गांव से ट्रंप का नाम हटाने के बाद ठनी

गुड़गांव. नूंह के मरोड़ा गांव से मंगलवार को ट्रंप के होर्डिंग्स और बैनर हटाने के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया है। आरोप और प्रत्यारोप के बीच जिला प्रशासन और सुलभ संस्था आमने-सामने आ गए हैं। बुधवार को जहां डीसी ने सुलभ इंटरनैशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन को फर्जी करार दे दिया। वहीं, संस्था के संस्थापक ने सवाल उठाया है कि जिस गांव के 60 प्रतिशत घरों में शौचालय है ही नहीं, उसे डीसी किस तरह खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) घोषित कर सकते हैं। संस्था ने डीसी का बयान दुर्भाग्यपूर्ण बताया है।

सुलभ इंटरनैशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक ने कुछ दिन पहले वॉशिंगटन में घोषणा की थी कि वह दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के प्रयास के तहत भारत में एक गांव का नाम ट्रंप पर रखेंगे। बिंदेश्वर पाठक ने 23 जून को हरियाणा के मेवात इलाके में स्थित इस गांव का नामकरण करने के अलावा गांव के विकास के लिए कई परियोजनाएं भी शुरू की थीं। मेवात के उपायुक्त एमआर शर्मा ने को बताया, ‘यह पूरा आयोजन बनावटी और फर्जी था और इसके आयोजकों का उद्देश्य देश-विदेश से रुपये इकट्ठा करना था।’

डीसी मनीराम शर्मा ने कहा कि मरोड़ा को जिला प्रशासन खुले में शौच से मुक्त करने की दिशा में अपने स्तर पर कार्य रहा है। इसे जल्द ही ओडीएफ घोषित कर दिया जाएगा। किसी भी गांव का नाम सरकार की अनुमति के बिना नहीं बदला जा सकता। यह संस्था फर्जी है।

डीसी एमआर शर्मा ने बुधवार को सरकारी प्रेस नोट जारी कर कहा कि सुलभ इंटरनैशनल संस्था फर्जी है। यह गांव में विकास के नाम पर लोगों को गुमराह कर रही है। बिना किसी परमिशन के ही संस्था ने इस गांव को ट्रंप का नाम दे दिया। इसकी कोई भी लिखित सूचना नहीं थी। इन आरोपों के बाद संस्था ने अपना पक्ष रखते हुए पूछा कि डीसी पहले यह बताएं कि किस आधार पर वे उनकी संस्था को फर्जी बता रहे हैं? यह संस्था साल 1970 से शौचालय का निर्माण करा रही है। मेवात में भी पिछले 8 से 9 साल से काम किया जा रहा है। सुलभ संस्था के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने कहा कि सुलभ संस्था भारत ही नहीं दुनियाभर में सैनिटेशन के लिए प्रसिद्ध है। संस्था किसी काम के लिए डोनेशन नहीं मांगती।

सुलभ से संस्थापक ने बताया कि उन्होंने मरोडा गांव को विकास के लिए इसलिए चुना क्योंकि यहां शौचालयों की संख्या काफी कम थी। मरोड़ा के करीब 120 घरों में शौचालय नहीं थे।

उन्हें बड़ा अजीब लगा कि जिस गांव के 60 प्रतिशत घरों में शौचालय नहीं हैं, उसे ओडीएफ घोषित कैसे किया जा सकता है।

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