विचार

दाल के जाल में बेहाल किसान

दाल की नई फसल अब तैयार हो गई है. किसान अपनी नई अरहर और चना बेच कर अगली फसल की तैयारी करना चाहते हैं, लेकिन सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य तक उन्हें नहीं मिल रहा.

डॉ राजाराम त्रिपाठी

दाल की नई फसल अब तैयार हो गई है. किसान अपनी नई अरहर और चना बेच कर अगली फसल की तैयारी करना चाहते हैं, लेकिन सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य तक उन्हें नहीं मिल रहा.

जब कि रिकार्ड उत्पादन होने के बावजूद सरकार वर्मा सहित अन्य देशों से लगातार दाल का आयात कर रही है. दाल का उत्पादन देश में बढ़ने के बावजूद दाल के कारोबार में उसकी पहली कड़ी किसान और आखिरी सिरा यानी उपभोक्ता के हाथ में हाथ मलने के सिवा कुछ है ही नहीं. आखिर यह सूरत बदलेगी कैसे?

दो साल पहले वर्ष 2016 को अंतरराष्ट्रीय दाल वर्ष के रूप में मनाया गया था, तब देश में दाल की कीमत 200 रुपये प्रति किलोग्राम को पार कर गई थी, बावजूद इसके दाल उत्पादक किसानों को उनकी फसल का सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिला था.

तब दाल की मांग को पूरा करने के लिए सरकार ने देश कई अन्य देशों से भारी मात्रा में आयात की थी और पुनः ऐसी स्थिति ना आए इसके लिए लंबे-चौड़े वादे और घोषणाएं की गई थी. लेकिन दो साल बीतते-बीतते हम फिर उसी मुहाने पर खड़े हैं.

महाराष्ट्र के दाल उत्पादक किसानों की दिक्कत है कि उनकी अरहर की कीमत प्रति किलोग्राम 40 रुपये भी नहीं मिल पा रहे हैं, जब कि सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य 54 रुपये प्रति किलोग्राम निर्धारित की गई है. वहीं हाल चने की भी है.

दाल रोटी तथा दाल भात सहित नाना विध व्यंजनों के रूप में भारतीय भोजन की थाली के सबसे बड़े हिस्से पर क़ाबिज़ दाल न केवल हमारे भोजन का प्रमुख हिस्सा है बल्कि भारत में प्रोटीन का प्रमुख स्त्रोत भी है।

उल्लेखनीय है कि हमारे किसान दुनिया भर में सबसे ज्यादा दाल उपजाते हैं इसलिये यह देश और दाल उपजाने वाले हमारे किसानों के लिये खुशी का मौका होना चाहिये. पर जाने क्यों वे इससे जरा भी खुश नहीं दिखते. उपभोक्ता उम्मीद से हैं कि दाल सस्ती होगी.

खुदरा दुकानदार ज्यादा दाल बेच बेहतर मुनाफे की आस में हैं तो बड़े व्यापारी नये स्टॉक को कब्जाने को लेकर उत्साहित है. सरकार को इस बात की राहत है कि इस मसले पर वर्ष 2016 में हुई उसकी खिंचाई खत्म हो गई है. यानि दाल से जिसका जरा भी वास्ता है वह कहीं न कहीं कोई उम्मीद और आस पाले हुये है.

पर चाहे समूचे संसार में दो वर्ष पूर्व दाल वर्ष मनाए जाने की बात हो या अपने देश में दाल की नई फसल आने, उसके सस्ती होने की संभावना हो या फिर उसके दाम आसमान के पार पहुंच जाने की आशंका, किसान इन सबसे अछूता और हर हाल में नुकसान भुगतने को अभिशप्त है.

देश में दाल जब ठीक ठाक उपजती है तो बाजार में ज्यादा दाल की आवक से भाव गिर जाते हैं. ज्यादा उपजाने का इनाम किसानों को घाटे के रूप में मिल रहा है. उधर सरकार निर्यात पर रोक लगा देती है, और आयात को अनुमति देती है. मतलब अगर किसान विदेशी बाजार में थोड़े महंगे दाम पर दाल बेच कर कुछ कमाई करना चाहे तो वह भी नहीं कर सकता.

दाल की उपज कम हो जाये तो जाहिर है मांग के मुकाबले पूर्ति न होने से दाम बढेंगे, ऐसे में पहले तो बड़े व्यापारी इसका फायदा उठाते हैं, जमाखोरी होती है. महंगाई बढती है तो सरकार दूसरे देशों से दाल खरीद लेती है. हम कनाड़ा जैसे बड़े देशों के अलावा रंगून, तंजानिया, मोजाम्बीक, मलावी, सूड़ान, केन्याऔर वर्मा तक से दाल खरीदते हैं.

