छत्तीसगढ़

किसान विरोधी कानून पारित ,देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से नष्ठ करने वाला है

इन कानूनो के जरिये आने वाले समय में केंद्र सरकार किसानों को मिलने वाले MSP को खत्म करने जा रही है।

बिलासपुर। प्रदेश कांग्रेस विधि विभाग के अध्यक्ष संदीप दुबे और प्रवक्ता सुशोभित सिंह ने कानून का पूरा विश्लेषण करके बताया कि तीनों नए कानून पूरी तरह से किसानों के हिट के विपरोत है।

तीन नए कानून किसानों के लिए लाई है तीनो के तीनो बिल्कुल किसान को खत्म कर देने वाले हैं हालिया समय में केंद्र सरकार 3 विषयों पर कृषि अध्यादेश ले के आई है जिन्हें राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल चुकी है। ये तीनों अध्यादेश भारत के करोड़ों किसान परिवारों के भविष्य से जुड़े हुए हैं।

एक तरफ सरकार व अनेक अर्थशास्त्री इस बात को मानते हैं कि कोरोनावायरस काल में सिर्फ किसानों की मेहनत/कृषि क्षेत्र के आधार पर ही देश की अर्थव्यवस्था का पहिया घूम रहा है, वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार MSP पर खरीद बन्द कर के किसानों का शोषण करने में लगी हुई है।

अगर देखा जाए तो आज भी किसानों को C2+50% के अनुसार फसलों का MSP नहीं मिल रहा है लेकिन उसके बावजूद किसान किसी तरह अपना जीवनयापन कर रहे हैं। यदि सरकार ने MSP पर खरीद को बंद कर दिया तो खेती किसानी के साथ-साथ देश की खाद्यान सुरक्षा भी बड़े संकट में फंस जाएगी।

केंद्र सरकार की मंशा

इन कानूनो के जरिये आने वाले समय में केंद्र सरकार किसानों को मिलने वाले MSP को खत्म करने जा रही है। केंद्र सरकार का दावा है कि इन अध्यादेशों के किसानों को फायदा होगा लेकिन असल में किसानों को नहीं बल्कि बड़ी-बड़ी कम्पनियों को फायदा होगा। यह बात आप सब जानते ही होंगे कि हमारी केंद्र सरकार के ऊपर WTO का दबाव है कि किसानों को मिलने वाला MSP एवम हर प्रकार की सब्सिडी केंद्र सरकार समाप्त करे। इस से पहले भी कांग्रेस व बीजेपी की सरकारों ने MSP को खत्म करने की तरफ कदम बढ़ाने की असफल कोशिश की लेकिन किसानों के दबाव के सामने उन्हें अपने कदम पीछे खींचने पड़े।

अब केंद्र सरकार कोरोनावायरस के कारण लगे लॉकडाउन का अनैतिक तरीके से फायदा उठाकर ये तीनों अध्यादेश ले के आई है, सरकार को लगता है कि कोरोनावायरस के कारण किसान बड़े पैमाने पर इकठ्ठे हो कर प्रदर्शन नहीं कर सकते इसलिये सरकार ने यह कदम उठाया। किसानों के विरोध को भांपने के लिए अब की बार मक्के व मूंग का 1 भी दाना MSP पर नहीं खरीदा गया, आगे आने वाले समय में केंद्र सरकार गेहूं व धान की MSP पर खरीद भी बन्द करने की दिशा में बढ़ रही है।

केंद्र सरकार जो 3 कृषि कानून ले के आई है, हम उन्हें विस्तार से आपके सामने रखते हैं।
1). पहला कानून है – Farmer’s Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Ordinance

● इस कानून के माध्यम से पैन कार्ड धारक कोई भी व्यक्ति, कम्पनी, सुपर मार्केट किसी भी किसान का माल किसी भी जगह पर खरीद सकते हैं।
● कृषि माल की बिक्री APMC यार्ड में होने की शर्त केंद्र सरकार ने हटा ली है।
● कृषि माल की जो खरीद APMC मार्किट से बाहर होगी, उस पर किसी भी तरह का टैक्स या शुल्क नहीं लगेगा।
● APMC मार्किट व्यवस्था धीरे धीरे खत्म हो जाएगी क्योंकि APMC व्यवस्था में टैक्स व अन्य शुल्क लगते रहेंगे।
● किसानों का माल खरीदने वाले पैन कार्ड धारक व्यक्ति, कम्पनी या सुपर मार्केट को 3 दिन के अंदर किसानों के माल की पेमेंट करनी होगी।

● समान खरीदने वाले व्यक्ति या कम्पनी और किसान के बीच विवाद होने पर SDM इसका समाधान करेंगे।
● पहले SDM द्वारा सम्बन्धित किसान एवम माल खरीदने वाली कम्पनी के अधिकारी की एक कमेटी बना के आपसी बातचीत के जरिये समाधान के लिए 30 दिन का समय दिया जाएगा,
● अगर बातचीत से समाधान नहीं हुआ तो SDM द्वारा मामले की सुनवाई की जाएगी। SDM के आदेश से सहमत न होने पर जिला अधिकारी के पास अपील की जा सकती है।
● SDM और जिला अधिकारी को 30 दिन में समाधान करना होगा।
● किसान व कम्पनी के बीच विवाद होने की स्थिति में इस अध्यादेश के तहत कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता।

