मध्यप्रदेश

पर्यटकों को आकर्षित करने में पीछे हुआ बौद्ध नगरी ‘सांची’, कल्याण का इंतजार

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सांची की ख्याति को बढ़ाने के सरकारों के वादे भी खोखले ही साबित हुए हैं।

कभी देश-दुनिया में शांति का संदेश और मानव जीवन में कल्याण का भाव देने वाली बौद्ध नगरी ‘सांची” को अपने ही कल्याण का इंतजार है। विश्व के पर्यटन नक्शे पर अव्वल स्थानों की सूची में शामिल इस बौद्ध तीर्थ पर उपेक्षा की भरमार और बुनियादी सुविधाओं का अभाव है।

देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करने के मामले में सांची पीछे रह गया है। बीते 5 सालों में लगातार यहां आने वाले पर्यटकों को संख्या में कमी आई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सांची की ख्याति को बढ़ाने के सरकारों के वादे भी खोखले ही साबित हुए हैं।

हालात यह हैं कि 24-25 नवंबर को आयोजित महाबोधि मेले में कोई ख्यात मेहमान नहीं पहुंचा। मप्र में तो आचार संहिता लागू होने का हवाला दिया गया लेकिन अफसर और बौद्ध देश श्रीलंका से कोई नहीं पहुंचा, इसका स्पष्टीकरण नहीं मिला है।

श्रीलंका ने दिखाई रुचि फिर हाथ खींचा :

सांची भारत और श्रीलंका के बीच संबंधों को बेहतर बनाने में कभी सेतु के रूप में भी नजर आया। 500 करोड़ रुपए की लागत वाले अंतरराष्ट्रीय बौद्ध विश्वविद्यालय की 07 साल पहले आधारशिला रखे जाने से लेकर अब तक इसके न बन पाने से दोनों सरकारों की इच्छाशक्ति-समन्वय में कमी साफ दिखाई दे रही है।

श्रीलंका सहित अन्य बौद्ध देशों के इस प्रोजेक्ट से हाथ पीछे खींच लेने से विश्वविद्यालय का निर्माण भी अधिकारों की लड़ाई में उलझकर रह गया। अब किराए के भवन और नाममात्र के छात्रों के बीच यह औपचारिकता ही रह गया है। सांची के पास हवाई पट्टी बनाए जाने की बात भी सरकारी वादों में गुम हो गई है।

सांची के पर्यटन को बढ़ावा देकर स्थानीय बेरोजगार युवाओं को रोजगार देने की बात भी कोरी घोषणा रह गई। सांची की लगातार उपेक्षा से श्रीलंका महाबोधि सोसायटी खासी नाराज है। खबरें तो यहां तक मिल रही हैं कि श्रीलंका महाबोधि सोसायटी के अध्यक्ष जल्दी ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर अपने दिल का गुबार निकाल सकते हैं।

वर्ष 2010 में सांची में वंदना निकेतन (श्रीलंका महाबोधि सोसायटी द्वारा बनाई गई) के लोकार्पण में श्रीलंका के तत्कालीन प्रधानमंत्री रत्नश्री विक्रमनायके शामिल हुए थे।

उन्होंने यहां एक अंतरराष्ट्रीय बौद्ध विश्वविद्यालय बनने का सपना मंच से जाहिर किया था। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने भी एक भव्य विश्वविद्यालय सांची के पास बनाने की घोषणा भी की थी।

इसके बाद सलामतपुर के पास 99 एकड़ जमीन भी चिह्नित की गई और 21 सितंबर 2012 को श्रीलंका के राष्ट्रपति और भूटान के प्रधानमंत्री की मौजूदगी में विश्वविद्यालय की आधारशिला रख दी गई। तब चयनित जगह पर बोधि वृक्ष की एक कलम लगाई गई थी जो अब वृक्ष बन गया है तब से लेकर अब तक इसकी सुरक्षा में पुलिस जवान तैनात रहते हैं लेकिन निर्माण अधर में लटक गया है।