इसके चलते देसी दाल के दाम जमीन पर आ जाते हैं. किसानों को यहां भी नुकसान ही है. अरहर की दाल के दाम 120रुपए किलो आ गए तो बहुतों ने सोचा किसान खुश होगा उसे ऊंचे दाम मिल रहे होंगे. लेकिन किसान के हाथ खाली है.

दाल उपजाने वाला किसान चौतरफा मार झेलने को मजबूर है. सरकार और उसके नीति निर्धारकों को यह बात समझ में ही नहीं आ रही कि हालात ऐसे ही बने रहे तो किसान इसकी खेती की तरफ से मुंह मोड़ लेगा और उत्पादन घट जायेगा, समस्या निरंतर बनी ही नहीं रहेगी बल्कि बद से बदतर होती जायेगी. 2013-14 में देश में दलहन उत्पादन एक करोड़ 97 लाख 80 हजार टन हुआ था, जिसके 2014-15 में घटकर एक करोड़ 84 लाख 30 हजार टन रह गया.

2015-16 में फिर दाल के उत्पादन में थोड़ी बढ़ोत्तरी हुई, जो चालू वर्ष में भी जारी रहा. सरकारी नीति और मौसम की मार के चलते आने वाले वर्ष में इसके एक करोड़ 72 लाख टन से भी कम रह जाने की आशंका है.

इसमें जो दाल सबसे ज्यादा लोकप्रिय है यानी अरहर की दाल, उसका उत्पादन 31 लाख 70 हजार टन से घट कर 27 लाख 80 हजार टन हो गई. दालों की मांग पूरी करने के लिए वर्ष 2014-15 में अब तक कुल 85 लाख 84 हजार 84 टन दाल-दलहन का आयात किया जा चुका है. अभी भारी मात्रा में होना बाकी है.

महाराष्ट्र जिसकी कुल पैदा होने वाली खरीफ दाल में लगभग चौथाई की हिस्सेदारी है, सूखा की मार झेलते रहने को अभिशप्त है. कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश इन चार सूबों के किसान मिलकर महाराष्ट्र के मुकाबले तकरीबन दूना दाल उपजाते हैं. देश में 87 प्रतिशत दलहन किसान आसमानी वर्षा पर निर्भर हैं जबकि इस बार यह सब कम बारिश की चपेट में हैं सो देश की लगभग 75 फीसद दाल जहां से आती है, उनका उत्पादन घटना तय है.

विदेशी विक्रेताओं के लिए भारत एक बेहतर बाजार बन गया है. सरकार द्वारा विदेशों से दाल आयात किये जाने से अपनी भरपूर मेहनत और दाम लगाने के बाद दाल उपजाने वाले किसान को सिर्फ नुकसान उठाना पड़ रहा है. न कोई सरकारी सहायता न दाल का बढा हुआ समर्थन मूल्य, बस निराशा. देश में किसान को एक किलो दाल के दाम सरकारी, गैर सरकारी खरीद से औसतन 44 से 64 रूपये मिलते हैं.

खेती की लागत 40 से 54 रूपये के बीच और बिक्री वाली जगह पर ले जाने तथा अपनी मेहनत अलग से. पर यही दाल बाजार में 110 से 220 रूपये किलो बिकती है. खुद सरकार विदेश से देसी किसानों से जिस दाम में दाल खरीदती है उससे कहीं ज्यादा दाम विदेशी किसानों को चुकाती है. पर समस्या के किसी मुकम्मल हल के बारे में कुछ नहीं करती.

दाल के दामों में चढत का असर दाल की खेती पर दिख रहा है. पिछले साल के मुकाबले रबी दाल की बुआई में दूनी हुई है. कृषि उत्पाद विपणन विशेषज्ञ जयदीप गुप्ता कहते हैं, खरीफ दाल में तेज़ी इस बात का आधार नहीं है कि रबी की दालें भी उछाल मारेंगी और इसका लाभ किसान को मिलेगा. पहली बात यह कि दाल के कारोबार में उसकी पहली कड़ी किसान और आखीरी सिरा यानी उपभोक्ता के हाथ में हाथ मलने के सिवा कुछ है ही नहीं.

