क्या रूपए का कम लेवल बन सकता है इकोनॉमिक्स के लिए खतरा

इकोनॉमिक्स में उछल-पुथल से ये गिरावट आगे भी देखी जा सकती है

नई दिल्ली। कच्चे तेल में बढ़ोतरी और अमेरीका में ब्याज दरों में बढ़ोतरी का असर रूपए पर साफ तौर से देखा जा सकता है। गुरूवार को रूपया फिसलकर 69 पैसे पहुंच गया।

जिससे आज तक कि सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही थी। इससे पहलेल ऐसा गिरावट 2016 के नंवबर में था। इस समय रूपया 68.86 के स्तर पर था।

लेकिन कुछ देर बाद रूपए में हल्की बढ़त देखने को मिली। पर इकोनॉमिक्स में उछल-पुथल से ये गिरावट आगे भी देखी जा सकती है।

इसका सबसे बड़ा कारण भारत को विदेशों से कच्चा तेल खरीदने के लिए अब ज्यादा डॉलर की आवश्यकता पड़ेगी। भारत बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर करता है, इसलिए हमें हर साल ज्यादा से ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है।

लेकिन विदेशी निवेश में गिरावट आई है, यानी हमारे पास कम डॉलर आ रहे हैं। ऐसे में रुपया का कमजोर पड़ना स्वाभाविक है।

ऐसा जरूरी नहीं है। 36 देशों के रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (REER) के मुताबिक रुपया अब भी ओवरवैल्यूड है। REER इंफ्लेशन से अजस्टेड करंसी वैल्यू होती है।

RBI के डेटा से पता चलता है कि मई तक रुपया 14.67% ओवरवैल्यूड था। कमजोर रुपये से एक्सपोर्ट्स को सहारा मिल सकता है।

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