फ्रांस के स्कूलों में मोबाइल फोन पर बैन, क्या भारत में भी होना चाहिए ?

बीते दिनों फ्रांस की संसद ने एक कानून बनाकर देश के प्राथमिक और जूनियर हायर सेकेंडरी स्कूलों में बच्चों द्वारा मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है। यह कानून सितंबर 2018 से लागू हो जाएगा। दुनियाभर में इस पर बहस शुरू हो गई है, कई लोग स्कूल में इसके फायदे गिना रहे हैं, जबकि फ्रांस के युवा प्रेसीडेंट इमैनुअल मैक्रों ने विभिन्न सर्वेक्षण, रिपोर्ट को आधार बनाकर बच्चों के स्कूल में सेलफोन के इस्तेमाल पर पाबंदी का बिल खुद पेश किया और सांसदों से इसके लिए समर्थन मांगा। भारत में भी कुछ लोग ऐसी पाबंदी के कानून की बात कर रहे हैं, क्योंकि हमारे यहां भी स्कूलों और इससे बाहर मोबाइल फोन के दुरुपयोग के मामले बढ़ते जा रहे हैं।

पिछले कुछ महीनों के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसे वीडियो टीवी समाचारों की सुर्खियां बने हैं, जिनमें कम उम्र के लड़के किसी अवयस्क लड़की के साथ जोर-जबरदस्ती कर रहे थे। हाथ में मोबाइल व उसमें इंटरनेट कनेक्शन ने इन युवाओं के दिल में अपराध की गंभीरता के बनिस्बत जल्दी कुख्यात होने या व्यापक भय पैदा करने की आपराधिक भावना को बलवती बनाया। भारत दुनिया में सबसे तेजी से मोबाइल उपभोक्ता में विस्तार वाले देशों में से एक है।

स्मार्टफोन अपराध का बड़ा कारण बन गया है। युवाओं को यह गलत राह की ओर मोड़ रहा है। दिल्ली से सटे नोएडा में स्कूली बच्चों ने अपनी ही टीचर का गंदा वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाल दिया। क्षणिक आवेश में किसी के प्रति आकर्षित हो गई स्कूली लड़कियों के अश्लील वीडियो क्लिप से इंटरनेट संसार पटा पड़ा है। इसके विपरीत कई बच्चों के लिए अनजाना रास्ता तलाशना हो या किसी गूढ़ विषय का हल या फिर देश-दुनिया की जानकारी या फिर अपने विरुद्ध हुए अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना, मोबाइल ने इनके लिए एक नई ताकत और राह दी है।

हालांकि यह भी सच है कि भारत और फ्रांस के सामाजिक-आर्थिक समीकरण बेहद भिन्न हैं। फ्रांस में किए गए एक सर्वे के अनुसार, देश के 12 से 17 साल आयुवर्ग के नब्बे प्रतिशत बच्चों के पास स्मार्टफोन है। भारत में यह आंकड़ा बहुत कम होगा। असल में वहां के शिक्षकों की शिकायत थी कि कम उम्र के बच्चे क्लास में फोन लेकर बोर्ड और पुस्तकों के स्थान पर मोबाइल पर ज्यादा ध्यान देते हैं। इससे उनके सीखने और विषय को याद करने की क्षमता प्रभावित हो रही है। स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर हो रहा है। पहले बच्चे जिस गिनती, पहाड़े, स्पेलिंग या तथ्य को अपनी स्मृति में रखते थे, अब वे सर्च इंजन की चाहत में उसे याद नहीं रखते। पाया गया कि कई बच्चों को अपने घर का फोन नंबर तक याद नहीं था।

हालांकि फ्रांस के कोई इक्यावन हजार प्राइमरी और सात हजार जूनियर सेकेंडरी स्कूलों में से आधे में स्कूल प्रशासन ने पहले से ही फोन पर रोक लगा रखी है, लेकिन अब यह एक कानून बन गया है। कानूनन बच्चा स्कूल में फोन तो लेकर आ सकता है, लेकिन उसे फोन को अपने बैग के भीतर या ऐसे स्थान पर रखना होगा, जहां वह दिखे नहीं। वैसे इस कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि यदि कोई बच्चा इसका उल्लंघन करता है, तो उसके साथ क्या किया जाए। फ्रांस के स्कूलों में अभी फोन मिलने पर टीचर उसे अपने पास रख लेते हैं और अगले दिन उनके माता-पिता को बुला कर उन्हें सौंप देते हैं।

पूर्व में अमेरिका के कुछ राज्यों में भी बच्चों के स्कूल में सेल फोन पर पाबंदी लग चुकी है, लेकिन बाद में उसे उठा लिया गया। जमैका में सन 2005 में, नाइजीरिया में 2012 में, मलेशिया में 2014 में ऐसे नियम बने। जापान, बेल्जियम, इंडोनेशिया आदि देशों में बच्चों के फोन के इस्तेमाल पर कुछ सीमाएं हैं, जैसे जापान में रात में नौ बजे के बाद बच्चे फोन के इस्तेमाल से परहेज करते हैं।

यह कटु सत्य है कि स्कूल में फोन कई किस्म की बुराइयों को जन्म दे रहा है। इसके साथ ही आज फोन में खेल, संगीत, वीडियो जैसे कई ऐसे एप उपलब्ध हैं, जिसमें बच्चे का मन लगना ही है और इससे उसकी शिक्षा और सेहत पर विपरीत असर पड़ता है। परीक्षा में धोखाधड़ी और नकल का एक बड़ा औजार भी यह बन गया है। यही नहीं, इसके कारण अपराध भी हो रहे हैं। स्मार्टफोन पर निरंकुश अश्लीलता किशोरों के लिए सबसे बड़ा जहर है। चूंकि ये फोन महंगे भी होते हैं, इसलिए अक्सर बेहतर फोन खरीदने या ज्यादा इंटरनेट पैक खरीदने के लिए बच्चे चोरी जैसे काम भी करने लगते हैं। विद्यालयों में फोन लेकर जा रहे बच्चों में से बड़ी संख्या धमकियों को भी झेलती है, कई तो शोषण का शिकार भी होते हैं।

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