दाल के मामले में सबसे बड़े नुकसान में किसान है फिर उपभोक्ता और खुदरा दुकानदार यहां तक कि सरकार भी कम नुकसान में नहीं है. फायदा तो सिर्फ बड़े व्यापारियों, बिचौलिए, जमाखोरों, स्टाकिस्ट और वायदा कारोबारियों की जेब में जाता है. जिनकी इस पूरी प्रक्रिया में मुनाफा काटने के अलावा कोई भूमिका नहीं है. किसान और उपभोक्ता, सरकार और यहां तक कि खुदरा दुकानदार तक की जवाबदेही तय है पर ये महज मुनाफा कमाकर अलग हो जाते हैं.

पल्स एंड ग्रेन एसोशिएशन ऑफ इंडिया के एक, प्रतिनिधि नाम उजागर न करने की शर्त पर कहते हैं, “इस व्यापार में टाटा, रिलायंस और वॉलमार्ट जैसी बड़ी कंपनियां ख़रीदार बन गयी हैं और वायदा कारोबार जो एक तरह का सट्टा है जिसे खुद सरकार ही इजाजत देती है तो फिर जमाखोरी तो बढनी ही है और जिसके चलते दाम बढते हैं और न किसान को लाभ मिलता है न उपभोक्ता को न खुदरा दुकानदार को. दाम तो फिर भी नीचे आ जायेंगे पर किसान एक बार अरहर या इस तरह की दाल उपजाना छोड़ किसी और तरफ रुख कर लिये तो क्या होगा.’

तो ऐसा क्या हो कि देश में दाल उपजाने वाले और उसे खाने वाले दोनों राहत महसूस करें. सीधी सी बात है सरकार और उसका संबंधित मंत्रालय सचेत हो. यह जो भी हो रहा है उसका सीधा दोष सरकार पर है. सरकार की उदासीनता, अक्षमता और अकर्मण्यता की वजह से ही दाल की उपज घट रही है, उसका भंडारण, विपणन उचित तरीके से नहीं हो पा रहा और खेत से थाली तक से सफर में व्यवसाय के बड़े खिलाड़ी, जमाखोर, बिचौलिये इसमें घुसपैठ कर जा रहे हैं, किसान का हक मार ले रहे हैं.

देश में दाल की खपत सालाना 2.7 करोड़ टन है. 2013 में 2.0 करोड़ टन दाल पैदा हुई. 2014 में यह उपज 1.7 करोड़ टन रह गई थी. एक तो खपत की तुलना में कम उत्पादन फिर उसका लगातार घटना. सरकार को बेखबर देख मुनफाखोरों को दाल का भंडारण करके लाभ कमाने का अवसर मिल गया. सट्टेबाजी अब फ्यूचर ट्रेडिंग यानी कानूनी तौर पर वायदा कारोबार कहलाती है.

इस धंधे में देशी-विदेशी दोनों तरह के पूंजीपतियों की मिली भगत है. बड़ी-बड़ी कंपनियां खेतों से ही औने-पौने दाम पर पैदावार की खरीद करती हैं और सट्टेबाजी करके इनकी कीमतें बढ़ाती हैं. दाल की पैदावार में 12 फीसदी की कमी आई लेकिन दाल के दाम 70 फीसदी तक बढ़ गए. किसानों को इन बढी कीमतों का दशांश भी नहीं मिलता. पिछले साल अरहर की दाल 100 रुपए किलो थी. सरकार सही समय पर कदम उठाती और अरहर का समर्थन मूल्य इससे ज्यादा कर देती तो न जमाखोरी का संकट उत्पन्न होता न किसान रोता.

सरकार ने किसानों को लाभ कैसे मिले इस पर तो नहीं बल्कि महंगाई रोकने पर कमेटी बनायी जिसने कहा, किसान को सस्ते लोन मिले, कोल्ड स्टोरेज बनें, जगह जगह मंडियां हों. यह सब ठीक है पर न तो दाल का उत्पादन बढेगा न इससे किसान को कोई खास राहत मिलेगी. समाधान है तो सीधा सा यह कि किसानों को उपज बढाने के लिये प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से सरकार को एक प्रभावशाली कार्य योजना तैयार करनी चाहिये.

जिसके तहत बीज एवं तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराया जाये, किसानों को दालों की अधिक पैदावार करने के लिए प्रेरणा, तकनीक सहायता सहयोग मिले और साथ-साथ गन्‍ना, गेहूं और धान के तरह दलहनी फसलों पर समर्थन मूल्य हर राज्य में ठीक से और बढा कर लागू किये जायें, और ना केवल समर्थन मूल्य तय किये जाएं बल्कि उस मूल्य पर किसानों से उत्पाद को खरीदना अनिवार्य किया जाएं, जिससे जमाखोरी रुके.

