राष्ट्रीय

अयोध्या मामला : सरकार के लिए आसान नहीं होगा राम मंदिर निर्माण

अगले साल जनवरी में होगा फैसला

नई दिल्ली :

सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सोमवार को महज तीन मिनट तक चली सुनवाई के बाद अगली सुनवाई जनवरी, 2019 तक टाल दी है। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस.के. कौल और जस्टिस के.एम. जोसेफ़ की पीठ ने की. पहले इस मामले की सुनवाई चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नज़ीर की पीठ कर रही थी।

राम मंदिर को लेकर देश की सियासत में गहमा-गहमी का माहौल बनने लगा है। जहां एक तरफ सरकार पर विपक्षी पार्टियां अध्यादेश या कानून बनाकर मंदिर निर्माण के लिए दबाव डाल रही हैं। वहीं उसके अंदर से भी मंदिर निर्माण को लेकर आवाजें उठने लगी हैं। मगर सरकार के लिए ऐसा करना आसान नहीं होगा क्योंकि उसकी राह में बहुत से रोड़े हैं।

अयोध्या के राम मंदिर मामले पर रोड़े

1993 में आया था कानून

केंद्र सरकार 1993 में अयोध्या अधिग्रहण अधिनियम लेकर आई थी। जिसके तहत विवादित भूमि और उसके आस-पास की जमीन का अधिग्रहण करते हुए पहले से जमीन विवाद को लेकर दाखिल याचिकाओं को खत्म कर दिया गया था।

सरकार के इस अधिनियम को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई थी। जिसके बाद 1994 में अदालत ने इस्माइल फारूखी मामले में आदेश देते हुए तमाम दावेदारी वाली अर्जियों को बहाल कर दिया था और जमीन केंद्र सरकार के पास रखने को कहा था। अदालत ने निर्देश दिया था कि जिसके पक्ष में फैसला आएगा उसे जमीन सौंप दी जाएगी।

दोबारा नहीं बनेगा कानून

मुस्लिम पक्ष के वकील जफरयाब जिलानी का कहना है कि अयोध्या अधिग्रहण अधिनियम 1993 में लाए गए कानून को उच्चतम न्यायालय मे चुनौती दी गई थी। उस समय अदालत ने कहा था कि अधिनियम लाकर अर्जियों को खत्म करना गैर संवैधानिक है। सरकार लंबित मामले पर कानून नहीं ला सकती है। यह न्यायिक प्रक्रिया में दखलअंदाजी होगा।

बरकरार रहेगी यथास्थिति

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जज एसआर सिंह का कहना है कि विधायिका उच्चतम न्यायालय के आदेश को खारिज या निष्प्रभावी करने के मकसद से कानून में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं कर सकती है। बल्कि वह फैसले के आधार पर कानून में बदलाव कर सकती है।

अयोध्या मंदिर मामला अभी देश के उच्चतम न्यायालय में लंबित है और वहां यथास्थिति को बरकरार रखने के लिए कहा गया है। यदि सरकार ऐसे में कोई कानून बनाती है तो यह अदालती कार्यवाही में दखल होगा।

मामला लंबित रहने तक नहीं बनेगा कानून

दिल्ली उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जज आरएस सोढ़ी ने अयोध्या मामले पर कहा कि उच्चतम न्यायालय ने 1994 में एक फैसला दिया था। तमाम पक्षकारों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी है। जहां मामला लंबित है। ऐसी परिस्थिति में सरकार आधिकारिक तौर पर कोई दखल नहीं दे सकती है। हालांकि पक्षकार चाहें तो वह किसी भी समय आपसी समझौता कर सकते हैं।

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