छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ दुग्ध महासंघ के अध्यक्ष रसिक परमार ने अपने पद से दिया इस्तीफा

महासंघ के खिलाफ दुष्प्रचार से व्यथित होकर पद छोड़ा

रायपुर:विगत कुछ वहीँ समय से छत्तीसगढ़ दुग्ध महासंघ में घाटे की खबरें लगातार प्रकाशित प्रसारित होती आ रही हैं। इन आरोपों की पांच स्तरों पर जांच हो चुकी है और हर जांच में आरोप निराधार पाए गए हैं। छत्तीसगढ़ दुग्ध महासंघ के अध्यक्ष रसिक परमार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने और महासंघ के खिलाफ दुष्प्रचार से व्यथित होकर पद छोड़ा है।

श्री परमार पिछली सरकार में महासंघ के अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हुए थे। वे भाजपा के मीडिया विभाग के अध्यक्ष रहे। करीब दस साल महासंघ के अध्यक्ष के रूप में काम किया। सरकार बदलने के बाद उन्हें हटाने की मांग जोर पकडऩे लगी और शिकवा-शिकायतों का अंबार लग गया था। इन शिकायतों की जांच भी हो रही है। रसिक की साख अच्छी रही है और उनके कार्यकाल में महासंघ को मुनाफा हुआ है।

उन्होंने अपने खिलाफ आरोपों पर स्पष्ट किया कि पंजीयक के पत्र में 2016-17 से 2018-19 के बीच 19.09 करोड़ की हानि और मुझ पर कर्तव्य से विमुख होने का आरोप है। दरअसल आंकड़ों में तकनीकी त्रुटियों के कारण यह घाटा इतना दिख रहा है। वास्तव में दुग्ध महासंघ की वर्तमान स्थिति अभी भी मजबूत है। मेरे कार्यकाल में महासंघ को कभी परिचालन घाटा तो हुआ ही नहीं। जो घाटा दिख रहा था वह स्थापना व्यय व पूंजीगत व्यय के कारण दिख रहा था।

परमार ने कहा कि दुर्भाग्य से सुनियोजित ढंग से यह प्रचारित किया जा रहा था कि दुग्ध महासंघ में करोड़ों का घाटा है और वहां बड़े पैमाने पर गड़बडिय़ां हो रही हैं। जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि दूध प्रदायक किसान महासंघ से काफी खुश हैं। और जो लोग इस तरह के बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं उनका दुग्ध महासंघ से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है और न ही वे महासंघ के सदस्य हैं। यहां यह भी स्पष्ट कर देता हूं कि महासंघ में राज्य सरकार का एक रुपया भी नहीं लगा है। केंद्रीय योजनाओं व किसानों से सहयोग लेकर महासंघ चल रहा है। लेकिन चूंकि पंजीयन छत्तीसगढ़ में हुआ है इसलिए सत्ता का हस्तक्षेप हो रहा है।

उन्होंने बताया कि उनके कार्यकाल में दूध का कलेक्शन 24000 लीटर से बढक़र 1.30 लाख लीटर हो गया। मैंने अपने कार्यकाल में निरंतर दुग्ध महासंघ और दुग्ध उत्पादकों के हित को ध्यान में रखते हुए काम किया। इस सिलसिले में कुछ कड़े फैसले भी लिए गए जिनसे कुछ स्वार्थी तत्वों को नाराजगी हुई। और उन्होंने मीडिया में लगातार गलत प्रचार किया। बावजूद इसके लिए उनके आरोप बार बार जांच में खारिज हुए। मुझे विश्वास है कि आगे भी जो जांच होगी उनमें मेरे खिलाफ लगाए गए आरोप असत्य पाए जाएंगे।

अपने खिलाफ आरोपों पर स्पष्ट किया कि मीठे दूध के निर्माण में भी घाटा दिखाया गया है। इस घाटे का कारण कीमत में वृद्धि को लेकर राज्य सरकार का राजी न होना था। चार वर्षों के विभिन्न पत्राचार के बाद राज्य सरकार ने इस पर अपनी सहमति दी जिसके कारण महासंघ को राशि प्राप्त हुई है। इसी तरह यूएचटी मिल्क के निर्माण में मंडी बोर्ड के साथ अधिक भुगतान को लेकर विवाद चल रहा है जो लगभग निराकृत हो गया है। इन दोनों वजह से यूएचटी मिल्क के निर्माण में घाटे की भरपाई हो चुकी है और घाटे की जगह लाभ दिख रहा है।

उन्होंने कहा कि घाटे में चलने वाली शासकीय डेयरियों के संचालन का व्यय दुग्ध महासंघ को उठाना पड़ा जो लगभग 3 से 4 करोड़ रुपए है। इसके अतिरिक्त पंजीयक के निर्देश पर महासंघ को छठवां वेतनमान कर्मचारियों को देना पड़ा जिसका अतिरिक्त भार दुग्ध महासंघ पर पड़ा। महासंघ का संयंत्र 1985 से पहले का है। इसके सुधार का खर्च केंद्र शासन के अनुदान से पूरा नहीं हो पा रहा था। और राज्य सरकार से कोई सहयोग नहीं मिल रहा था इसलिए महासंघ ने अपने संसाधनों से इस पर 3-4 करोड़ रुपए खर्च किए।

परमार ने यह भी कहा कि एक तरफ केंद्र और राज्य सरकारों के प्रयासों से प्रदेश में दुग्ध उत्पादन 4-5 गुना बढ़ गया लेकिन इसके अनुपात में बिक्री नहीं बढ़ी क्योंकि पूरे देश में दुग्ध के व्यापार के लिए अनुकूल वातावरण नहीं था। महासंघ राज्य सरकार की संस्था है इसलिए इसके बावजूद किसानों से दूध खरीदना उसकी मजबूरी थी। महासंघ के दूध को निजी कंपनियों के दूध से मुकाबला करना पड़ता है। निजी कंपनियों के दूध की शेल्फ लाइफ उनके आधुनिक संयंत्रों के कारण अधिक होती है। इसलिए वे दूर तक दूध बेच पाती हैं। इन सबके चलते महासंघ को बड़ी मात्रा में दूध से पावडर व बटर बनाना पड़ा। पावडर बनाने के लिए महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के संयंत्रों की मदद लेनी पड़ी। पावडर बनाने के बाद भी इसका लाभ नहीं मिल सका क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दूध पावडर के दाम गिर गए। दूसरे राज्यों की डेयरियों को भी इस अवधि में घाटा हुआ लेकिन अपनी राज्य सरकारों की मदद से उन्होंने यह घाटा सह लिया। छत्तीसगढ़ में ऐसा नहीं हुआ।

उन्होंने यह भी बताया कि घाटे को कम करने के तीन उपाय थे। पहला यह कि जितना दूध बिकता है उतना ही हम किसान से खरीदें। पर यह राज्य की सहकारी डेयरी होने के कारण संभव नहीं है। दूसरा यह कि दूध का रेट हम किसानों को कम दें, यह भी इसलिए संभव नहीं था क्योंकि यहां की गायों की उत्पादकता कम है और दूध की उत्पादन लागत अधिक है। तीसरा यह कि अन्य राज्यों की तरह राज्य सरकार घाटे की क्षतिपूर्ति करती लेकिन यह भी नहीं हो पाया।

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