इंस्टीट्यूट ऑफ पल्सेज रिसर्च कानपुर के मुताबिक इस क्षेत्र में पर्याप्त शोध करके जल्दी पकने वाले बीज विकसित करने जरूरत है साथ ही रोगमुक्त प्रजाति भी खोजी जानी चाहिये. मोदी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मुखर हैं उन्हें विकसित देशों पर कृषि बाजार को खोलने का दबाव डालना चाहिए. ऐसा करने से हमारे किसानों को बहुत बड़ा बाजार मिलेगा और आमदनी बढ़ेगी.

देश में अरहर दाल का एकाधिकार जैसा है इसे तोड़ना चाहिये. 30 से 70 लाख टन उत्पादन के साथ चना दाल का योगदान कुल दाल उत्पादन में 41 फीसदी और 27 लाख टन उत्पादन के साथ अरहर दाल का योगदान महज 16 फीसदी है, अन्य दालों में मूंग और उड़द प्रमुख है, बाकी लोबिया, काबुली चना और सोयाबीन का नम्बर इसके बाद आता है.

सरकार से ज्यादा हमारे वैज्ञानिक सचेत हैं और उन्होंने बारानी तथा सिंचित क्षेत्रों हेतु ज्यादा लाभ देने वाली दलहन के साथ मिला कर बोने वाली अरहर-गेहूँ, धान-चना/मसूर, अरहर/धान-गेहूँ-मूँग जैसी फसल प्रणालियाँ विकसित की हैं. चना के साथ सरसों 4:1 पंक्ति अनुपात में, मूँग के साथ सूरजमुखी 6:2 के अनुपात में, चना के साथ अलसी 4:2 के अनुपात में, आलू के साथ राजमा 3:2 के अनुपात में तथा अरहर के साथ उर्द 2:1 के अनुपात में उगाने की विधि बेहद लाभकारी साबित हुई है.

गन्ने के साथ मूँग तथा उर्द की फसलें उगाए जाना भी बढिया परिणाम दे सकता है. देर से बुवाई हेतु चना, रबी अरहर तथा बौनी मटर की उत्पादन प्रौद्योगिकी भी विकसित की गई है. पर यह उपलब्धियां तब तक कागजी हैं जब तक आम किसान के खेतों तक नहीं आतीं. महाराष्ट्र के किसान दलहनी फसलों से इतने ठगे महसूस कर रहे हैं कि बहुत से किसान इसे अपनी मुख्य फसल में शामिल करने से मन हटा चुके हैं.

उत्तर प्रदेश के किसान अरहर की फसल में नमी और फंफूद के प्रकोप से कई बार अपने हाथ जला चुके हैं, हार कर वे दाल उपजाने से कतराने लगे हैं. वैज्ञानिकों की खोज, शोध विकास का जमीनी इस्तेमाल तभी संभव है जब यह सब बातें व्यावहारिक तौर पर किसानों तक पहुंचे और इसके लिये सरकारी सदिच्छा की आवश्यकता है जो दुर्भाग्यवश कहीं नहीं दिखती.

किसान बढाएं उपज और सरकार बढाए दाम :

आप को अरहर की दाल भले ही 100 रूपये किलो मिले पर उपजाने वाले किसानों को एक किलो अरहर का दाम 40 रुपए भी नसीब नहीं हो रहे. जबकि सरकार द्वारा अरहर की खरीद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 54 रुपये प्रति किलोग्राम निर्धारित की गई है. एक एकड़ खेत से ज्यादा से ज्यादा 12 से 14 क्विंटल अरहर उपजती है. बीज, दवाइयां और दूसरे खर्च जोड़ लें तो अपनी मेहनत के अलावा कम से कम 30 से 35 हजार तक खर्च हो जाता है.

कोई यह सोच सकता है कि किसान को प्रति किलो 10 से 20 रूपये बन जाते हैं. पर इसमें उसके परिवहन की लागत और मजदूरी नहीं जुड़ी है. उसकी अपनी मेहनत और धन निवेश के साथ लगने वाला आठ महीने का समय देखें तो यह फायदे का सौदा नहीं लगेगा तिस पर वह फसल को लेकर भारी जोखिम भी उठाता है.

अगर अरहर दाल जो बाजार में औसतन 100-120रूपये प्रति किलो बिकती है उसे कोई किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य परखरीदे तो किसान का लाभ प्रतिशत इस हद तक होगा कि वह जोखिम उठाये, बीमा कराये. ज्यादा दाल उपजाये जिससे वह बाजार में आये और कारोबारी,व्यापारी,दुकानदार भी बढिया मुनाफा कमाये, उपभोक्ता भी सस्ता पाये.

