ज्योतिष

ज्योतिषीय सिद्धांत – नियम के विरुद्ध फल देते है

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव कुंडली विशेषज्ञ और प्रश्न शास्त्री “श्री मां चिंतपूर्णी ज्योतिष संस्थान 5, महारानी बाग, नई दिल्ली -110014 8178677715

पृथक करने वाली ग्रह युति

राहु, शनि और सूर्य इन तीनों में से दो या तीनों ग्रह भी जिस किसी भाव पर दृष्टि अथवा युति द्वारा प्रभाव डालते हैं, तो उस भाव संबंधी बातों से जातक को पृथक होना पड़ता हैं अर्थात व्यक्ति को इन विषयों का त्याग करना पड़ता है। जैसे दशम भाव तथा उसके स्वामी पर सूर्य शनि, सूर्य राहु, अथवा शनि राहु अथवा सूर्य शनि राहु का युति अथवा दृष्टि द्वारा प्रभाव हो तो दशम भाव से संबंधित विषयों जैसे सत्ता, पद और आजीविका एवं सम्मान से हटना पड़ता है। ऐसा कब होगा ? इसका निर्धारण ग्रह, गोचर और दशा के अनुसार किया जा सकता है। ठीक इसी प्रकार के ग्रहों का प्रभाव यदि सप्तम भाव, सप्तमेश तथा शुक्र अथवा गुरु पर पड़ता हो तो जातक को अपने जीवनसाथी से पृथक होना पड़ता है। यदि यह युति योग द्वितीय भाव पर बनता है तो व्यक्ति को अपने कुटुंब का त्याग करना पड़ता है। इसी प्रकार अन्य भावों में यह योग फल देता है। तृतीय भाव में यह योग बनने पर जातक को अपने भाईयों और मित्रों से पृथक होना पड़ सकता है। चतुर्थ भाव में यह योग घर छुड़ाता है। पंचम भाव में यह संतान से वियोग, षष्ठ भाव में यह योग ननिहाल से वियोग, अष्टम भाव में पिता के बड़े भाई से वियोग, नवम भाव में कुल परंपरा या धर्म से वियोग, एकादश भाव् में योग बनने पर लाभ क्षेत्र, कार्य धंधे और व्यापार बार बार छोड़ना पड़ता है। द्वादश भाव में यह योग बनने पर संसार के भोगों का त्याग अर्थात सन्यासी होने के योग बनते है। इस भाव में सूर्य, शनि तथा राहु वृद्ध ग्रह होने के कारण देरी से जीवन का अंत भी करते है। परन्तु सम्बंधित विषयों से वियोग भी देते है।