इसके निर्माण के लिए श्रीलंका सहित मलेशिया, जापान, भूटान, हांगकांग व अन्य बौद्ध अनुयायी देशों ने आर्थिक मदद की बात कही थी। अधिकारों की लड़ाई सामने आने के बाद जब श्रीलंका सरकार ने इस प्रोजेक्ट से अपने हाथ खींचे तो फिर कोई दूसरा देश आगे नहीं आया।

अभी मप्र सरकार के पास इसके निर्माण के लिए कोई बजट नहीं है। प्रस्तावित विश्वविद्यालय भारत-श्रीलंका के बीच भारतीय अध्ययन और बौद्ध धर्म की शिक्षा के प्रसार में एक मजबूत कड़ी साबित हो सकता था।

एक जैसी घटनाओं की वजह से महाबोधि मेले के साथ एक मिथक जुड़ गया है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा चल पड़ी है कि सांची स्तूप पर आने और महाबोधि मेले के मुख्य आयोजन में शिरकत करने के बाद कई नेताओं की कुर्सी चली गई।

इसमें पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, उमा भारती, बाबूलाल गौर सहित मंत्रियों में डॉ. गौरीशंकर शेजवार, लक्ष्मीकांत शर्मा, विधायक डॉ. प्रभुराम चौधरी आदि की कुर्सी जाने से इस मिथक की चर्चाएं बढ़ गईं।

स्तूप परिसर स्थित मंदिर के तलघर में गौतम बुद्ध के शिष्य सारिपुत्र और महामोदगळ्यां की पवित्र अस्थियां रखी हैं। 1952 में जब इन्हें पहली बार यहां लाया गया था तब प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने नवंबर महीने के आखिरी रविवार को एक दिवसीय महाबोधि मेला शुरू करवाया।

2010 में मप्र सरकार ने इसे तीन दिवसीय कर दिया था। 2012 में यह आयोजन दो दिन शनिवार-रविवार कर दिया गया। इसी एकमात्र रविवार को इन अस्थियों को बाहर निकलकर कलश यात्रा निकाली जाती है एवं स्तूप परिक्रमा के बाद दर्शनार्थ रखा जाता है। 05 साल से यह आयोजन भी संस्कृति विभाग की उदासीनता से महज औपचारिकता रह गया है।

इसलिए विशेष होता है बोधि वृक्ष

बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए इस पेड़ का खासा महत्व होता है। माना जाता है कि गौतम बुद्ध ने बोधगया में जिस पेड़ के नीचे ज्ञान पाया था उसकी एक शाखा सम्राट अशोक श्रीलंका ले गए थे और वहां अनुराधापुरम में इसकी कलम रोपी थी। प्रस्तावित बौद्ध विवि की जमीन पर इसी पेड़ की शाखा लगाई गई थी।

इसे वीआईपी पेड़ के नाम से काफी ख्याति मिली है। सितंबर 2012 में इसकी कलम रोपने के साथ ही पुलिस के जवान इसकी सुरक्षा में तैनात कर दिए गए। शुरू में यहां 1-4 का गार्ड लगता था। बाद में यह संख्या 3 कर दी गई। सालाना इस पेड़ पर सुरक्षा और पानी का खर्च लगभग 15 लाख रुपए आता है।

पर्यटकों का रूठना इसलिए स्वाभाविक

– सांची में रेलवे स्टेशन है लेकिन केवल दो ही ट्रेनें रुकती हैं।

– ट्रेन न रुकने से भोपाल या विदिशा उतरकर फिर सड़क मार्ग से यहां आना पड़ता है।

– सांची बस स्टैंड पर बदहाली, खराब शौचालय, गंदगी।

– स्वास्थ्य केंद्र पर विश्व धरोहर जैसी सुविधाएं नहीं।

– सांची से सलामतपुर होकर भोपाल, सांची से रायसेन होकर भोपाल सड़क बदहाल।

– गाइड, ट्रेवल्स कंपनियों आदि की कमी।<>

 

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