दो टूक (श्याम वेताल) : भाजपा तभी जीतेगी जब प्रधानमंत्री कोई और बने

श्याम वेताल
     श्याम वेताल

यदुवंशियों का दूध और कुशवाहों के चावल से खीर बनाने के बयान से चर्चा में आए केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के मुखिया उपेन्द्र कुशवाहा का एक नया बयान आया है कि एन डी ए के ही कुछ लोग चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री न बनें.

हालांकि यह महत्वपूर्ण बात उन्होंने एन डी ए के कुछ लोगों के हवाले से कही है लेकिन सच्चाई है कि नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री के रुप में न देखने की इच्छा रखने वालों में देश की अधिकांश जनता भी है. इसका मतलब यह नहीं है कि लोग भाजपा को केंद्र की सत्ता में देखना नहीं चाहते हैं. लोग भाजपा को फिर से दिल्ली की कुर्सी देने को तैयार हैं किंतु वे चाहते हैं कि प्रधानमंत्री कोई और बने.

नरेंद्र मोदी से ऊबने का आखिर कारण क्या है? मोदी अच्छा भाषण देते हैं, भ्रष्टाचार से दूर हैं, अपना अधिकांश समय सरकारी कामों में लगाते हैं, सतत दौरे करते रहते हैं, विदेशों में भारत का नाम रोशन करते हैं, जनता से सीधे जुड़े रहना चाहते हैं… और भी कई खूबियों के मालिक हैं फिर उनके प्रति लोगों में ऐसी भावना क्यों पनप रही है?

वास्तव में, हर काम के दो पक्ष होते हैं – एक सकारात्मक और नकारात्मक. मोदी जी के साथ भी ऐसा ही कुछ है. उनके कामों से तो लोग संतुष्ट हैं लेकिन उनकी बातों (भाषणों) से ऐसा लगने लगा है कि वे 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले वाले नरेंद्र मोदी हो गये हैं. प्रधानमंत्री के रुप में नरेंद्र मोदी कम दिखाई देते हैं, भाजपा के स्टार प्रचारक के रुप में उनके दर्शन ज्यादा होते हैं.

वैसे तो नरेंद्र मोदी कांग्रेस मुक्त भारत की बातें करते हैं लेकिन खुद ही कांग्रेस को ऑक्सीजन भी देते रहते हैं शायद ही उनका कोई भाषण ऐसा होगा जिसमें वे कांग्रेस का जिक्र न करते हों. इससे कांग्रेस को पब्लिसिटी तो मिलती ही रही है. भले यह निगेटिव पब्लिसिटी हो.

कहा जाता है कि राजनीति में यदि किसी को नुकसान पहुंचाना हो तो उसकी उपेक्षा करो. उसका कहीं उल्लेख ही न करो. यदि उल्लेख या जिक्र न किया तो मीडिया में भी उन्हें स्थान नहीं मिलेगा और मीडिया में जिक्र न हुआ तो उसे प्रचार नहीं मिलेगा. लेकिन हुआ उल्टा, कांग्रेस पार्टी ने अपनी वजह या अपने कामकाज के कारण मीडिया में जो स्थान बना पायी उससे सौ गुना ज्यादा मोदी जी की वजह से मीडिया की सुर्खियां बनीं. इतना ही नहीं, अब तो यह स्थिति आ चुकी है कि लोगों में कांग्रेस के प्रति सहानुभूति जगने लगी है.

वर्ष 2014 का चुनाव हारने के बाद कांग्रेस के पास नेतृत्व का संकट था. राहुल गांधी अपरिपक्व राजनीतिज्ञ थे लेकिन अब वह बात नहीं रही. पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद राहुल में एक चमक आयी है. वे कुछ आक्रामक भी हो गए हैं, जैसी उनकी भूमिका को आवश्यकता थी, उतने साहसी भी दिख रहे हैं. पार्टी में उनके नेतृत्व की स्वीकार्यता भी पर्याप्त हो चुकी है. इन सबके साथ जनता की सहानुभूति भी हासिल कर रहे हैं.

ऐसी परिस्थिति में वे और उनकी कांग्रेस नरेंद्र मोदी और भाजपा को अच्छी टक्कर दे सकते हैं. अब यदि भाजपा को कांग्रेस की टक्कर से आहत न होना हो तो उसे देश की जनता को यह कहना होगा कि नरेंद्र मोदी आगामी लोकसभा चुनाव में भी उसी भूमिका में रहेंगे जिसमें वर्ष 2014 में रहे.

मतलब, पार्टी के सर्वोच्च स्टार प्रचारक. प्रधानमंत्री का चेहरा होंगे या नहीं, यह चुनाव परिणाम आने के बाद तय होगा. इसी बीच यह बहस भी छेड़नी होगी कि नरेंद्र मोदी नहीं तो भाजपा से प्रधानमंत्री की कुर्सी का दावेदार कौन होगा. पार्टी में प्रधानमंत्री पद के योग्य कई सारे नेता हैं. अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज के नाम उछाले जा सकते हैं.

राष्ट्रीय नेता ही क्यों? कई क्षत्रपों के नाम पर भी सहमति बन सकतीं है. इनमें सबसे ऊपर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का नाम लिया जा सकता है. पन्द्रह वर्षों का बेदाग कार्यकाल, धीर-गंभीर व्यक्तित्व, मिष्ठभाषी और शांत स्वभाव वाले रमन सिंह के नाम पर भी सर्व सहमति बन सकती है.

दूसरी बार केंद्र की सत्ता में भाजपा को आरूढ़ कराने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कवायद करनी होगी. यदि संघ गेमप्लान के लिए पहल करें तो देश के मतदाता एक बार फिर भाजपा को दिल्ली की कुर्सी देने को तैयार हो सकता है.

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