छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस विधि विभाग द्वारा नगरनार स्टील प्लांट के केंद्र की बीजेपी सरकार द्वारा की जा रही विनिवेश की घोर भर्भस्थाना

देश की इस्पात जरूरतों की पूर्ति करना एवं देश के नक्सल प्रभावित पिछड़े इलाके बस्तर के आदिवासियों का जीवन स्तर ऊँचा करना एवं उद्योग के माध्यम से लोगो को स्थायी रोजगार प्रदान करना.

बिलासपुर : छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस विधि विभाग के प्रदेश अध्यक्ष संदीप दुबे एवं विधि विभाग प्रदेश प्रवक्ता सुशोभित सिंह द्वारा जारी प्रेस बयान में बताया की केंद्र की बीजेपी सरकार का NMDC के नगरनार स्टील प्लांट बस्तर विनिवेश /बिक्री के निर्णय को निंदनीय कहा है,जो चंद उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने की नियत से लिया गया है.

नगरनार स्टील संयंत्र की स्थापना भारत सरकार इस्पात मंत्रालय द्वारा एनएमडीसी जो की एक सरकारी उपक्रम है के माध्यम से की गयी थी. इस परियोजना की परिकल्पना सर्वप्रथम संन २००९-२०१० में की गयी थी। परियोजना का मुख्य उद्देश्य था देश की इस्पात जरूरतों की पूर्ति करना एवं देश के नक्सल प्रभावित पिछड़े इलाके बस्तर के आदिवासियों का जीवन स्तर ऊँचा करना एवं उद्योग के माध्यम से लोगो को स्थायी रोजगार प्रदान करना.

नगरनार स्टील संयंत्र की स्थापना लगभग २०००० बीस हज़ार करोड़ की लागत से की गयी थी तथा इसका वार्षिक स्टील उत्पादन क्षमता लगभग ३० लाख टन प्रतिवर्ष है। इस परियोजना के लिए वन भूमि समेत आदिवासियों की लगभग १८०० एकड़ भूमि अर्जित की गयी थी तथा स्थानीय निवासियों को यह आश्वासन दिया था की उनका समुचित पुनर्वास और पुनर्व्यस्थापन किया जाएगा तथा उनके स्थायी रोजगार का प्रबंध किया जाएगा.

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छत्तीसगढ़ सरकार ने भी इसमें पूर्ण सहयोग किया था तथा परियोजना के लिए आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराया था. नगरनार स्टील संयंत्र का विनिवेश के माध्यम से निजीकरण होने से स्थानीय निवासियों के अपेक्षाओं एवं आकांक्षाओं पर जबरदस्त आघात पंहुचेगा तथा वे स्वयं को छाला हुआ महसूस करेंगे।

सघन वन एवं आदिवासी इलाके में लोगो ने अपनी भूमि इसी आश्वासन पर दी थी की उनका समुचित पुनर्वास और पुनर्व्यस्थापन किया जाएगा किन्तु निजीकरण होने से अब यह संभव होता नहीं दीखता. निजीकरण के निर्णय के पीछे दुर्भावना की नियत इस बात से प्रमाणित होती है की जिस परियोजना के लिए भारत सरकार ने २०००० बीस हज़ार करोड़ व्यय किया था ,उस परियोजना को ठीक उत्पादन के समय निजी हाथो में सौपा जा रहा है.

ऐसा ही निजीकरण का निर्णय पूर्व में सं २००१ में बालको के लिए किया गया था जब बालको का ५१ % शेयर मात्र ५०१ करोड़ में बेचकर निजीकरण किया गया था। बालको को क्रय करते ही स्टरलाइट इंडस्ट्रीस को बाद में कई हज़ार करोड़ का लाभ हुआ था. लाभप्रद सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण करना केंद्र सरकार की जन विरोधी निति को दर्शाता है।।

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