विचार

बस्तर

अनिल विभाकर

अब न बस्तर जाने का है, न चित्रकोट
वहां फुनगियों पर बैठते ही हड़बड़ा कर उड़ जाते हैं तोते
मधुमक्खियों ने बंद कर दिया वहां हवाओं में मधु घोलना
अनगिनत धमाकों से
जहरीली हो गर्इं हवाएं वहां की
गायब हो गई सल्फी के रस की ठंडी नशीली मस्त तरावट
सुए भी अब नहीं सुस्ताना पसंद करते सल्फी के पेड़ों पर
मधुमक्खियां आती तो हैं
धुएं और धमाकों की वजह से भाग जाती हैं वे भी
महुए नहीं गमगमाते अब
न जाने कहां खो गई उनकी मादक गंध

दंतेवाड़ा की लावा नदी सालों से उगल रही है गरम लावा
और यह सब चुपचाप निहार रहीं हैं
शंखिनी व डंकिनी नदियों के मध्य बैठी मां दंतेश्वरी

दंतेवाड़ा के वे हरे-भरे घने जंगल
कल्लोल करती नदियां
वृषभ मुद्रा में अपने सींग उठाए लौह अयस्क का
वह अद्भुत बैलाडीला पर्वत
समझिए प्रकृति अपने पूरे सौंदर्य के साथ
अंगड़ाइयां भरती नजर आती है वहां
कौन नहीं देखना चाहता बस्तर का मशहूर दशहरा
वहां के आदिवासियों का सुआ नृत्य
जरा चख कर देखें तो वहां की चिरौंजी
बस्तर के जामुन,चार,तेंदूफल और न जाने
और भी कई अनचीन्हे जंगली फलों के स्वाद
जो भी चखेगा वह बार-बार जाना चाहेगा बस्तर
खाना चाहेगा चापड़ा चींटी की चटनी
बार-बार देखना चाहेगा वहां के मुर्गे की लड़ाई
हर बार खरीदना चाहेगा आदिवासियों के हुनरमंद हाथों से बनी
धातु की सुंदर जीवंत कलाकृतियां
हल्बी और गोंडी में बतियाना चाहेगा उनसे

न जाने किसकी नजर लग गई बस्तर को
धड़ामधूम और सलवाजुडूम हो रहा है वहां
कभी दंडकारण्य कहे जाते थे उसके जंगल
दंडकारण्य में किया था पांडवों ने अज्ञातवास
वहां है चित्रकोट जिसके खिलखिलाते जलप्रपात से
अनवरत झरती हैं रामायण और महाभारत की कथाएं
हर कोई देखना चाहेगा चित्रकोट
सुनना चाहेगा उसके जलप्रपात से झरती पंडवानी
उत्कल से आई पूरी की पूरी इंद्रावती नदी
हहाती हुई समा जाती है वहां धरती के गहरे तल में
न जाने कितने सैलानी बस्तर गए
नहीं गए अबूझमाड़ जो बना है अब भी सबके लिए अबूझ
अबूझमाड़ में अपना परचम लहराते हैं बहुरूपिए
भालू और चीते से भी ज्यादा हिंस्र ये बहुरूपिए
आदिवासियों के भित्तीचित्रों में
भरना चाहते हैं लाल रंग
बहुरूपिए नहीं सुनना चाहते पंडवानी

इस समय लहूलुहान है बस्तर
परेशान है बस्तर
दंडकवन में फिर लगी है आग
धूर्त और खून के प्यासे बहुरूपिए
छीन रहे हैं वहां के मासूम लोगों से मांदल
उनके सपनों के मोरपंख
उतार रहे उनके सिर से खूबसूरत शृंगमुकुट
और उन्हें पहना रहे अपनी टोपियां
मांदल पर थिरकती उंगलियों को घवाहिल करना चाहते हैं बहुरूपिए

बहुरूपिए नोंच रहे हैं उनके सुआपंख
लड़ा रहे उन्हें मुर्गे की तरह
उन्हें थमा रहे बंदूक,हथगोले
जला रहे उनके घरौंदे
हरे-हरे सुआपंख नोंच उन्हें पहना रहे फौजी पोशाक
बस्तर के जंगलों में न जाने कब से लगी है आग
हर तरफ उठ रहा है धुआं
जिसमें गुम हो गई मांदल की थाप
कोई देखे भी तो वहां जाके
सब कुछ होते हुए सुआपंख के बिना
दम तोड़ रहा है बस्तर

बस्तर चाहता है कोई लौटा दे उसके सुआपंख
वह करेगा सुआनृत्य
बस्तर बचाना चाहता है अपना बैलाडिला पर्वत
वहां के लोग देखना चाहते हैं हिमालय
मांगना चाहते हैं थोड़ी सी बर्फ पर्वतराज से
उन्हें लगता है हिमालय की बर्फ से
बुझ जाएगी बस्तर में लगी आग
आग बुझते ही वे फिर बटोर लाएंगे सुआपंख
सींचेंगे अपने सल्फी के पेड़ों को
वे उतार फे केंगे पराई टोपियां
बस्तर पहनेगा अपना शृंगमुकुट

वह लौटना चाहता है अपने अतीत में
चित्रकोट के जलप्रपात- सा कल्लोल करना चाहता है
वह चाहता है मधुमक्खियां आएं
सुआपंखी आएं
आएं पहाड़ी मैनों के कई-कई झुंड
मोर आएं,खुशी-खुशी फैलाएं अपने पंख
तीजन बाई आए,सुनाए पंडवानी
मगर शृंगमुकुट छीन उन्हें अपनी टोपी पहनाने वाले कभी न आएं

न लाल,केशरिया न काला
पहले की ही तरह खुद को केवल सुआपंखी रंग में रंगना चाहता है बस्तर
कौड़ियों की लड़ियों वाला शृंगमुकुट पहन
चित्रकोट के झरने जैसा
बस अपना गीत गाना चाहता है बस्तर .

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बस्तर
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