यहां पर गौर करने की बात यह है कि प्रशासनिक अधिकारी हमेशा सरकार के दबाव में रहते हैं और सरकार हमेशा व्यापारियों व कम्पनियों के पक्ष में खड़ी होती है क्योंकि चुनावों के समय व्यापारी एवम कम्पनियाँ राजनीतिक पार्टियों को चंदा देती हैं। न्यायालय सरकार के अधीन नहीं होते और न्याय के लिए कोर्ट में जाने का हक हर भारतीय को संविधान में दिया है, नए अध्यादेश की वजह से किसानों को न्याय मिलना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

केंद्र सरकार ने इस बात की कोई गारंटी नहीं दी है कि प्राइवेट पैन कार्ड धारक व्यक्ति, कम्पनी या सुपर मार्किट द्वारा किसानों के माल की खरीद MSP (समर्थन मूल्य) पर होगी।

केंद्र सरकार के इस कानून से सबसे बड़ा खतरा यह है कि जब फसलें तैयार होंगी, उस समय बड़ी-बड़ी कम्पनियां जानबूझकर किसानों के माल का दाम गिरा देंगी एवम उसे बड़ी मात्रा में स्टोर कर लेंगी जिसे वे बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगी।

मंडियों में किसानों की फसलों की MSP पर खरीद सुनिश्चित करने के लिए व व्यापारियों पर लगाम लगाने के लिए APMC एक्ट अलग-अलग राज्य सरकारों द्वारा बनाया गया था। कानून के अनुसार APMC मंडियों का कंट्रोल किसानों के पास होना चाहिए लेकिन वहां भी व्यापारियों ने गिरोह बना के किसानों को लूटना शुरू कर दिया।

APMC एक्ट में जहां एक तरफ कई समस्याएं हैं जिनमें सुधार की जरूरत है, वहीँ दूसरी तरफ इसका एक सबसे बड़ा फायदा यह कि इसके तहत सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है कि किसानों के माल की खरीद MSP पर हो।

अब नए कानून के जरिये सरकार किसानों के माल की MSP पर खरीद की अपनी ज़िम्मेदारी व जवाबदेही से बचना चाहती है। जब किसानों के समान की खरीद निश्चित स्थानों पर नहीं होगी तो सरकार इस बात को रेगुलेट नहीं कर पायेगी कि किसानों के माल की खरीद MSP पर हो रही है या नहीं।

APMC Act में सुधार की आवश्यकता है लेकिन उसे खारिज़ कर के किसानों के माल खरीदने की इस नई व्यवस्था से किसानों का शोषण बढ़ेगा।

उदहारण के तौर पर 2006 में बिहार सरकार ने APMC एक्ट खत्म कर के किसानों के उत्पादों की MSP पर खरीद खत्म कर दी। उसके बाद किसानों का माल MSP पर बिकना बन्द हो गया और प्राइवेट कम्पनियाँ किसानों का सामान MSP से बहुत कम दाम पर खरीदने लगी जिस से वहां किसानों की हालत खराब होती चली गयी एवम उसके परिणामस्वरूप बिहार में किसानों ने बड़ी संख्या में खेती छोड़ के मजदूरी के लिए दूसरे राज्यों का रुख किया।

2). दूसरा कानून सरकार Essential Commodity Act 1955 में बदलाव के लिए लागू किया गया है –

पहले व्यापारी फसलों को किसानों के औने-पौने दामों ओर खरीदकर उसका भंडारण कर लेते थे एवम कालाबाज़ारी करते थे, उसको रोकने के लिए Essential Commodity Act 1955 बनाया गया था जिसके तहत व्यापारियों द्वारा कृषि उत्पादों के एक लिमिट से अधिक भंडारण पर रोक लगा दी गयी थी।

अब इस नए कानून के तहत आलू, प्याज़, दलहन, तिलहन व तेल के भंडारण पर लगी रोक को हटा लिया गया है।

हमारे देश में 85% लघु किसान हैं, किसानों के पास लंबे समय तक भंडारण की व्यवस्था नहीं होती है यानि यह कानून बड़ी कम्पनियों द्वारा कृषि उत्पादों की कालाबाज़ारी के लिए लाया गया है, ये कम्पनियाँ एवम सुपर मार्किट अपने बड़े बड़े गोदामों में कृषि उत्पादों का भंडारण करेंगे एवम बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे।

3). तीसरा कानून सरकार द्वारा कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के विषय पर लागू किया गया है जिसका नाम है
The Farmers Agreement on Price Assurance and Farm Services Ordinance

इसके तहत कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा दिया जाएगा जिसमें बड़ी- बड़ी कम्पनियाँ खेती करेंगी एवम किसान उसमें सिर्फ मजदूरी करेंगे। इस नए अध्यादेश के तहत किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर बन के रह जायेगा।

