विदेशी मीडिया का मानना, कश्मीर में टूट रही आतंक की कमर

नई दिल्ली : मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से कश्मीर में आतंकवाद दिनोंदिन कमजोर पड़ रहा है। विपक्षी पार्टियां राजनीतिक मजबूरी में भले ही इसे स्वीकार न करें लेकिन अब विदेशी मीडिया भी यह कहने लगी है कि घाटी में आतंकवाद की कमर टूट रही है।

अमेरिकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार कश्मीर में अब कोई भी आतंकी दो साल से ज्यादा जिंदा नहीं रह सकता है। इससे पहले ही वह सुरक्षा बलों का निशाना बन जाता है। पिछले चार साल में 200 से ज्यादा आतंकी मार गिराए गए हैं। अब घाटी में 250 से ज्यादा आतंकी नहीं बचे हैं।

नब्बे के दशक में जब कश्मीर में आतंकवाद ने सिर उठाना शुरू किया था तब आतंकियों की संख्या एक हजार से ज्यादा थी। उनकी संख्या लगातार बढ़ती ही रही। इनमें विदेशी आतंकी भी शामिल थे, लेकिन पिछले कुछ सालों में अमेरिकी दबाव में पाकिस्तान को अपने ज्यादातर आतंकी कैंपों को बंद करना पड़ा है। इसके अलावा अब घाटी के आतंकियों को सीमा पार से पहले की तरह धन एवं हथियारों की मदद भी नहीं मिल रही है क्योंकि भारत ने सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था को चौकस कर दिया है। अब घाटी में आतंकियों को पाकिस्तान का नैतिक समर्थन ही मिल पा रहा है।

न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार पहले के मुकाबले अब सुरक्षा बलों को जनता का ज्यादा समर्थन मिल रहा है। इसलिए अब यह पता करना आसान हो गया है कि कौन आतंकी है, उसके दोस्त कौन हैं और उसकी गर्लफ्रेंड कौन है जिनके यहां वह छिप सकता है। सबसे ज्यादा मुश्किल होती है इस सूचना के आधार पर आतंकियों की घेराबंदी करना और उन्हें मारना।

अखबार के अनुसार हाल के वर्षों में घाटी में आतंकवाद के खात्मे में इजराइल से भारत को काफी मदद मिली है। सिक्यूरिटी कैमरा, नाइट विजन ग्लास और ड्रोन की सुविधा मिलने से सुरक्षा बलों का काम आसान हुआ है। सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि अब आतंकी पहले की तरह खुलेआम शूटिंग की प्रैक्टिस भी नहीं कर पा रहे हैं। अब वे सीमा पार जाकर प्रशिक्षण भी नहीं ले पा रहे हैं क्योंकि पाकिस्तान से लगती 450 मील से भी ज्यादा लंबी सीमा को सील करने में भारत ने काफी कामयाबी हासिल की है।

अखबार ने माना है कि 1947 के बाद से ही पाकिस्तान आतंकियों के जरिए लगातार भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वार चलाता रहा है लेकिन अब यह खेल खत्म हो रहा है। अब घाटी में आतंकवाद के नाम पर राज्य के युवाओं के गैंग ही बचे हैं।

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