सोलह संस्कारों के अलावा भी है कुछ प्रचलित संस्कार

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव:

प्रसूता स्नान एवं कुआं पूजन

प्रसव के बाद प्रथम स्नान को प्रसूता स्नान कहा जाता है। इस संस्कार में 4, 6, 8, 9, 12, 14 तिथियों का त्याग करें। मिश्र नक्षत्र, मूल, श्रवण, मघा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, भरणी व चित्रा नक्षत्रों का भी त्याग करें। परिवार की परम्परा के अनुसार प्रसूता स्त्री जल या कुआं का पूजन करे। यह पूजन अधिक, क्षय मास में तथा चैत्र या पौष मास में अशुभ वारां में (मंगलवार तथा शनिवार), रिक्ता तथा अमावस्या आदि तिथियों का त्याग करके शुभ लग्न में करना चाहिए। कुछ परिवारों में 27वें दिन या 40वें दिन जल पूजन होता है।

दोलारोहण संस्कार (प्रथम बार झूले पर झूलाना)

जन्म से बारहवें, सोलहवें, बाईसवें दिन मृदु, लघु, नक्षत्रों में शुभ वारों में शिशु को पालने में लिटाएं। सूर्य नक्षत्र से पहले 5 नक्षत्रों में तथा इक्कीस से सŸाईसवें नक्षत्र में बालक को पालने में लिटाना चाहिए। बालक का सिर पूर्व में तथा पैर पश्चिम में करें। शयन मुद्रा में भगवान विष्णु का ध्यान करें।

विवाह मुहूर्त स्वयं कैसे जानने ? आप भी विवाह मुहूर्त निकाल सकते है ? यकीं मानिये

यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे अर्थात् सभी ग्रह अपनी अपनी उपस्थिति जीवित अवस्था में बताते हैं। इस कथन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति सभी ग्रहों से पूर्ण है। संसार में पिता के रूप में सूर्य, माता के रूप में चन्द्र, भाई के रूप में मंगल, बहिन के रूप में बुध, गुरु के रूप में बृहस्पति, पत्नी के रूप में शुक्र, जमीन, जायदाद कार्य तथा काम करने वाले लोगों के रूप में शनि, ससुराल और दूर के सम्बन्धियों के रूप में राहु, पुत्र, भांजा और साले आदि के रूप में केतु जीवित रूप में मानं जाते हैं।

विवाह मुहूर्त के सामान्य नियम
विवाह मुहूर्त का निर्धारण करते समय निम्न नियमों का पालन किया जाना चाहिए –
मास शुद्धि

माघ, फाल्गुन, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ व मार्गशीर्ष विवाह के लिए शुभ मास हैं। विवाह के समय देव शयन (आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी) उŸाम नहीं होता। यदि मकर संक्रांति पौष में हो तो पौष में तथा मेष संक्रांति के बाद चैत्र में विवाह हो सकता है अर्थात धनु व मीन की संक्रांति (सौर मास पौष व चैत्र) विवाह के लिए शुभ नहीं है। पुत्र के विवाह के बाद 6 मासों तक कन्या का विवाह वर्जित है। पुत्री विवाह के बाद 6 मासों में पुत्र विवाह हो सकता है। परिवार में विवाह के बाद छः मास तक छोटे मंगल कार्य (मुण्डन आदि) नहीं किये जाते।

जन्म मासादि निषेध

पहले गर्भ से उत्पन्न संतान के विवाह में उसका जन्म सौर मास, जन्मतिथि तथा जन्म नक्षत्र का त्याग करें। शेष के लिए जन्म नक्षत्र छोड़कर मास व तिथि में विवाह किया जा सकता है।

ज्येष्ठादि विचार

ज्येष्ठ पुत्र व ज्येष्ठ पुत्री का विवाह सौर ज्येष्ठ मास में न करें, यदि दोनों में से कोई एक ही ज्येष्ठ हो तो ज्ेष्ठ मास में विवाह हो सकता है।

