बस्तर विश्वविद्यालय द्वितीय दीक्षांत समारोह

रोजगारपरक शिक्षा वर्तमान में नितांत जरूरी-राज्यपाल उईके

जगदलपुर : सामान्यतः लोग शिक्षा को रोजगार से जोड़कर देखते हैं और मूल्यांकन का आधार रोजगार को बनाते हैं।

शिक्षा वस्तुतः संस्कार है, जिससे मनुष्य-जीवन को एक दृढ़ आधारभूमि मिलती है। जीवन-यापन के लिए जीविका तो चाहिए ही, परंतु संस्कार के बिना मनुष्य की अर्थवता साबित नहीं होती।

यहां शिक्षा से तात्पर्य विद्यालय या महाविद्यालय अथवा विश्वविद्यालय की शिक्षा मात्र नहीं है, वरन् वह जो आजीवन चलती है।

हमारे आदिवासी भाईयों एवं बहनों के पास जो संस्कार हैं, वह किसी भी दृष्टि से पढ़े-लिखे व्यक्ति के संस्कार से कम नहीं हैं। मैं तो यह कहना चाहती हूं कि प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करने में जो ज्ञान मिलता है, वह किताबों में संभवतः अभी पूरा नहीं आ पाया है। हमारे आदिवासी भाई-बहनों के पास जो कौशल है, वह किसी पाठक्रयम में शामिल नहीं हो पाया है।

शिक्षा संस्कार के साथ-साथ कौशल-विकास का माध्यम है और जिस युवा में शिक्षा प्राप्त करने के बाद कौशल है, तो वह बेरोजगार भला कैसे हो सकता है। बस्तर वनोपज, कला और खनिज संसाधन से सम्पन्न है।

इस दिशा में विश्वविद्यालय की भूमिका रोजगारपरक शिक्षा की उपलब्धता पर होनी चाहिए। इसे ध्यान रखते हुए बस्तर विश्वविद्यालय में अधिक से अधिक रोजगारपरक पाठयक्रम संचालित किये जाएंगे, ताकि बस्तर अंचल के युवाओं को शिक्षा प्राप्त करने के साथ ही रोजगार की उपलब्धता सुनिश्चित किया जा सके।

यह बाद राज्यपाल एवं कुलाधिपति अनुसूईया उइके ने बस्तर विश्वविद्यालय के द्वितीय दीक्षांत समारोह में अध्यक्षीय उद्बोधन के दौरान कही।

राज्यपाल उइके ने कहा कि आधुनिक युग में विज्ञान और प्रोद्योगिकी के विकास के फलस्वरूप समय और दूरी दोनों में हम बचत तो करते ही हैं, श्रम भी कम लगता है। हमारी आश्रम-व्यवस्था में श्रम का महत्व आदि से अंत तक सदैव रहा है।

श्रम, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में संतुलन लाता है तथा हमारा बौद्धिक विकास भी श्रम से संभव है। हमारे युवा यह प्रयास करें कि वे साघनों के अधीन न होवें बल्कि साधन उनके अधीन हों। ज्ञान असीम-अनंत है। शिक्षा ज्ञान की कुंजी है।

संत कबीर के शब्दों में, शिक्षा ’’कागद की लेखी’’ है, ज्ञान ’’आंॅखिन देखी है’’। शिक्षा पढ़कर कार्यानुभव से प्राप्त हो सकती है, जबकि ज्ञान अनुभूतिजन्य होकर व्यक्ति के साथ अभिन्न हो जाता है।

हमारे शिक्षार्थी दीक्षांत के बाद अपने-अपने कार्यक्षेत्र में ज्ञान का विस्तार करने हेतु कटिबद्ध होंगे, तभी उनकी उपाधि की सार्थकता है। जिस विषय में हमें रूचि हो और अध्ययन में उत्तरोत्तर आनंद आता हो, वही विषय चुनने योग्य है और फलदायी है।

उन्होंने कहा कि सफलता कोई बिन्दु नहीं है, जिसे छूकर हम धन्य हो जाएं। वृक्ष एक बार फल देकर सफल नहीं होता है, बल्कि हर वर्ष फल देता है। सफलता एक निरंतर यात्रा है, जो कभी समाप्त नहीं होती। जो बाधाओं से डर कर यात्रा रोक देते हैं, वे सही यात्री नहीं हैं।

