर्थात् निषाद् स्वर ‘स’ से सर्वाधिक अंतराल पर है। उधर शनि भी सूर्य सर्वाधिक दूरी पर स्थित ग्रह है। इसलिए ‘नि’ स्वर का स्वामी हुआ शनि।

सा – क्योंकि उसी के आधार पर अन्य स्वरों की स्थिति है इसीलिये यह स्वर षड्ज कहलाता है। यही कारण है कि रवि और षडज का नाता जोड़ने में आता है। रवि को केवल एक राशि का स्वामी मना गया है वह है सिंह राशि, षडज व पंचम का कोई कोमल व तीव्र भेद नहीं होता।

प – ऋषभ स्वर षडज स्वर के निकट है ‘स’ का स्वामी रवि निश्चित हो चुका है रवि के निकट का ग्रह है बुध। इसलिए ‘रे’ का स्वामी बुध ठहरता है। ग – गंधार स्वर। उधर बुध का पश्चाती ग्रह शुक्र है अर्थात् शुक्र हुआ ‘ग’ यानी गंधार का स्वामी। इस स्वर का स्वामी है मंगल अब आता है। (म) स्वर इस स्वर का स्वामी मंगल है। इसके बाद ‘प’ का स्वामी चन्द्र निश्चित हो ही चुका है। ‘प’ के पश्चात् आता है स्वर ध। इस स्वर का स्वामी है गुरू फिर नि स्वर सा से सर्वाधिक अन्तराल में है इसलिये शनि सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर स्थित ग्रह है। इसलिये नि स्वर का स्वामी हुआ शनि, उक्त सातो ग्रहों और सात स्वर इस प्रकार है –

स्वर ग्रह
सा रवि
रे बुध
ग शुक्र
म मंगल
प चन्द्र
ध गुरू
नि शनि

सात ग्रहों में से रवि एवं चन्द्र को छोड़कर शेषपांच ग्रहों में प्रत्येक को दो राशि का स्वामित्व दिया गया है उसी प्रकार सात स्वरों में से ‘स’। और ‘प’ को छोड़कर शेष पांच स्वरों में से प्रत्येक के शुद्ध एवं कोमल तीव्र ये दो भेद होते है।यह पहले कहा जा चुका है स्वरों के स्वामी ग्रह हम निश्चित कर चुके। अब हमें देखना है कि इसी आधार पर ये ग्रह और इनकी राशियों किस किस स्वर से सम्बद्ध है। ज्योतिषीय आधार पर संगीत का प्रयोग विभिन्न ध्वनियों के स्वरों का सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास यहाँ पर किया गया है और यह प्रयास लग्न आधारित है। ज्योतिष सूर्य उदय से लग्न प्रारम्भ होता है। प्रत्येक दो घण्टे का लग्न माना गया है। उसी प्रकार 24 घण्टों को 12 भागां में दो-दो घण्टों के अनुपात में बाँटा गया है। इस सिद्धान्त पर राग समय आधारित है। जिस राशि में सूर्य होता है सूर्य उदय के समय उसी राशि का लग्न माना जाता है। इसी क्रम दृष्टि से 12 राशियों का 12 स्वरों का सम्बन्ध शोधार्थी ने इस प्रकार दिया है –

रवि सिंह सा
2 चन्द्र कर्क प
3 मंगल मेष
वृश्चिक
म शुद्ध
म तीव्र
4 बुध मिथुन
कन्या
रे शुद्ध
रे कोमल
5 गुरू धनु
मीन
ध शुद्ध
ध कोमल
6 शुक्र वृषक
तुला
ग शुद्ध
ग कोमल
7 शनि मकर
कुंभ
नि शुद्ध
नि कोमल