ग्राह्य तिथि : अमावस्या, कृष्णपक्ष की चतुर्दशी, त्रयोदशी और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा कोछोड़कर सभी तिथियां।
ग्राह्य नक्षत्र : अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उ.फा., हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा,मूल, उ.षा., श्रवण, धनिष्ठा, उ.भा., रेवती
योग विचार : भुजंगपात व विषकुंभादि योग विचार लिया जाना चाहिए।
करण शुद्धि : विष्टि करण (भद्रा) को छोड़कर सभी चर करण शुभ तथा स्थिर करण मध्यमहैं।
वार शुद्धि : मंगलवार व शनिवार मध्यम हैं अन्य शेष शुभ वार हैं।
वर्जित काल : होलाष्टक, पितृपक्ष, मलमास, धनुस्थ और मीनस्थ सूर्य।
गुरु-शुक्र अस्त : गुरु शुक्र के अस्त होने के दो दिन पूर्व और उदय होने के दो दिन पश्चाततक का समय।
ग्रहण काल : पूर्ण ग्रहण दोष के समय एक दिन पहले व तीन दिन पश्चात का समयअर्थात कुल पांच दिन।
विशेष त्याज्य : संक्रांति, मासांत, अयन प्रवेश, गोल प्रवेश, युति दोष, पंचशलाका वेध दोष,मृत्यु बाण दोष, सूक्ष्म क्रांतिसाम्य, सिंहस्थ गुरु, सिंह नवांश में तथा नक्षत्रगंडांत।

योग

प्रीति, आयुष्मान्, सौभाग्य, शोभन, सुकर्मा, धृति, वृद्धि, ध्रुव, सिद्धि, वरीयान्, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, हर्षण, इन्द्र एवं ब्रह्म योग विवाह के लिए प्रशस्त हैं। अर्थात सभी शुभ योग विवाह के लिए प्रशस्त हैं।

विवाह के शुभ लग्न

विवाह में लग्न शोधन को प्राथमिकता दी गई है। अतएव दूसरे विचारों के साथ ही साथ लग्न शुद्धि का विशेष रूप से विचार करना चाहिये। मिथुन, कन्या और तुला लग्न सर्वोत्तम लग्न है वृषभ, धनु लग्न उत्तम है. कर्क और मीन मध्यम लग्न है

लत्तादि दोष

विवाह मुहूर्त में निम्नलिखित दस लत्तादि दोषों का विचार विशेष रूप से किया जाता है। प्रत्येक दोष मुक्त होने पर एक रेखा शुद्ध मानी जाती है और सभी लत्तादि दोष मुक्त हों तो अधिकतम दस शुद्ध रेखाएं संभव होती हैं।

किसी भी शुभ विवाह मुहूर्त के लिए दस में से कम से कम छः दोष मुक्त अर्थात् छः शुद्ध रेखाएं प्राप्त होनी चाहिए अन्यथा छः से कम शुद्ध रेखा होने पर विवाह मुहूर्त त्याग दिया जाता है। दस लतादि दोष निम्नांकित हैं। 1. लत्ता 2. पात 3. युति 4. वेध 5. यामित्र 6. बाण 7. एकर्गल 8. उपग्रह 9. क्रान्तिसाम्य 10. दग्धा तिथि

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव कुंडली विशेषज्ञ और प्रश्न शास्त्री
8178677715, 9811598848

ज्योतिष आचार्या रेखाकल्पदेव पिछले 15 वर्षों से सटीक ज्योतिषीय फलादेश और घटना काल निर्धारण करने में महारत रखती है। कई प्रसिद्ध वेबसाईटस के लिए रेखा ज्योतिष परामर्श कार्य कर चुकी हैं।

आचार्या रेखा एक बेहतरीन लेखिका भी हैं। इनके लिखे लेख कई बड़ी वेबसाईट, ई पत्रिकाओं और विश्व की सबसे चर्चित ज्योतिषीय पत्रिकाओं में शोधारित लेख एवं भविष्यकथन के कॉलम नियमित रुप से प्रकाशित होते रहते हैं।

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