उदाहरण कुंडली

वृषभ लग्न, वृश्चिक राशि, शनि राहु लग्न भाव, मंगल पराक्रम भाव, शुक्र पंचम, सप्तम भाव में चंद्र, केतु और गुरु है। विवाह भाव पर शनि राहु की युति का प्रभाव, और सप्तमेश मंगल व कारक गुरु पर भी शनि की दृष्टि होने से यह महिला मात्र 18 वर्ष की आयु में विधवा हो गयी। जब कोई ग्रह किसी भाव में स्वराशिस्थ हो, और उसी भाव का स्वयं कारक भी हो तो ऐसी दशा में या तो बहुत अधिक शुभ फलों की प्राप्ति होती है या फिर बहुत अधिक अशुभ फलों की प्राप्ति होती है। इसका कारण यह है की जब ऐसे ग्रह पर कोई शुभ अथवा अशुभ प्रभाव पड़ता है तो वह प्रभाव उस भाव पर तथा उसके स्वामी पर ही नहीं अपितु कारक पर भी समान रूप से पड़ता है। ऐसे में शुभता हो या अशुभता पूर्ण रूप से फलीभूत होती है। उदाहरण के लिए – गुरु पंचम भाव में धनु या मीन राशि में स्थित हो और यहाँ गुरु को कोई अशुभ ग्रह दृष्ट या युत हो तो पाप ग्रह का प्रभाव से जातक को संतान का अभाव रहता है। संतान भाव, संतान भावेश और संतान भाव करक तीनों गुरु है और गुरु ग्रह पर पाप प्रभाव संतानहीनता दे सकता है। कारको भाव नाशाय योग कब काम नहीं करता इसी प्रकार जब गुरु पंचम भाव में धनु या मीन राशि में स्थित हो और शुभ ग्रह उस देखते हों अथवा युक्त हों तो पंचम भाव, पंचमेश और कारक उपरोक्त तीनों विषयों से सम्बंधित हो तो इस योग में जातक की संतानों के संख्या अधिक हो सकती है। इस प्रकार यहाँ कारको भाव नाशाय लोकोक्ति यहाँ रही है। क्योंकि कारक के स्वराशिस्थ होने पर अनिष्ट फल की प्राप्ति नहीं होगी, इसका कारण पंचम, पंचमेश और कारक ग्रह एक ही है और शुभ ग्रह प्रभाव होने पर बहुत अच्छे फल की प्राप्ति होती है। यहाँ हमें संतान का विचार करते समय पंचम से पंचम अर्थात नवम भाव का विचार भी अवश्य कर लेना चाहिए। अशुभ ग्रह अपनी राशि को दृष्टि दे तो जीव नाश करता है जब कोई पाप ग्रह जिसमें मंगल, राहु, केतु, शनि तथा सूर्य और चंद्र पक्षबलहीन (अमावस्या के बाद की छह तिथियां और शुक्लपक्ष के पूर्व की छह तिथियों में चंद्र पक्षबल में कमजोर होता है।), बुध शुभ ग्रह है परन्तु जब भी किसी अशुभ ग्रह के साथ होता है तो पापी हो जाता है। ये ग्रह जब सप्तम भाव में स्थित हो अपने भाव पर दृष्टि डालते है तो दृष्ट भाव के जीवन का नाश करते है। जैसे – पंचम भाव में कुम्भ राशि में स्थित सूर्य बड़े भाइयों के नाश की विजय बनता है। जबकि शास्त्रीय नियम यह कहता है की जो-जो भाव अपने स्वामी द्वारा युक्त अथवा दृष्ट हो उस उस भाव की वृद्धि होती है। परन्तु अनुभव में यह पाया गया है की यह नियम जीव विषयों में लागू नहीं होता अर्थात सूर्य का पंचम भाव में बैठकर एकादश स्थान में स्वराशि को देखने के फ़लस्वरूप एकादश भाव सम्बन्धी आय और लाभ जो बेहतर रूप में प्राप्त होते है परन्तु यह योग जातक के बड़े भाई के जीवन के सम्बन्ध में वृद्धि न कर, बड़े भाइयों का नाश करता है, ऐसे में बड़े भाइयों का यहाँ जीवित रहना कठिन होता है। यदि कोई शुभ ग्रह स्वराशि में केतु के साथ हो तो वह भाव बल प्राप्त करता है। जैसे कन्या लग्न हो तथा स्वराशिस्थ शुक्र द्वितीय स्थान में केतु युक्त हो तो जातक के द्वितीय भाव को बल मिलता है। ऐसे में जातक के पास धन आगमन प्रबल रूप से होता है। इसी प्रकार षष्ट भाव में धनु राशि में गुरु और केतु का एक साथ होना प्रबल शत्रु देता है। उदाहरण के लिए – कर्क लग्न, कर्क राशि, दूसरे भाव में शनि, पराक्रम भाव में मंगल, चतुर्थ भाव में बुध एवं शुक्र, पंचम भाव में सूर्य, छठे भाव में गुरु एवं केतु की युति ने इन्हें इनके जीवन में प्रबल शत्रु दिए, परन्तु कारक मंगल का अपने भाव को देखने के फलस्वरूप इन्होंने साहस से अपने शत्रुओं का नाश भी किया। इसका कारण यह है की केतु और राहु दोनों छाया ग्रह है। अन्य ग्रहों की तरह इन दोनों ग्रहों के पास कोई स्वामित्व नहीं है। इसलिए ये दोनों ग्रह जिस भाव में और जिस राशि में स्थित होते है, उसी के अनुसार फल देते है। अत : तुला राशि में स्वराशि का शुक्र केतु के साथ होने पर द्वितीय भाव के फलों को बूस्ट करने का कार्य करेगा। इसी तरह यह नियम राहु के साथ भी कार्य करता है।