इस आधार पर ग्रह व राशियों के स्वामित्व के आधार पर स्वरों का लगाव ज्ञात हुआ।

भावफल द्वारा स्वरों तथा ग्रहों व राशियों की क्रमबद्ध करके उनकी कुण्डली का अध्ययन ललित कलाओं में ‘संगीत कला’ शिरोमणि है यह मन, बुद्धि और आत्मा को शान्ति पहुंँचाती है। प्रयोग रूप में कुछ जेलों में आजीवन कारावास के कैदियों को मानसिक शान्ति प्राप्त कराने एवं जीवन की मुख्य धारा में लाने के लिये संगीत की सहायता ली गई। उनको भजन धुन आदि गाने बजाने के लिये प्रेरित किया गया। भले ही उनके कंठ मधुर ओर संगीत सम्यक रूपेण राग ताल लयबद्ध न हो फिर भी वे इस प्रयोग से तनाव रहित बने, उनमें सुधार हुआ और उनको मानसिक तथा आत्मिक शान्ति प्राप्त हुई। प्रत्येक व्यक्ति, वह स्त्री हो या पुरूष ज्योतिष की परिभाषी शब्दावली मेंजातक कहां जाता है। ‘नाद’ क प्रति आकर्षण होने के कारण समान्यतः प्रत्येक जातक न्यूनाधिक रूप में सांगीतिक अभिरूचि से सम्पन्न होता है। अधिक संगीतिक अभिरूचि वाले जातक प्रयत्न्शील होकर व सहर्ष कर संगीत को व्यवसाय के रूप में अपनाते है। ग्रहों का प्रभाव संसार केसभी प्राणियों पर पड़ता है। इस सत्य को सभी

स्वीकार किया है। ग्रहों की शक्तियों जो मानव जीवन को चलाती है यह स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती किन्तु इसका अनुभव हर मनुष्य को होता है। सूर्य, चन्द्र प्रत्यक्ष में भी सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति के नाश कारक है। इन ग्रहों की किरणों का संसार पर असर पड़ता है।

वैज्ञानिक तौर पर यह भी सिद्ध हो गया है कि चन्द्रमा के प्रकाश 1$40 वां भाग तथा अन्य ग्रहों का प्रकाश पथ्वी पर नहीं पड़ता। स्थूल शरीरों पर जब इतना विचित्र प्रभाव है तो स्त्री-पुरूष के संगम काल में या बच्चे के जन्म काल मंत बच्चे के कोमल शरीर पर असर पड़ना स्वाभाविक है। जन्मकाल में कोमल शरीर पर सूर्यादि ग्रहों की किरणों का गर्मी-सर्दी के रूप में जो प्रभाव पड़ता है वही जीवन मरण या उसके बीय शुभाशुभ का कारण हो जाता है।

मनुष्य के प्रारम्भ का फल की घटना चक्र है। घटनाएं घटित हो जाने पर अल्पायास में महाफल प्राप्त होता है। प्रतिकूल दिशा में कठोर परिश्रम के बाद भी विपत्ति के सागर से नहीं निकाला जा सकता । अतः कर्म के साफल्य के लिये घटना कर्म की अनुकूलता और प्रतिकूलता परम प्रयोजनीय है। भावफल को समझने के लिये कुण्डली बनाना
व समझाना आवश्यक है। कुण्डली के बारह भाव को छः भाग में बांटा गया है।

1. केन्द्र- 1, 4, 7, 10 भाव को केन्द्र कहते है। पणफर – 2, 5, 8, 11 3 आपोल्किम – 3, 6, 9, 12
4. त्रिकोण- 5, 9 5. त्रिक- 6, 8, 10 6. त्रिषटाय- 3, 6, 11 भावफल कुण्डली में बारह भाव के कारक ग्रह

ग्रह राशि व स्वर का अवलोचन-
1. मेष –

मेष का स्वामी मंगल गृह है। सांगीतिक कुण्डली के अनुसार मेष राशि का स्वर शुद्ध मध्यम (म) है तानपुरे पर केवल शुद्ध मध्यम लगाकर यदि उस स्वर को मेष राशि वाला व्यक्ति सुने तो उसके मन को शांति एवं प्रसन्नता मिल सकती है। ऐसे व्यक्ति को शुद्ध मध्यम की प्रधानता वाले राग सुनने चाहिए। उसका मन शान्त और मनोबल बढेगा। सुनने योग्य ऐसे राग है- ललित, बोगेश्री, मोलकोंस, आभोगी, पहाड़ी आदि।

2. वृषक –

इस राशियाँ का स्वामी शुक्र है तथा सांगीतिक कुण्डली के अनुसार इस राशि कास्वर है शुद्ध ग अर्थात् गंधार। पंचम स्वर का तानपुरा जहां सुरीली आवाज में बजता है, वहां उसके गन्धार स्वर अपने आप निकलता है। वृषक राशि वाले व्यक्ति को ध्यानस्थ होकर पंचम स्वर का तानपुरा सुनना चाहिए इससे असीम आनन्द की प्राप्ति होगी। शुद्ध गन्धार की प्रधानता वाले राग वृषभ राशि वाले व्यक्ति को विशेष पसंद आते है। भूप, यमन, पूरिया, शंकरा, हिंडोल,बिलावल आदि।