यह स्थिति तब है जब कि सरकार किसानों को उनकी फसल की डेढ़गुनी कीमत सुनिश्चित करने तथा आमदनी दोगुनी करने का वादा कर रही है. ऐसे में जाहिर है किसानों को दाल का दाम ज्यादा मिले इसी में सबकी भलाई है. नहीं तो छत्तीसगढ के किसानों की तरह बाकी जगहों के किसान भी अरहर दाल को सोयाबीन के समर्थन में महज मेंड़ों पर ही बोय जाना पसंद करेंगे.

किसान अगर सीधे अरहर न बेचे और मिल ले जाकर उसे दाल में बदल कर यानी प्रॉसेस करा के बेचे तो किसान को कुछ ज्यादा पैसा मिल सकता है. पर दिक्क्त यह है कि देश में किसान किसान ही है व्यापारी नहीं, न तो वह अपने उत्पाद का मूल्य तय करता है न सीधे बेच पाता है. मंडियां, आढत, बिचौलिये, कारोबारी, का चक्रव्यूह तोड़ने के झंझट में वह नहीं पड़ना चाहता फिर परिवहन लागत वगैरह बढ जाती है.

दाल का एमएसपी (मिनिमम सपोर्टिव प्राइज या समर्थन मूल्य) अधिकांश राज्यों में तय ही नहीं है और जहां तय है, वहां सरकारी खरीद नौकरशाही और नीतियों की भेंट चढ़ जा रही है. इस वजह से दाल पैदा करनेवाला किसान पूरी तरह दालों के कारोबारियों पर ही निर्भर है.

अगर मंडी किसान से अधिकतम 40 रूपये किलो के हिसाब से दाल खरीदती हैं तो उसपर प्रॉसेस की ज्यादा से ज्यादा 5 रूपये कीमत चुकाने और हद से हद 10 रूपये परिवहन और 5 रूपये उतरवाने रखवाने की लागत लगा लिया जाय तो खेत से निकल कर बड़े कारोबारी के गोदाम में पहुंचने पर दाल की कीमत होती है 60 रूपये सरकारी कर और खुदरा दुकान वाले के मुनाफे को जोड़ लें तो यह 70 -75 से ज्यादा में नहीं बिकने चाहिये तब इसके दाम 120 कैसे हो जाते हैं और यह जो 45-50 रूपये अतिरिक्त कमाये गये हैं उसमें किसान की हिस्सेदारी कहां है.

हम दुनिया में सबसे ज्यादा दाल उगाते हैं पर ज्यादा जमीन और दूसरों के मुकाबले ज्यादा श्रम लगा कर. दुनिया के 171 देश कम या ज्यादा पर मिल कर कुल 723 लाख हेक्टेयर रकबे में फसल ले कर 644 लाख टन दाल उपजाते हैं. भारत अकेले ही पूरी दुनिया के करीब 25 फीसद दाल पैदा करता है. भारत में कुल बुआई क्षेत्र के करीब 33 फीसदी हिस्से पर अरहर समेत तरह-तरह की दाल उगाई जाती है. यानी दाल का रकबा बहुत बड़ा है.

यहां प्रति हेक्टेयर करीब 700 किलो दाल का उत्पादन होता है जबकि, फ्रांस के किसान प्रति हेक्टेयर 4,219 किलो दाल पैदा करते हैं. फ्रांस के बाद कनाडा में प्रति हेक्टेयर 1,936 किलो दाल का उत्पादन होता है तकनीक के जोर पर अमेरिका में प्रति हेक्टेयर 1,882 किलो उपजा ली जाती है जबकि खेतिहर रुस में ये आंकड़ा 1,643 किलो प्रति हेक्टेयर है और चीन में 1,596 किलो प्रति हेक्टेयर.

आंकड़ों से साफ है कि भारत में प्रति हेक्टेयर दालों की पैदावार अपने निकटतम प्रतिद्वंदी से आधी भी नहीं है. तिसपर किसान दाल की काश्त से उदासीन हो दूसरी कैश क्रॉप्स की ओर मुड़ रहे हैं. गरीब और मध्यम वर्गीय भारतीय के लिये प्रोटीन का सबसे सहज सुलभ स्रोत दाल ही है, इसका उत्पादन न बढ़ा और दाम कम न हुये तो देश की पोषण व्यवस्था ही गड़बड़ा जायेगी इसलिये हमें दालों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढाकर कम से कम दुगुना करना होगा.

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दाल के जाल में बेहाल किसान
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