बुलंदशहर का बॉक्सर, टोक्यो में करेगा तिरंगा बुलंद

सेना में कुमार ने अपनी वास्तविक खोज की और राष्ट्र की सेवा के लिए एक नया माध्यम चुना।

new delhi : आखिर कब तक किस्मत, कोशिश को हरा सकती है। कोशिशों की जीत का ऐसा ही नायाब नमूना है सतीश कुमार का टोक्यो के टिकट का सफर। सतीश कुमार सुपर हैवीवेट वर्ग (91 किग्रा और उससे अधिक) में पहले भारतीय मुक्केबाज बन गए, जिन्होंने ओलिम्पिक के लिए क्वालिफाई किया है। इसी के साथ उन्होंने इतिहास की किताब में अपना नाम दर्ज करा लिया है। कुमार ने इस साल एशियाई मुक्केबाजी ओलंपिक क्वालीफायर में मंगोलियाई मुक्केबाज ओटगोनबायर दैवी को सर्वसम्मति से हराकर टोक्यो के लिए क्वालीफाई किया है।

सतीश का सफर

सतीश ने इस उपलब्धि को हासिल करने के लिए जो सफर तय किया है, वह अपने आप में सराहनीय है। टोक्यो का टिकट कटा चुके मुक्केबाज उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के रहने वाले हैं। अपने पिता और चार भाइयों के पद चिन्हों पर चलते हुए, सतीश जवान होते ही भारतीय सेना में शामिल हो गए, क्योंकि उनका मिशन हमेशा देश की सेवा रहा है। सेना में कुमार ने अपनी वास्तविक खोज की और राष्ट्र की सेवा के लिए एक नया माध्यम चुना। 6’2″ की ऊंचाई और एक मजबूत शरीर के स्वामी, सतीश कुमार बॉक्सिंग कोच की नजर में आए, जिन्होंने उन्हें खेल में मौका आजमाने के लिए कहा। कुछ साल मेहनत करने के बाद, उन्होंने अपना पहला पदक सीनियर नेशनल चैंपियनशिप में पहली बार खेलते हुए जीता। 20 के होने के बाद मुक्केबाज ने रिंग में अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया, इस समय उनके प्रतिद्वंदी अनुभव में उनसे बहुत आगे रहते थे।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता में लगा समय

बुलंदशहर के इस युवा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता का स्वाद चखने में कुछ समय लगा। उन्हें अपनी दाहिनी आंख के ऊपर एक कट के कारण 2013 के विश्व चैंपियनशिप के क्वार्टर फाइनल से हटने के लिए मजबूर होना पड़ा, क्योंकि उन्हें अपने प्रतिद्वंदी के सामने चिकित्सीय रूप से अयोग्य माना गया। इसके बाद उन्हें 2014 के राष्ट्रमंडल खेलों के भारतीय दल से बाहर होना पड़ा। हालांकि, सतीश ने 2014 एशियाई खेलों और 2015 एशियाई मुक्केबाजी चैंपियनशिप में लगातार कांस्य पदक जीतकर अपने मुक्के की ताकत साबित की।

नियति को कुछ और था मंजूर

रियो ओलिम्पिक से पहले सतीश कुमार अपने कैरियर के सर्वश्रेष्ठ दौर में थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। भौंह के ऊपर गहरे घाव ने उन्हें एक बार फिर रिंग में उतरने से रोक दिया है। एक बड़ा सपना और देश के लिए हैवीवैट वर्ग में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व का मौका छूट गया।

मिली वह जीत, जिसका इंतजार था

अथक मेहनत और जुनून के दम पर सतीश ने एक बार फिर वापसी की। इंडियन ओपन और 2018 के राष्ट्रमंडल खेलों में सतीश ने चांदी के तगमे हासिल कर, आने वाली प्रतियोगिताओं के लिए अपने इरादे जाहिर कर दिए। इस बीच उन्हें अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

इन जीतों ने 30 वर्षीय बॉक्सर को इतनी ताकत दी, जिससे सतीश ने अपने करियर की सबसे बड़ी जीत हासिल की। इस साल सतीश ने एशियाई मुक्केबाजी ओलंपिक क्वालीफायर के सेमीफाइनल में जगह बनाकर टोक्यो ओलंपिक 2020 के लिए क्वालीफाई किया। इस जीत ने उन्हें ओलिम्पिक के फलक पर भारत का परचम लहराने का मौका दिया है।

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