मिथुन –

इस राशि का स्वामी बुध है स्वर कुण्डली में इस राशि का स्वर शुद्ध ‘रे’अर्थात् ऋषभ है। पंचम के तानपुरे से यह स्वर स्पष्टतः सुनाई देता है अतः इस राशि वाले व्यक्ति को पंचम का तानपुरा ध्यानस्थ होकर सुनना चाहिये। इससे अस्थिर मन एकाग्र हो जाताहै। और मन को शांति मिलती हे। शुद्ध रे और प के समान ही शुद्ध रे और शुद्ध ध कौन सर्गिक संवाद है। इसलिये इस राशि वाले व्यक्ति को शुद्ध रे प ध स्वर वाले राग सुनने गाने और बजाने चाहिये। उनका सकारात्मक प्रभव पड़ेगा। शुद्ध कल्याण कामोद छायानद देस देशकार, तिलक कामोद आदि।

कर्क –

इस राशिका स्वामी चन्द्र है। स्वर कुण्डली में पंचम यानी ‘प’ स्वर का इससे सम्बन्ध है। पंचम स्वरकी प्रबलता वाले राग इस राशि वाले व्यक्ति को पसन्द आते है। जैसे राग सांरग, कान्हड़ा, मलहर आदि के प्रकार गाने बजाने चाहिये।

सिंह –

इस राशि का स्वामी सूर्य है। और स्वर षड़ज है। ‘सा’ स्वर प्रत्येक राग में होता है। ‘स’ स्वर प्रत्येक राग में होता ही है। किन्तु जिस राग में यह वादी है वह सिंह राशि भी सिंह राशि को प्रभावित करते है। जिसमें ‘स’ संवादी है। मालकोंस, आभोगी, बागेश्री, ललित ये मेष राशि के राग है जो सिंह राशि को प्रभावित करता है। मेष का स्वामी मंगल और सिंह का स्वामी रवि ये दोनों मित्र है।

कन्या –

इस राशि का स्वामी बुध है। स्वर कुण्डली में इस राशि का स्वर है। कोमल ऋषभ (रे) कोमल स्वर करूणा एवं शांति से साक्षात्कार करवाता है। इस कारण कोमल रे वाले सभी राग कन्या राशि के लिये उपयुक्त है। उदाहरण के लिए राग
मारवा परिया, धनाश्री, भटियार, विभास, भैरव जोगिया।

7. तुला –

तुला राशि का स्वामी शुक्र है। स्वर कुण्डली के आधार पर तुला राशि का स्वर कोमल गन्धार (ग) होता है। काफी, भीमपलासी, तौड़ी मुलतानी शिवरंजनी, धानी, मधुवन्ती आदि राग इस राशि के लिये उपयुक्त है।

वृश्चिक –

यह मंगल की राशि है। स्वर कुण्डली में प्रदर्शित स्वर तीव्र मध्यम (म) इस राशि के लिये लाभदायक है तीव्र में रे सभी राग इस राशि वाले को पसन्द होते है। जैसे यमन, शुद्ध, सारंग श्याम कल्याण, केदार, सरस्वती, पुरिया आदि।

9. धनु –

इस राशि का स्वामी गुरू है। स्वर कुण्डली के अनुसार शुद्ध धैवत इस राशि के लिये लाभदायक है। जिनमें शुद्ध (घ) है वे सभी राग इस राशि वाले का पसन्द होते है। जैसे-देशकार हमीर दुर्गा।

10. मकर –

मकर और कुंभ इन दोनां राशियों का स्वामी शनि है। फिर भी दोनों घटा प्रति व्यक्ति भिन्न है। शनि ग्रह की नकारात्मक और सकारात्मक गुण इन दोनों राशियों में प्रकारांतर से दिखाई देता है। स्वर कुण्डली के आधार पर मकर राशि का स्वर शुद्ध नि है। बिहाग पटदीप आदि राग बजाने चाहिये।

11. कुम्भ –

इस राशि का स्वामी शनि है। स्वर कुण्डली के आधार पर राशि कास्वर कोमल नि है। कोमल नि वाले राग इस राशि क ेलिए लाभदायक है। जैसे कलावती, सरस्वती, आसावारी, मालकौंस।

12. मीन –

यह राशि ग्रह का प्रतीक गुरु है। स्वर कुण्डली के आधार पर इस राशि का स्वर कोमल धैवत (ध) है। वे सभी राग इस राशि के लिए लाभदायक है। जिसमें कोमल (ध) प्रयुक्त है। जैसे तोड़ी बसन्त, ललित, चन्द्रकोंस।

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