कलाकारों को सम्मान तो मिलता है पर मेहनत का फल नहीं मिलता

अंकित मिंज

बिलासपुर।

मुम्बई की टीम के साथ एक छोटा किरदार निभाने के बाद अभिनय में रुचि जागी। इसके बाद कलाकार सोनू महंत ने कभी पीछे पलट कर नहीं देखा। कला को समर्पित यह कलाकार एक हजार से ज्यादा नाटकों व नुक्कड़ों के साथ ही हिन्दी व छत्तीसगढ़ी फिल्मों में अपना लोहा मनवा चुका है। सोनू का दर्द है कि बिलासपुर के कलाकार राजधानी रायपुर के कलाकारों की उपेक्षा का हमेशा शिकार होते है। उन्हें काम के बदले बेहतर मेहनताना नहीं मिला पाता।

चांटापारा निवासी सोनू महंत के अभियन क्षेत्र में आने की बड़ी ही रोमांचक कहानी है। उस दिन को याद करते हुए सोनू बताते है कि पूर्व जिला चिकित्सालय (सिम्स) में जब नाटक वो सुबह कभी तो आएगी देखने गए थे। जो एचआईवी पीडि़तों पर आधारित था।

मुम्बई की टीम का एक कलाकार छूट गया था, वह नाटक शुरु होने तक नहीं पहुंचा तो नाटक के कथाकार ने उसे भीड़ के बीच से बुलाया और साबुन बेचने वाले कर्मचारी की भूमिका करने कहा, पहले तो छोड़ा संकोच हुआ, लेकिन जब कथाकार ने विश्वास दिलाया की वह कर सकता है तो उसने हामी भरी और साबुन बेचने वाले का किरदार निभाया।

उस किरदार को करने के बाद ऐसा आत्मविश्वास जागा कि वह आज तक अभिनय के क्षेत्र में पूरी लगन व मेहनत के साथ अपने किरादार से इंसाफ करने की हर संभव कोशिश करते है। वो सुबह कभी तो आएगी से अभिनय की शुरुआत के बाद वह नहीं रुके। विभिन्न नाटकों में विभिन्न किरदार को जीवंत किया वही हिन्दी व छत्तीसगढ़ी फिल्मों में भी अभियन कर चुके है। कुछ फिल्मों के लिए बात भी चल रही है, जिसमें बेहतर रोल हैं।

कलाकारों को बढ़ावा देने शासन की योजना ही नहीं

सोनू महंत ने बताया कि वह 25 साल से अभियन के क्षेत्र में सक्रिय है। उन्हें नहीं पता कि शासन स्तर पर कभी कोई योजना कलाकारों को मंच प्रदान करने या उनके उत्थान के लिए तैयार की गई हो।

संस्कृति विभाग जरुर है, लेकिन उसका फायदा कभी वास्तविक कलाकारों को नहीं मिलता, जो चाटुकार या शासन के नुमाइंदों के करीब होते हंै, उन्हें मिलता हो तो इसकी जानकारी नहीं है। हां यह सच है कि उनकी प्रतिभा का दर्शकों से बहुत सम्मान मिला है और आगे भी मिलता रहेगा यही आशा करता हूं।

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