BCCI vs CoA: आज होगी सुप्रीम कोर्ट में बीसीसीआई से जुड़े मामलों पर सुनवाई

पिछले पांच सालों में सुप्रीम कोर्ट के तीन मुख्य न्यायधीश इस केस की सुनवाई कर चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को बीसीसीआई से जुड़े मामलों पर सुनवाई करेगा। सुनवाई का सबसे अहम बिंदु सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त प्रशासकों की समिति (सीओए) द्वारा पिछले साल अक्टूबर में प्रस्तुत की गई स्टेटस रिपोर्ट है।

जिसमें लोढ़ा समिति की सिफारिशों को नहीं मानने वाले राज्य संघों के मताधिकार को रोकने और बीसीसीआई को एक निर्धारित समय सीमा के अंदर चुनाव कराने की सिफारिश कर रही है।

पिछले पांच सालों में सुप्रीम कोर्ट के तीन मुख्य न्यायधीश इस केस की सुनवाई कर चुके हैं। अब एसए बोबडे और एएम सापरे की बेंच इसकी सुनवाई करेगी।

इस सुनवाई से बोर्ड की विचित्र स्थिति समाप्त हो सकती है। 18 जुलाई, 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने आरएम लोढ़ा समिति द्वारा सुझाए गए सुधारों को लागू करने की मंजूरी दी थी और सभी राज्य संघों को उसे लागू करने के आदेश दिए थे।

इसके बाद कई राज्य संघों के अनुरोध पर कुछ सुधारों में संशोधन किया गया था। हालांकि अब तक ना तो बोर्ड के एक भी सदस्य संघ ने और न ही बीसीसीआई ने इन सिफारिशों को लागू किया है।

अब सीओए ने सिफारिश की है कि बीसीसीआई कोर्ट के फैसले के बाद 90 दिनों के अंदर चुनाव कराए और कोर्ट चुनाव के लिए एक समयसीमा को मंजूरी दे।

चुनाव कराने के लिए राज्यों और बीसीसीआई को पहले नए संविधान का पालन करने की जरूरत है, जो पिछले साल अगस्त में पंजीकृत किया गया था। इसका मतलब है कि उन्हें सभी सुधारों के लिए बिना शर्त सहमत होना होगा।

जब सीओए ने पिछले साल 27 अक्टूबर को अपनी स्टेटस रिपोर्ट पेश की थी, तब तक बीसीसीआई के 34 राज्य संघों में से एक भी पूरी तरह से उसका पालन नहीं कर रहा था।

सीओए ने सात राज्यों को गैर अनुपालन संघों के रूप में पहचाना की थी जबकि बाकियों को उसने आंशिक रूप से पालन और बहुत हद तक पालन करने वाली श्रेणियों में रखा था।

हालांकि राज्य संघों ने गेंद को दूसरे पाले में सरका दिया है और कई अहम सवाल उठाए हैं। सबसे अहम सुधार जो बीसीसीआई के सदस्य चाहते हैं।

वह यह है कि कोर्ट नए संविधान में पदाधिकारियों के लिए निर्धारित नौ साल की कार्यकाल सीमा पर पुनः विचार करे।
लोढ़ा समिति की सिफारिशों को लागू नहीं करने वाले राज्य संघों के बीसीसीआई के चुनावों में मताधिकार नहीं करने और फंड रोके जाने पर भी सुनवाई हो सकती है।

बीसीसीआई के कई सदस्य चाहते हैं कि सीओए के शासनकाल को समाप्त किया जाए लेकिन ऐसा तभी होगा जब वे चुनाव कराएंगे।

हालांकि सदस्य दो भागों में बंटे सीओए के भीतर गहरे विभाजन और अविश्वास के बारे में कोर्ट को अवगत कराना चाहते हैं, जिसमें भारत के पूर्व कैग विनोद राय और पूर्व भारतीय महिला कप्तान डायना इडुल्जी शामिल हैं।

कुछ सदस्यों को लगता है कि बिना शर्त सुधारों को लागू करने के लिए बाध्य होने के बावजूद उन्हें बीसीसीआई का नियंत्रण हासिल करना होगा।

हार्दिक पांड्या और केएल राहुल के विवादित टीवी-शो की टिप्पणियों की बात करें तो राय और इडुल्जी ने माना कि खिलाड़ियों को दंडित किया जाना चाहिए, लेकिन इसके बारे में कैसे आगे बढ़ा जाए, इसको लेकर दोनों की राय अलग है।

दोनों खिलाड़ी निलंबित कर दिए गए हैं और वे ऑस्ट्रेलिया में चल रही वन-डे सीरीज से बाहर हैं जबकि न्यूजीलैंड के सीमित ओवरों के दौरे से भी बाहर रह सकते हैं।

बीसीसीआई की कानूनी टीम ने सिफारिश की कि जांच पूरी होने तक खिलाड़ियों को निलंबित कर दिया जाए लेकिन राय और इडुल्जी दोनों चाहते हैं कि कोर्ट लोकपाल की नियुक्ति के बारे में निर्देश दे।

राय का यह भी मत है कि अगर कोर्ट निर्देश ना दे तो एडहॉक लोकपाल की नियुक्ति हो जबकि इडुल्जी इसमें तकनीकि पेंच बताकर विरोध कर रही हैं।

बीसीसीआई ने 2016 के आखिर से खाली पड़े इस पद पर किसी को बहाल नहीं किया है। अगर कोर्ट लोकपाल पर फैसला नहीं करता है तो इन दोनों क्रिकेटरों और भारतीय टीम की विश्व कप उम्मीदों को भी झटका लग सकता है।

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