इस कानून के जरिये केंद्र सरकार कृषि का पश्चिमी मॉडल हमारे किसानों पर थोपना चाहती है लेकिन सरकार यह बात भूल जाती है कि हमारे किसानों की तुलना विदेशी किसानों से नहीं हो सकती क्योंकि हमारे यहां भूमि-जनसंख्या अनुपात पश्चिमी देशों से अलग है एवम हमारे यहां खेती-किसानी जीवनयापन करने का साधन है वहीं पश्चिमी देशों में यह व्यवसाय है।

अनुभव बताते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से किसानों का शोषण होता है। पिछले साल गुजरात में पेप्सिको कम्पनी ने किसानों पर कई करोड़ का मुकदमा किया था जिसे बाद में किसान संगठनों के विरोध के चलते कम्पनी ने वापस ले लिया था। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत फसलों की बुआई से पहले कम्पनियां किसानों का माल एक निश्चित मूल्य पर खरीदने का वादा करती हैं लेकिन बाद में जब किसान की फसल तैयार हो जाती है तो कम्पनियाँ किसानों को कुछ समय इंतजार करने के लिए कहती हैं और बाद में किसानों के उत्पाद को खराब बता कर रिजेक्ट कर दिया जाता है।

केंद्र सरकार का कहना है कि इन 3 कृषि कानूनों से किसानों के लिए फ्री मार्किट की व्यवस्था बनाई जाएगी जिससे किसानों को लाभ होगा लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि अमेरिका व यूरोप में फ्री मार्किट यानि बाजार आधारित नीति लागू होने से पहले 1970 में रिटेल कीमत की 40% राशि किसानों को मिलती थी, अब फ्री मार्किट नीति लागू होने के बाद किसानों को रिटेल कीमत की मात्र 15% राशि मिलती है यानि फ्री मार्किट से कम्पनियों व सुपर मार्किटों को फायदा हुआ है।

फ्री मार्किट नीति होने के बावजूद किसानों को जीवित रखने के लिए यूरोप में किसानों को हर साल लगभग 7 लाख करोड़ रुपये की सरकारी मदद मिलती है। अमेरिका व यूरोप का अनुभव बताता है कि फ्री मार्किट नीतियों से किसानों को नुक्सान होता है।

अगर किसानों का फायदा करना सरकार की मंशा होती तो केंद्र सरकार को APMC एक्ट में सुधार करना चाहिए एवम 1999 में तमिलनाडु में लागू की गई “उझावर संथाई” योजना पूरे देश में लागू करनी चाहिए।

इस योजना के तहत 1999 में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने किसानों एवम ग्राहकों के बीच सीधा संबंध स्थापित करने के लिए इस योजना को शुरू किया था। इसके तहत तमिलनाडु में “उझावर संथाई” मार्किट स्थापित की गई जहां पर किसान सीधे आ कर अपना माल बेचते हैं और वहां पर ग्राहक सीधे किसानों से माल खरीदते हैं।

इस योजना से खुले मार्किट के मुकाबले किसानों को 20% ज्यादा कीमत मिलती है एवम ग्राहकों को 15% कम कीमत पर समान मिलता है। इन मार्किटों के कड़े नियमों के अनुसार सिर्फ किसान ही अपना माल बेच सकता है और किसी व्यापारी को इन मार्किटों में घुसने की अनुमति नहीं होती। सम्पूर्ण दस्तावेज चेक करने के बाद ही किसान इस मार्किट में अपना सामान बेच सकते हैं।

इन मार्किटों में किसानों से दुकान का कोई किराया नहीं लिया जाता एवम किसानों को अपना माल स्टोर करने के लिए राज्य सरकार द्वारा फ्री में कोल्ड स्टोरेज व्यवस्था दी जाती है। इसके साथ साथ “उझावर संथाई” मार्किट से जुड़े किसानों को अपना माल लाने के लिए सरकारी बसों में फ्री ट्रांसपोर्ट सुविधा मिलती है। यदि समय रहते किसान नहीं जागे तो WTO के दबाव में केंद्र सरकार किसानों की फसलों की MSP पर खरीद बन्द कर देगी एवम किसानों के लिए जीवनयापन करना भी बहुत मुश्किल हो जाएगा।

इन तीन कृषि कानूनों के खिलाफ यह आंदोलन किसानों के भविष्य व अस्तित्व को बचाने की निर्णायक लड़ाई है, अतः सभी किसान बन्धु सरकार की इन किसान विरोधी नीतियों को समझें एवम अधिक से अधिक किसानों को जागरूक कर किसान आंदोलन में सहयोग करें।

हम देश के सभी गैर-राजनीतिक किसान संगठनों से यह निवेदन करते हैं कि अपने वापस के विरोधाभास भूला कर देश के किसानों के अस्तित्व व भविष्य को बचाने की इस लड़ाई के लिए एकजुट होना ही पडेगा।ब्लकि इन निजीकरण की नीतियो के खिलाफ खडा होना होगा ।नही तो आने वाली पीढिया हमे माफ नही करेगी।

Tags

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Back to top button