डिजिटलीकरण, ऋण मांग बढ़ाने का एजेंडा रह गया अधूरा : अरुंधति भट्टाचार्य

मुंबई: देश के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भारतीय स्टेट बैंक के चेयरमैन पद से शुक्रवार (6 अक्टूबर) को सेवानिवृत हुईं अरुंधति भट्टाचार्य ने कहा कि वह अपने पीछे दो एजेंडे- डिजिटलीकरण और ऋण मांग में वृद्धि को छोड़कर जा रही हैं. बैंक के 214 वर्ष के इतिहास में वह पहली महिला चेयरमैन थीं. चार साल का कार्यकाल समाप्त होने के बाद शुक्रवार (6 अक्टूबर) को वह सेवानिवृत्त हो गयीं. मीडिया से अंतिम बार मुखातिब होते हुए भट्टाचार्य ने कहा, “एक जिंदगी में ऐसा कोई पद नहीं है, जहां पहुंचकर कोई यह कह सके कि अब एजेंडा खत्म हो गया है. दरअसल, होता यह है कि आप एक एजेंडे से शुरू करते हैं और जैसे-जैसे आप आगे बढ़ते हैं, आप इसमें जोड़ते जाते हैं.” हम डिजिटल मोर्चे पर कुछ देना चाहते थे जो कि वास्तव में अलग था और जुलाई में कुछ समय के लिये ऐसा हुआ भी. अब, इसमें थोड़ी देर हो गयी है क्योंकि परियोजना का दायरा बढ़ गया है. जाहिर है कि यह अधूरा एजेंडा है, लेकिन यह मायने नहीं रखता क्योंकि हमने इस दिशा में काफी प्रगति की है.”

भट्टाचार्य ने आगे कहा कि महत्वपूर्ण और बड़े कदम उठाये जाने के बावजूद बैंक की ऋण मांग वृद्धि ज्यादा बेहतर नहीं हो सकी. उन्होंने कहा, “हालांकि, हमने जोखिम की निगरानी, प्रक्रियाओं में सुधार और अनुवर्ती प्रक्रियाओं को सुधारने के लिये हमने हर सभंव प्रयास किया. लेकिन उस समय हम ऋण वृद्धि को उस स्तर पर नहीं ला सके जहां हम चाहते थे. इसलिये यह भी एक अधूरा एजेंडा है. उन्होंने आगे कहा कि बैंक ने अच्छा, बुरा और उदासीन सभी दौर देंखे. यह रोचक के साथ-साथ बहुत ही मुश्किल यात्रा रही, लेकिन मझे लगता है कि हम इससे अच्छी तरह से बाहर निकल गये.

एसबीआई की पहली महिला चेयरमैन अरुंधति भट्टाचार्य स्टेट बैंक के साथ प्रोबोशनरी ऑफिसर के रूप में जुड़ने के बाद आज 40 साल, एक महीने और दो दिन बाद सेवानिवृत्त हो गयीं. एसबीआई की उनकी यात्रा बैंक की मुख्य शाखा कलकत्ता से शुरू हुयी और क्लाउड कम्प्यूटिंग के साथ खत्म हुयी.

सेवानिवृत्त के दिन उन्होंने एक साक्षात्कार में अपनी लंबी पारी का जिक्र करते हुये कहा कि वह पत्रकार बनना चाहती थीं. उनके शिक्षक कहते थे कि वह संपादक-मटेरियल थी. वह बैंकिंग क्षेत्र में अपने प्रवेश को “दुर्घटनावश” बताती है. लेकिन यह उनके लिये बुरा नहीं रहा है और एसबीआई के शीर्ष तक गयीं. बैंक के हर विभाग में अपनी छाप छोड़ने के बाद अब वह बैंकिंग और वित्त में पीएचडी करने की योजना बना रही हैं.

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