वक्री ग्रह और फल

वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य एवं चंद्र सदैव मार्गी चलते है तथा राहु/केतु दोनों सदैव वक्री रहते है ये दोनों कभी मार्गी नहीं रहते है। इसके अतिरिक्त मंगल, बुध, गुरु, शुक्र तथा शनि स्थिति अनुसार कभी वक्री और कभी मार्गी होते है। इस विषय में हमारा अनुभव यह कहता है की मंगल,बुध, गुरु, शुक्र और शनि वक्र गति में ना होकर वक्री प्रतीत होते है। यहाँ ये ग्रह वक्री होने का आभास देते है। और आभासी होने की स्थिति में इनके फल इनके वास्तविक फलों से अधिक प्राप्त होते है। जब कोई ग्रह नीच राशिस्थ होने पर वक्री स्थिति में हो तो उसका फल उच्चस्थ होने जैसा मिलता है। इसके विपरीत जब कोई ग्रह उच्चस्थ होकर वक्री हो तो वह नीचस्थ होने के फल देता है। उदाहरण के लिए यदि वृश्चिक राशि में जन्म हो और गुरु नीचस्थ हो अर्थात गुरु मकर राशि में पराक्रम भाव में वक्री अवस्था में हो तो जातक को बहुत सारी संतानों की प्राप्ति होती है। तात्पर्य यह है की क्योंकि गुरु वृश्चिक लग्न वालों के लिए पंचम भाव के अधिपति और संतान के कारक ग्रह दोनों गुरु है और नीचस्थ होने पर वक्री है , ऐसे में संतान सुख अधिक मिलता है। यहाँ गुरु नीचस्थ होने पर अपने स्वभाव के विपरीत अर्थात उच्च के फल देता है। इस प्रकार यहाँ संतान संख्या सामान्य से अधिक रहती है। वृश्चिक लग्न में जन्म हो एवं गुरु वक्री अवस्था में दशम स्थान में हो तो इस स्थिति में गुरु कर्क राशि के निकट होने के कारण पूर्ण नीचता का फल नहीं देगा अपितु नीचता के फलों में कुछ कमी रहेगी। यहाँ गुरु उच्चराशि के जैसा होगा परन्तु वक्री होने के काऱण गुरु संतान का अभाव देता है। इसी प्रकार वृश्चिक राशि में लग्न हो और धनु राशि में गुरु वक्री स्थिति में हो तो वह नीचाभिलाषी साथ ही वक्री होने के कारण संतान संख्या अनुकूल संख्या में देता है। मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि ग्रहों को दो – दो राशियों का स्वामित्व प्राप्त है। इनमें से जब कोई ग्रह अपनी एक राशि को देखता है तो सम्बंधित राशि को बल प्राप्त होता है, साथ ही ग्रह की दूसरी राशि को भी बल मिलता है। इससे दूसरे भाव की राशि के विषयों के फलों में भी वृद्धि होती है। कर्क लग्न में जन्म हो, मंगल पराक्रम भाव में हो, चतुर्थ भाव में बुध व् शुक्र हो, गुरु षष्ठभाव में हो , दशम भाव में मंगल ग्रह की राशि है, और यहाँ मंगल की दृष्टि भी है, और यहाँ गुरु, शुक्र व् बुध तीनों शुभ ग्रहों की दृष्टि भी है। सर्वविदित है की सभी ग्रह अपने से सप्तम भाव पर दृष्टि देते है, और गुरु पंचम व् नवम भाव पर भी दृष्टि देते है। इसी प्रकार मंगल ग्रह की दृष्टि अपने से चतुर्थ व अष्ठम भाव पर भी रहती है, शनि अपने से सप्तम भाव, तृतीय भाव और दशम भाव को दृष्टि देते है। इसके कारण दशम भाव, अथवा राज्य, मान, पद, ख्याति आदि दी। पंचम भाव की भी वृद्धि होने के कारण इनका बुद्धिबल व मंत्रणाशक्ति भी अधिक रही। यहाँ पंचंम भाव में मंगल की राशि और सूर्य की स्थिति होने पर भी इन्हें पुत्र नहीं पुत्री की प्राप्ति हुई। यदि कोई ग्रह अपनी राशि