क्राइमराष्ट्रीय

लड़कियों की तुलना में लड़कों का यौन उत्पीड़न ज्यादा!

लड़कों को उत्पीड़न के मामले में न्याय मिलने की संभावना बेहद कम

नई दिल्ली।

अक्सर जब बात बच्चों से यौन उत्पीड़न की होती है तो मान लिया जाता है कि लड़कियों से होने वाले अपराध की ही चर्चा चल रही होगी। वहीं, केंद्रीय महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की रिपोर्ट की मानें तो देश में 53.22 फीसदी बच्चों को यौन शोषण के एक या अधिक रूपों का सामना करना पड़ा, जिसमें से 52.94 फीसदी लड़के भी यौन उत्पीड़न के शिकार हुए।

चेंज डॉट ओआरजी के माध्यम से बाल यौन उत्पीड़न के मामले को उठाने वाली याचिकाकर्ता, फिल्म निर्माता और लेखक इंसिया दरीवाला के मुताबिक, सबसे बड़ी समस्या है कि इस तरह के मामले कभी सामने आते ही नहीं हैं क्योंकि हमारे समाज में बाल यौन उत्पीड़न को लेकर जो मानसिकता है उसके कारण बहुत से मामले दर्ज ही नहीं होते। होते भी हैं तो मेरी नजर में बहुत ही कम ऐसा होता है।

वह कहती हैं कि इस तरह के मामले सामने आने पर समाज की पहली प्रतिक्रिया होती है कि लड़कों के साथ तो कभी यौन शोषण हो नहीं सकता, क्योंकि वे पुरुष हैं और पुरुषों के साथ कभी यौन उत्पीड़न नहीं होता। समाज का यह नजरिया ठीक नहीं है क्योंकि पुरुष बनने से पहले वह लड़के और बच्चे ही होते हैं। बच्चों की यह जो श्रेणी है काफी दोषपूर्ण है। इसमें कोई लड़का-लड़की का भेद नहीं होता। लड़कों का जो शोषण हो रहा है, वह पुरुषों द्वारा ही हो रहा है। यह नजरअंदाज कर दी जाने वाली सच्चाई है।

इंसिया दरीवाला के मुताबिक, हम बच्चों व महिलाओं से यौन हिंसा की जड़ तक पहुंच ही नहीं सके हैं। लड़कों के यौन उत्पीड़न की शिकायत से कतराने की वजह क्या है? दरअसल जब समाज में किसी लड़की के साथ यौन उत्पीड़न की घटना होती है तो समाज की पहली प्रतिक्रिया हमदर्दी की होती है। उन्हें बचाने के लिए सपोर्ट सिस्टम होता है। वहीं, अगर कोई लड़का अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामले को लेकर बोलता भी है तो पहले लोग उस पर हंसेंगे। उसका मजाक उड़ाएंगे। कई लोग तो उसकी बातों का विश्वास नहीं करेंगे।

मजाक बनाए जाने के डर से लड़कों को आगे आकर ऐसी शिकायत दर्ज करवाने में डर लगता है। इस तरह समूचा समाज बाल यौन उत्पीड़न को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दे रहा है। इंसिया दरीवाला कहती हैं, ‘पिछले एक साल में जब से मैंने अपना अभियान और लोगों से बात करना शुरू किया है तब से काफी चीजें बदली हैं। मैं सरकार की शुक्रगुजार हूं कि कम से कम वह इस ओर ध्यान दे रहे हैं।’

आज सामान्य कानूनों को निष्पक्ष बनाने की प्रक्रिया चल रही है। इसकी शुरुआत पॉक्सो कानून से हुई। अब धारा 377 और पुरुषों के साथ होने वाले दुष्कर्म से जुड़े कानूनों को भी देखा जा रहा है। यह लिंग समानता की ओर एक बड़ा कदम माना जा सकता है। इससे वास्तव में सामाजिक समानता आने की उम्मीद बनती है।

लैंगिक समानता का मतलब यह नहीं है कि एक ही लिंग को ध्यान में रखकर सारे कानून बनाए जाएं। यह सिर्फ महिला अधिकारों की बात नहीं है। पुरुषों और महिलाओं को समान रूप से सुरक्षा मिलनी चाहिए। पॉक्सो कानून निष्पक्ष है लेकिन इसमें लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में दंड के प्रावधान को देखें तो वह धारा—377 के तहत दिया जाता था। पहले दो पुरुषों के बीच सहमति से शारीरिक संबंध बनने पर भी इसी धारा के तहत दोनों को सजा दे दी जाती थी। अगर इसमें जबर्दस्ती या आपराधिक घटना का प्रमाण मिलता तो भी दोनों को इसी धारा के तहत सजा दी जाती थी।

अब चीजों में सुधार हुआ है और इसपर अब काफी चर्चा हो रही है और समाज में भी बदलाव आ रहा है। महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी से मिले समर्थन पर इंसीया दरीवाला ने कहा, ‘उन्होंने मेरे काम की सराहना की है और कहा कि यह काम काफी जरूरी है। मैंने उनसे एक स्टडी की मांग की थी, जिसमें यह देखना था कि बाल यौन उत्पीड़न की हमारे समाज में कितनी प्रबलता है और इसके जो प्रभाव हैं वह बच्चों और पुरुषों पर क्या हैं? इस स्टडी के निष्कर्षो से मुझे मापदंड तैयार करने हैं और उन मापदंड़ों को मैं इसलिए तैयार करना चाहती हूं क्योंकि जब तक हम जड़ की जांच नहीं करेंगे तब तक नहीं पता चलेगा कि यह क्यों हो रहा है।’

गौरतलब है कि भारत सरकार ने लिंग निष्पक्ष कानून बनाने के लिए लड़कों के साथ होने वाले यौन शोषण को मौजूदा यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा (पॉक्सो) अधिनियम में संशोधनों को मंजूरी दे दी है जिसे कैबिनेट के पास मंजूरी के लिए भेजा जाना बाकी है।

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लड़कियों की तुलना में लड़कों का यौन उत्पीड़न ज्यादा!
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