छत्तीसगढ़राजनीति

विधानसभा चुनाव 2018 : पहले दौर की पांच महत्वपूर्ण सीटें – सभी मुकाबले रोचक

चुनाव विश्लेषण: श्याम वेताल

     श्याम वेताल

रायपुर: देश के सबसे बड़े हिंदू पर्व के ठीक 5 दिनों बाद छत्तीसगढ़ के सामने लोकतंत्र का पर्व होगा। राज्य में 12 नवंबर को मतदान का पहला चरण संपन्न होगा। इस दिन प्रदेश की 90 सीटों में से 18 स्थानों पर वोट डाले जाएंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि इसी दिन 15 सालों से राज्य के मुख्यमंत्री पद पर आसीन डॉ. रमन सिंह का भाग्य इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में कैद हो जाएगा।

पहले दौर में जिन 18 सीटों पर मतदान होना है उनमें कम से कम 5 निर्वाचन क्षेत्रों पर सभी की नजर रहेगी। इन पांच क्षेत्रों में राजनांदगांव से स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह मैदान में हैं और उनका मुकाबला कांग्रेस की टिकट पर लड़ रही करुणा शुक्ला से है। करुणा शुक्ला स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी हैं। करुणा शुक्ला कांग्रेस में जाने से पहले भाजपा के प्रमुख नेत्री रही हैं इसलिए मुकाबला रोचक रहेगा। करुणा शुक्ला मुख्यमंत्री को कैसी टक्कर दे पाएंगी, यह कल्पना करना सहज होगा क्योंकि उनकी पार्टी के पास भाजपा जैसा न मनुष्य-बल है और न धनबल। जातिगत समीकरण भी बहुत ज्यादा उनके पक्ष में नहीं दिखता है। अटलजी की भतीजी होने का लाभ कितना मिलेगा, यह समय ही बताएगा।

इस दौर की दूसरी महत्वपूर्ण सीट नारायणपुर है जहां से राज्य के स्कूल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप एक बार फिर अपना भाग्य आजमा रहे हैं। यहां उनकी टक्कर कांग्रेस के चंदन कश्यप के साथ होगी। नारायणपुर ऐसा निर्वाचन क्षेत्र है जो नक्सल प्रभावित है। इसके बावजूद अपने पिछले कार्यकाल में केदार कश्यप ने क्षेत्र में भरपूर विकास कार्य किया है। क्षेत्र में केदार कश्यप के समर्थक और विरोधी दोनों हैं। इसलिए यदि यहां मतदान का प्रतिशत अच्छा रहा तो केदार कश्यप के सफल होने का रास्ता सुगम होगा। मंत्री होने के साथ ही केदार कश्यप बस्तर के दिग्गज नेता रहे बलिराम कश्यप के पुत्र हैं और बलिरामजी के प्रति पूरे बस्तर क्षेत्र में बहुत सम्मान है। उधर, चंदन कश्यप के लिए उनकी पार्टी पूरा जोर लगा रही है लेकिन नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण पार्टी की ओर से चंदन के पक्ष में ज्यादा प्रचार संभव नहीं है। अत: चंदन का अपना प्रभाव और क्षेत्र की जनता के लिए किए गए कार्य ही उनके सहायक होंगे।

तीसरी महत्वपूर्ण सीट भी एक मंत्री की है। सघन नक्सल प्रभावित निर्वाचन क्षेत्र बीजापुर से प्रदेश के वनमंत्री महेश गागड़ा चुनाव मैदान में हैं। उनका मुकाबला कांग्रेस प्रत्याशी विक्रम मंडावी से माना जा रहा है। महेश गागड़ा बीजापुर से तीसरा चुनाव लड़ रहे हैं। आदिवासी चेहरा होने के कारण भाजपा सरकार में उन्हें पहली जीत के बाद संसदीय सचिव का पद प्राप्त हुआ था और दूसरी जीत के बाद उन्हें राज्य मंत्री परिषद में स्थान मिल गया। लेकिन इस बार उन्हें एंटी इनकंबेंसी का सामना करना पड़ सकता है। क्षेत्र के लोग मंत्रीजी के अचार- व्यवहार से किंचित क्षुब्ध बताए जाते हैं। नक्सली इलाका होने के कारण बीजापुर में बहुत ज्यादा विकास कार्य भी नहीं हो सका है परंतु कांग्रेस प्रत्याशी विक्रम मंडावी भी क्षेत्र में इतने प्रभावी नहीं है कि वे हवा रुख मोड़ सकें। क्योंकि पार्टी की ओर से उन्हें विशेष मदद मिलने की उम्मीद नहीं दिखाई देती है।

चौथी सीट जो प्रथम चरण के मतदान के लिए महत्वपूर्ण होगी वह डोंगरगांव है। यहां राजनांदगांव के पूर्व सांसद और वर्तमान में महापौर मधुसूदन यादव को भाजपा का टिकट मिला है। हंसमुख, मिलनसार और मददगार के रूप में ख्याति अर्जित करने वाले मधुसुदन के प्रति समूचे राजनंदगांव में एक सहानुभूति है। वर्ष 2013 के चुनाव में उन्हें दोबारा लोकसभा का टिकट नहीं दिया गया था। उनके स्थान पर मुख्यमंत्री रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह को यह टिकट दिया गया और इसके बदले में मधुसूदन यादव को महापौर का पद दिया गया था। डोंगरगांव फिलहाल कांग्रेस द्वारा जीती सीट है। वहां कांग्रेस के विधायक दलेश्वर साहू हैं और इस बार भी पार्टी ने दलेश्वर साहू पर ही भरोसा जताया है। अत:, मधुसूदन यादव की टक्कर दलेश्वर साहू से होगी। दलेश्वर के सामने एंटी इनकंबेंसी फैक्टर आ सकती है।

प्रथम दौर की पांचवीं महत्वपूर्ण सीट जगदलपुर की है। यहां भाजपा के मौजूदा विधायक संतोष बाफना को पार्टी ने एक बार फिर अपना प्रत्याशी बनाया है जबकि, कांग्रेस ने अपना टिकट रेखचंद जैन को दिया है। संतोष बाफना ने क्षेत्र में विकास तो किया है लेकिन बहुतों की नाराजगी भी मोल ली है। दोनों ही प्रत्याशी सुविधा संपन्न हैं लेकिन, संतोष को भाजपा कार्यकर्ताओं की सशक्त टीम का लाभ मिल सकता है। उधर, कांग्रेस प्रत्याशी को उन लोगों का साथ मिल सकता है जो संतोष बाफना से किसी न किसी वजह से नाराज हैं।

इन पांचों सीटों पर मुख्य मुकाबले भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों के बीच ही होने हैं लेकिन, राज्य की सभी 90 सीटों पर चुनाव लड़ रहे छजकां-बसपा गठबंधन एवं आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी भाजपा और कांग्रेस दोनों के वोट कुतरेंगे जिससे किसी भी प्रत्याशी को जीत का बड़ा अंतर नहीं मिलेगा। राजनीति के विद्वानों का मानना है कि वोट कुतरने वाले दलों से ज्यादा नुकसान कांग्रेस का हो सकता है।

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