में या उच्च राशि में, केंद्र में हो अथवा शुभ स्थान में स्थित हो और अपनी राशि में अष्टम स्थान में हो और पाप ग्रहों से दृष्ट भी हो तो जिस भाव का स्वामी होकर अष्टम में हो तो जातक की आयु कम रहती है। उदाहरण के लिए – तुला लग्न के जातक की कुंडली के दशम भाव में बृहस्पति स्थित हों, सप्तम भाव में मंगल हो तो छोटे भाई का जीवन अल्पकालीन होता है। यहाँ गुरु तृतीय भावाधिपति होने से छोटे भाई का प्रतिनिधत्व करता है। शुभ ग्रह होने के कारण, केंद्र में स्थित होने के कारण तथा उच्च राशि में स्थित होने के कारण छोटे भाइयों का जन्म लेना बहुत संभव है परन्तु तृतीय भाव से बृहस्पति अष्ठम होने के कारण तथा पाप दृष्ट होने के कारण इनके भाई अल्पायु के रहे। इस योग में छोटा भाई जन्म तो लेता है परन्तु दीर्घायु नहीं रहता है। यहां गुरु तृतीय भाव के स्वामी होने के कारण छोटे भाई का प्रतिनिधि है। शुभ ग्रह होने के कारण, केंद्र में स्थित होने के कारण, तथा उच्च राशि में स्थित होने के कारण छोटे भाइयों का जन्म लेना संभव बनाता है, परन्तु तृतीय भाव से गुरु की स्थिति अष्ठम भाव में होने के कारण तथा पाप दृष्ट होने के कारण इनके अल्पायु होने के संकेत मिलते है। इसी प्रकार कुम्भ लग्न में जन्म हो, मंगल दशम भाव में हो, अष्टम भाव में शनि हो तो भी छोटे भाई बहनों का जीवन लघु रहता है। यहाँ भी मंगल पराक्रमेश है और साथ ही तीसरे भाव के कारक ग्रह है अत: छोटे भाई बहनों से सम्बंधित सभी फल मंगल से ही देखे जाएंगे। दशम भाव में स्थित होने के कारण तथा स्वक्षेत्री होने के कारण बलयुक्त हुआ अत: छोटे भाइयों की उत्पत्ति का द्योतक हुआ परन्तु शनि द्वारा दृष्ट होने से एवं निज भाव से अष्टम भाव में होने के कारण छोटे भाइयों को अल्पायु देने वाला भी रहा। बुध अपना सर्वाधिक फल कुमार अवस्था में देता है व्यक्ति का जीवन कई पड़ावों से होता हुआ वृद्धावस्था को प्राप्त करता है। शिशु, कुमार, युवा, प्रौढ़ एवं वृद्ध अवस्था में मनुष्य जीवन के प्रथम भाग के समीप ही पा लेता है। इसी प्रकार जब बुध कुमार अवस्था में होता है तो वह अपने पूर्ण फल देने की स्थिति में होता है, अर्थात बुध अपने पहले ही भाग में फल दे देता है। जबकि शनि इसके विपरीत अपने प्रभाव को राशि के अंतिम भाग में प्रदर्शित करता है। आइये अब इसे एक उदाहरण के द्वारा समझते है – यदि कुंडली में बुध सप्तम भाव में स्वराशि में हो, शुक्र के साथ हो, एवं सूर्य अथवा शनि तथा राहु अथवा शनि से युक्त अथवा दृष्ट हो तो जातक को विवाह के एक वर्ष के अंदर अपने जीवन साथी से पृथक होना पड़ता है। यह स्थिति इसलिए बनती है क्योंकि, यहाँ सप्तम भाव, सप्तमेश और कारक तीनों पर सूर्य एवं शनि का पृथकतावादी प्रभाव पड़ा। एक अन्य उदाहरण देखिए – धनु लग्न हो, गुरु, बुध युक्त, सप्तम स्थान में स्थित हो तथा उन दोनों पर किसी भी प्रकार का अलगाव अर्थात सूर्य, शनि, राहु में से कोई दो ग्रहों का प्रभाव आ रहा हो तो वैवाहिक जीवन शीघ्र समाप्त हो जाता है। यहाँ गुरु की दृष्टि भी विवाह को बचा नहीं पाती है।

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