जन्मदिन विशेष: लॉकडाउन के चलते बंद किया गया बाबा साहेब अंबेडकर स्मारक

लॉकडाउन के चलते आंबेडकर स्मारक को किया गया बंद

नई दिल्ली: भारतीय न्यायविद्, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक और दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित कर अछूतों के प्रति सामाजिक भेदभाव के खिलाफ अभियान चलाने वाले भीमराव रामजी अंबेडकर का आज जम्दीन है। आज ही के दिन बाबासाहेब अंबेडकर का जन्म एक सैन्य छावनि महू के काली पलटन इलाके में हुआ था।

लॉकडाउन के चलते इस साल इंदौर के समीप उनकी जन्मस्थली महू में हर साल होने वाला आंबेडकर जयंती समारोह नहीं होगा। आंबेडकर जयंती पर कार्यक्रम आयोजित नहीं होने पर समाजजनों में निराशा है, लेकिन वे सोशल मीडिया पर सभी से अपील कर रहे हैं कि कोरोना संकट के चलते सभी अपने-अपने घरों में ही रहकर जन्मदिन मनाएं।

आंबेडकर महू में केवल ढाई साल की उम्र तक रहे और फिर वर्ष 1942 में सिर्फ एक बार यहां आए थे। भारत रत्न डॉ. आंबेडकर की जन्मस्थली महू उनके चाहने वालों के लिए किसी तीर्थ और 14 अप्रैल का दिन किसी बड़े त्योहार से कम नहीं है। यहां साल भर आंबेडकर अनुयायियों की भीड़ लगी रहती है। महू को अब आधिकारिक तौर पर डॉ. आंबेडकर नगर कहा जाता है।

लॉकडाउन के चलते आंबेडकर स्मारक को फिलहाल बंद कर दिया गया है। आंबेडकर के अस्थि कलश के पास रोजाना एक मोमबत्ती जलाने के लिए स्मारक व्यवस्थापक और पिछले तीन दशकों से सेवादार रहे मोहन राव वाकोड़े आ रहे हैं। वाकोड़े ने इस बार अनुयायियों से घर पर रहकर ही जयंती मनाने का आग्रह किया है और इस दौरान लोगों से लॉकडाउन के चलते परेशान नागरिकों की मदद करने की अपील की है।

स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में बुद्घ वंदना

मंगलवार को जयंती के दिन यहां स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में बुद्घ वंदना की जाएगी। इस दिन यहां समिति से जुड़े बेहद कम लोग ही आ सकेंगे। मालूम हो, 14 अप्रैल 1991 को प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने स्मारक की आधारशिला रखी थी।

कार्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, बसपा नेता कांशीराम, मायावती और कांग्रेस नेता माधवराव सिंधिया जैसे बड़े नेता मौजूद थे। स्मारक 2008 में बनकर पूरी तरह तैयार हुआ और इसका लोकार्पण लालकृष्ण आडवाणी ने किया। भव्य दो मंजिला संगमरमर की इमारत एक बौद्घ स्तूप की शक्ल में है।

डॉ. आंबेडकर के पिता सूबेदार रामजी सकपाल महार रेजिमेंट में प्रशिक्षक थे। वे यहां कालीपल्टन क्षेत्र में स्टाफ क्वार्टर में रहते थे। डॉ. आंबेडकर का जन्म इसी क्वार्टर में हुआ। हालांकि वे महू में केवल ढाई साल की उम्र तक रहे और फिर उनके पिता रिटायरमेंट के बाद महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में अपने गांव चले गए।

आंबेडकर की जन्मस्थली खोजने का काम सेना में पदस्थ एक ब्रिगेडियर जीएस काले ने 1971 में शुरू किया। बाबा साहेब का जन्मस्थान तो मिल गया, लेकिन सैन्य भूमि होने के चलते इसे हासिल करना मुश्किल था, लेकिन प्रयासों के बाद वर्ष 1986 में 22 हजार 500 वर्गफुट की यह जमीन सेना द्वारा स्मारक समिति को लीज पर दी गई।

साल 2008 से यहां प्रदेश सरकार हर साल जयंती समारोह पर एक करोड़ रुपए खर्च करती है। हालांकि अब भी स्मारक के संघर्ष समाप्त नहीं हुए हैं। यहां अनुयायियों के लिए जमीन की कमी को पूरा करने के लिए पिछले 20 साल से एक आंदोलन जारी है। वहीं आंबेडकर के जन्मस्थान के बावजूद इस जगह को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा तक नहीं मिला है।

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