CG Chunav 2018 : पण्डो जनजाति का मतदान, हक की लड़ाई लड़ने का फैसला

ये खुद को पांडवों का वंशज होने का दावा करते हैं। साथ ही ये देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के दत्तक पुत्र भी हैं।

रायपुर (छत्तीसगढ़)

CG Chunav 2018 के दूसरे चरण की 72 सीटों पर वोटिंग जारी है। इस चरण में सरगुजा संभाग की 14 सीटों पर भी वोट पर रहे हैं। इन सीटों के मतदाताओं में पण्डो जनजाति के मतदाता भी शामिल हैं।

सरगुजा के जंगल से बस्तियों तक निवास कर रही पण्डो जनजाति का इतिहास निराला है। ये खुद को पांडवों का वंशज होने का दावा करते हैं। साथ ही ये देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के दत्तक पुत्र भी हैं। पढ़िए यह रोचक जानकारी

राष्ट्रपति से ली थी शिक्षा

पण्डो के वंशजों ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद से शिक्षा हासिल की थी। दरअसल, यह आजादी से पहले की बात है। अंग्रेजों ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद को इससे बचाने के लिए उनके घनिष्ठ तत्कालीन महाराज सरगुजा ने उन्हें जंगलों में स्थित पण्डो की बस्ती में शिक्षक कहकर पेश किया था।

शोधकर्ता गोविंद शर्मा बताते हैं कि अंग्रेज संदेह न कर पाएं इसलिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद की बाकायदा नियुक्ति की गई थी और उन्हें राजकीय कोष से वेतन भी दिया जाता था। राष्ट्रपति बनने के बाद वे एक बार पुन: सरगुजा आए और अपने शरणदाताओं से मिलने गए। वहीं पर उन्होंने पण्डो जनजाति को गोद लेकर उन्हें राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र घोषित कर दिया।

यहां है दूसरा राष्ट्रपति भवन

डॉ. राजेंद्र प्रसाद का यह स्नेह दत्तक पुत्र मानने तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि उन्होंने अपने अज्ञातवास के स्थान का जीर्णोद्धार कराके उसे राष्ट्रपति भवन की मान्यता दे डाली। उस बस्ती का नाम पण्डो नगर पड़ गया। इस तरह देश में तकनीकी तौर पर दो राष्ट्रपति भवन हैं। पहला भारतीय लोकतंत्र व गणतंत्र के स्थापत्य प्रतीक के रूप में दिल्ली की रायसीना हिल्स पर और दूसरा उच्च विचार, सादगी और कृतज्ञता को परिलक्षित करता सरगुजा क्षेत्र के सूरजपुर जिले के पण्डो नगर में।

दशकों तक सरकारी व राजनीतिक संरक्षण प्राप्त कर चुके पण्डो की दुनिया समय बीतने के साथ बदरंग होती गई। कभी जंगलों में बसने वाली इस नंग-धड़ंग और घुमंतू जनजाति को सभ्य समाज में दाखिल कराने के लिए महाराज सरगुजा और सरकारों द्वारा दिए गए जमीनों के पट्टे अब इनके गले की फांस बन चुके हैं। जंगलों से रिहायशी नाता टूट चुका है और सरकारी नियमों से अज्ञानता ने उन्हें मिली हुई जमीन से बेदखली का फरमान सुना दिया है।

अपनी पीड़ा को बयान करते हुए इनमें कई तो यहां तक कहते हैं कि ऐसे सभ्य समाज में रहने से बेहतर था कि हमारे पूर्वज जंगली असभ्य समाज का ही हिस्सा बने रहते। कम से कम लोगों के सामने गिड़ गिड़ाना तो न पड़ता।

दरअसल पण्डो को दिए गए जमीनी पट्टे मियादी थे और इनके अनुसार इनकी अनपढ़ता का लाभ उठाकर सरकारी बाबुओं ने ये पट्टे दूसरों के नाम कर दिए। चुनावी गणित में हावी हो चुके धनबल-बाहुबल का फायदा उठाते हुए रसूखदार और राजनीतिज्ञों के चहेतों ने उस भूमि पर कब्जा करना प्रारंभ कर दिया जो तकनीकी तौर पर उनकी हो गई थी लेकिन परंपरागत तौर पर पण्डो की थी। इसके अलावा इन्हें मिले विशेष दर्जे पर धूल पड़ने के साथ ही इनके घरों तक सड़क और बिजली-पानी भी ठीक से नहीं पहुंची। जंगलों के पास बसी इस जनजाति को नई कोयला खदानों के शुरू होने के बाद हाथियों के भी कहर का सामना करना पड़ रहा है।

आज भी भटकने को मजबूर

यह दत्तक पुत्र आज अपने हकों के लिए ब्लॉक, तहसीलों और राजनीतिक आकाओं के चक्कर काट रहे हैं। लगातार उपेक्षित पण्डो को उम्मीद की आस तब दिखाई देती है जब राज्य में चुनावी लाउडस्पीकर बजने लगते हैं और घोर वीराने में बसी उनकी बस्तियों में सियासी पहरुए वायदे की पोटली लेकर दस्तक देते हैं। पट्टों के नवीनीकरण, पानी-बिजली की सुविधाओं, बस्तियों में सड़क लाने और बेहतर जिंदगी के जुमले एक बार फिर उन्हें आशाओं के समुद्र में ले जाते हैं।

इस बार अपने हक की लड़ाई के लिए इस जनजाति ने अपने वजूद से राजनीतिक हथियार बनाने का निर्णय ले लिया है। इस रणनीति के तहत जगह-जगह पंचायतें और बैठकें की गई। इनमें यह तय किया गया कि किसको वोट किया जाए। आज ये लोग अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।

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