स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि मनुष्य इस सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी केवल जैविक दृष्टि से या बौद्धिक दृष्टि से नहीं है, वरन इसलिए है कि अन्य प्राणी प्रतिकूल स्थिति में जी नहीं पाते, मनुष्य प्रतिकूल से प्रतिकूल स्थिति को भी अपने वश में कर लेता है और विजयी होता है।

राज्यपाल उइके ने कहा कि इस विश्वविद्यालय से दीक्षित युवा अपने लक्ष्य की प्राप्ति में सफल होंगे और समाज में अपनी वास्तविक भूमिका का निर्वाह कौशल के साथ करेंगे।

विश्वविद्यालय से भी यही अपेक्षा है कि इस अंचल में वनों, पर्वतों, झरनों, जड़ी-बूटियों और खनिज के उन स्त्रोतों का उद्धारित करने में शोध-परियोजनाओं की परिकल्पना का वातावरण उत्पन्न करने के साथ-साथ युवाओं से उस वैज्ञानिक चेतना के विकास का मार्ग प्रशस्त करें, जिससे वे व्यक्तिगत, जातिगत, भाषागत, धर्मगत, क्षेत्रगत संकीर्णता से ऊपर उठकर “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना को आत्मसात कर सकें।

सकारात्मक सोच को बढ़ावा दें, तभी सही दिशा का अन्वेषण संभव है।
उन्होंने युवाओं से कहा कि हमने जो कुछ भी पाया है, वह अपने परिवार, समाज, प्रांत और देश से पाया है, अतः हम सबका यह कर्तव्य है कि उसे किसी न किसी रूप में समाज को लौटाएं।

हमें अपनी सोच, दृष्टि और सीमा को बढ़ाना या फैलाना होगा। व्यक्तिगत उन्नति या प्रगति तभी सार्थक है, जब वह समूह को भी प्रेरित या लाभान्वित करें।

राज्यपाल उइके ने दीक्षांत-समारोह में उपाधि प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राओं तथा प्रावीण्य-सूची में स्थान पाने वाले मेघावी छात्र-छात्राओं को हृदय से बधाइयां एवं शुभकामनाएं देते हुए कहा कि वे अपने व्यावहारिक जीवन में भी ऐसी ही प्रवीणता का परिचय दें और अपने परिवार, समाज और देश का नाम रौशन करें।

इस अवसर पर उच्च शिक्षा मंत्री उमेश पटेल ने बस्तर में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए हरसंभव पहल करने पर बल देते हुए बस्तर विश्वविद्यालय में रोजगारपरक पाठयक्रमों की शुरूआत करने का भरोसा दिलाया।

वहीं दीक्षांत समारोह के मुख्य वक्ता पद्मश्री प्रोफेसर अनिल कुमार गुप्ता ने बस्तर के पारम्परिक ज्ञान पर शोध एवं सृजन को बढ़ावा देते हुए युवाओं को रोजगार से जोड़ने का सुझाव दिया।

इसके साथ ही बस्तर की बहुमूल्य वनोपज का मूल्य संवर्धन करने तथा जैविक उत्पादों को पहचान दिलाने के लिए पहल करने की आवश्यकता निरूपित किया। दीक्षांत समारोह में 200 मेधावी छात्र-छात्राओं को गोल्ड मेडल प्रदान किया गया।

आरंभ में अतिथियों ने मॉ सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर दीक्षांत समारोह का विधिवत शुभारंभ किया। वहीं बस्तर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. शैलेन्द्र कुमार सिंह ने शैक्षणिक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर स्कूल शिक्षा मंत्री तथा प्रभारी मंत्री जिला बस्तर डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम, उद्योग मंत्री कवासी लखमा, बस्तर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष लखेश्वर बघेल, सांसद बस्तर दीपक बैज, सांसद कांकेर लोकसभा क्षेत्र मोहन मंड़ावी, विधायक जगदलपुर रेखचन्द जैन, महापौर नगर पालिक निगम सफिरा साहू सहित क्षेत्र के जनप्रतिनिधी और कमिश्नर बस्तर अमृत कुमार खलखो,

आईजी बस्तर रेंज पी. सुन्दरराज, प्रभारी कलेक्टर इन्द्रजीत चन्द्रवाल के अलावा जिला प्रशासन के अधिकारी, विश्वविद्यालय तथा बस्तर संभाग के महाविद्यालयों के प्राध्यापक, मीडिया प्रतिनिधी, छात्र-छात्राओं के पालकगण और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद उपस्थित थे। समारोह के अंत में बस्तर विश्वविद्यालय के कुल सचिव डॉ. विनोद कुमार पाठक ने आभार प्रकट किया।

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