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पिता को समर्पित दोहा कृति ‘‘पिता छाँव वट वृक्ष की‘‘ पुस्तक समीक्षा

पुस्तक – दोहा संग्रहः ’’पिता छांव वट वृक्ष की’’
लेखक:- कवि राजेश जैन ’’राही’’
समीक्षक- डॉ.सीमा श्रीवास्तव

सरल और सहज हृद्य कवि राजेश जैन ’’राही’’ छत्तीसगढ़ प्रदेश की प्रतिष्ठित संस्था ’’नवरंग काव्य मंच’’ के संस्थापक एवं संयोजक हैं। उनका तख्खलुस ‘राही‘ इस अर्थ में सटीक लगता है कि वे साहित्य की गलियों के मुसाफिर हैं एवं सबको राह भी दिखाते हैं। छात्र जीवन से ही श्री राही साहित्य अनुरागी हैं। प्रस्तुत कृति के मुख्य पृष्ठ पर ही एक बड़ा ही सुंदर चित्र संयोजन दिखाई देता है – पिता की विराटता वट वृक्ष के रूप में। इसी भाव को पिरोते हुए प्रथम पेज पर ही दोहा रचा गया है-

पिता छाँव वट वृक्ष की, धूप न लगने पाय।
खाद डालकर प्यार की, रखना सदा बचाय।।

कृति के आरंभ में कवि पुत्र को अपने पिता का आर्शीवाद प्राप्त हुआ है और फिर विभिन्न विद्धानों के समीक्षात्मक अभिमत वर्णित हैं। जिसमें श्री अशोक अंजुम जी की यह बात बिल्कुल सटीक है – ’’कम शब्दों में नीति, भक्ति, श्रंगार, जीवन-जगत के जितने मार्मिक चित्र दोहे ने खींचे हैं – अन्य विधाएं मुकाबला कर पाने में कमतर ही दिखाई देती हैं।

निश्चित रूप से दोहों का लेखन श्रमसाध्य और कठिन साहित्य सृजन है। श्री राजेश जैन राही जी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने केवल एक ही विषय पिता पर 365 दोहे रचे। किन्चित रूप से पितृ ऋण को अपनी लेखनी से उतारने का स्तुत्य प्रयास भी किया। यह प्रयास प्रेरणास्पद भी है और युवा पीढ़ी को शिक्षा भी देता है कि –

पढ़ना लिखना खूब तुम, बनना बहुत महान।
दिल में लेकिन हो सदा, मात-पिता का मान।।

आज के आर्थिक युग में बड़ी आसानी से पिता को भुलाया जा रहा है – वे लिखते हैं

’’डॉलर का आफर मिला, छोड़ दिया घरबार।
प्यारा सबसे कैरियर, गौण पिता परिवार ’’।।

और एक दोहा –
बाबू जी करते रहें, संकट से आगाह।
दूर तलक है राह में, उनकी तेज निगाह।।

दोहों में जहां कहीं भी बेटी का जिक्र आया है दिल को छू लेता है जैसे –
’’बेटी पुष्प समाज का, दो कुल को महकाय।
रोको दुष्ट दहेज को, बापू भी मुस्काय।।’’

और –
’’लाडो ने हर दम रखा, मात-पिता का ध्यान।
हुई विदाई खो गई, बापू की मुस्कान ।।’’

बड़ी ही सरल और सहज भाषा में राही जी ने बड़ी-बड़ी बातों को अभिव्यक्ति दी है। मात्र दो पंक्तियों में उनका यह कथ्य कौशल देखते ही बनता है । जैसे – ’’बापू की पगड़ी मिली, रखना घर की लाज। नेकी सर पे ओढ़कर, करना अच्छे काज।।’’

एक दोहा विशेष ध्यान खींचता है –
बेटा एक अमीर है, अच्छा चलो नसीब।
बापू की सेवा मगर, करता पुत्र गरीब।

भाषा में सरलता होने के बावजूद शब्द चयन बड़ा ही सटीक है। प्रसाद और माधुर्य गुण के साथ अविधा शब्द शक्ति सहज ही अर्थ प्रकट कर देती है। दोहों का शांत रस आनन्दित करता है और बिम्ब योजना निशप्रयास ही स्पष्ट आकार ले लेती है। काव्य शिल्प मोहक है दोहों की अभिव्यक्ति की मुखरता के लिए प्रत्येक पृष्ठ पर चित्र संयोजन भी कृति में किया गया है। 365 भाव पूर्ण जीवंत और बोधगम्य दोहे छंद के रस भरे प्याले हैं। 365 दोहों का रसपान करने के बाद पाठक पूर्णतः तृप्त हो जाता है। मैं डॉ. सीमा श्रीवास्तव एक समीक्षक के रूप में दोहा संग्रह के प्रकाशन पर राजेश जैन राही जी को हार्दिक बधाई देती हूँ। प्रस्तुत कृति पठनीय, संग्रहनीय और विद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल करने लायक है। आप कृति कवि या प्रकाशक से खरीद कर अवश्य पढ़ें।

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