मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एमडीओ की भूमिका पर डाली रौशनी

रायपुर: इंडिया टूडे के ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा और इंडिया टूडे हिन्दी संस्करण के संपादक अंशुमान तिवारी के साथ वार्तालाप में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने यह साफ कह दिया है कि अदाणी ग्रुप को कोई भी खदान नहीं दी गई है और यह कंपनी मात्र एक कंट्रैक्टर है।

देश के सबसे बड़े मैगजीन इंडिया टूडे ने मुख्यमंत्री का तीन पन्ने का इंटरव्यू छापा है, जिसमें उन्होंने कई सवालों के जवाब देकर अपना पक्ष रखा है, और जिसमें अदाणी ग्रुप के बारे में भी सवाल किये गये थे। इससे पहले, अदाणी ग्रुप ने भी कई बार कहा है कि वह सिर्फ कंट्रैक्टर है और अलग-अलग राज्य सरकारों या उनके उपक्रम के खदान के ही मालिक हैं।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से पूछा गया कि अदाणी ग्रुप को दंतेवाड़ा में खदान दिये जाने को लेकर वहां के लोगों द्वारा किये जाने वाले विरोध के बारे में उनका क्या कहना है? मुख्य्मंत्री ने कहा कि मैं स्पष्ट कर दूं कि कोई भी खदान अदाणी को नहीं दी गई है। यूपीए सरकार के दौरान, एक आरोप लगा था कि कोल आवंटन में 1.86 लाख करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है।

इसके बाद राज्यों और राज्यों के बिजली बोर्ड को, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और तेलंगाना को आवंटन किया गया। फिर निविदाओं और एमडीओ (खदान डेवलपर्स और ऑपरेटरों) की प्रणाली आयी, बैलाडिला एनएमडीसी और सीएमडीसी के बीच एक संयुक्त उद्यम है। उन्होंने एमडीओ के लिए निविदाएं जारी की और अदाणी को निविदा मिल गई।

जब आंदोलन शुरू हुआ (7 जून को), तो हमें बताया गया कि जंगलों को काटा जा रहा है, हमने इसे रोक दिया: हमने यह भी कहा कि हम महत्वपूर्ण ग्राम सभा बैठक (जिसकी सहमति किसी भी विकास गतिविधि के लिए अनिवार्य है) में जांच करेंगे। इन्हीं कार्रवाइयों के आधार पर आंदोलन समाप्त हुआ।

यह जाहिर बात है कि एमडीओ मॉडल एक नये जमाने का मॉडल है जो सरकार के लिए कम कीमत में कुशलता से पर्यावरण को नुकसान से बचाते हुए कोयला पैदा करता है, ताकि ग्राहकों को निरंतर बिजली सस्ते दामों में पहुंचाई जाये। माइन डेवलपर और ऑपरेटर (एमडीओ) एक नए जमाने का मॉडल है जो खनन कंपनी को निश्चित मात्रा और गुणवत्ता का कोयला प्रदान करने के लिए एक दीर्घकालिक अनुबंध देता है। यह आश्वासन प्रदान करता है कि खदान मालिक डेवलपर को केवल डिलिवर किये गये प्रति मीट्रिक टन गुणवत्ता वाले कोयले का भुगतान करता है।

अगर उत्पादन के लिए निर्धारित समयसीमा को पूरा करने में खनन ऑपरेटर विफल रहता है तो उस पर सरकार कठोर जुर्माना लगाकर रोक भी लगा सकती है। एमडीओ मॉडल वैज्ञानिक और आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग करके, दक्षता बढ़ाकर और टिकाऊ खनन प्रथाओं को शुरू करके उच्च उत्पादन के माध्यम से इस क्षेत्र के लिए गेम-चेंजर बन सकता है।

पीएसयू द्वारा एमडीओ का चयन अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी बोली की पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है। राज्य की सार्वजनिक क्षेत्र इकाई (पीएसयू) द्वारा नियुक्त एमडीओ के मामले में, कोयला एमडीओ से संबंधित नहीं है। खनन ऑपरेटर को उत्खनन सहित कोयला ब्लॉक के विकास और संचालन के लिए सिर्फ खनन शुल्क का भुगतान किया जाता है, और जो कि कोल इंडिया लिमिटेड की सहायक कंपनियों द्वारा कोयला उत्खनन के लिए खनन के उप-ठेकेदारों को 18% जीएसटी के साथ किये जाने वाले भुगतान के समान है।

हाल ही में उनकी प्रधानमंत्री के साथ मुलाकात के बारे में मुख्यमंत्री बघेल ने कहा कि राज्यों और राज्यों के बिजली बोर्ड को खदानों के आवंटन से हमें केवल 100 रुपये प्रति टन रॉयल्टी के रूप में मिल रहे हैं, जबकि नीलामी से हमें कम से कम 2300 रुपये प्रति टन मिला है। अगर आवंटन की यह प्रणाली जारी रहती है तो अगले 30 वर्षों में, छत्तीसगढ़ को 9 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा। इस रायल्टी को कम से कम 500 प्रति टन तक बढ़ाया जाना चाहिए।

पश्चिम बंगाल, ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गुजरात की राज्य सरकारों के अलावा, स्टील अथॉरिटी, एनटीपीसी, कोल इंडिया की सहायक कंपनियों ने पिछले एक दशक में अपने आधार पर खनन करने के बजाय एमडीओ मॉडल अपनाया है। बीजीआर माइनिंग एंड इंफ्रा लिमिटेड, सैनिक माइनिंग एंड एलाइड सर्विसेज लिमिटेड, अदाणी एंटरप्राइजेज, सिकल लॉजिस्टिक्स और अंबे माइनिंग इस क्षेत्र की कुछ प्रमुख कंपनियां हैं।

इस मॉडल ने त्रिवेणी अर्थमूवर्स लिमिटेड, दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड, वीपीआर माइनिंग, एएमआर, मोंटी कार्लो, महालक्ष्मी माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनियों को भी आकर्षित किया है। इनमें से कई कंपनियां नए एमडीओ अनुबंध प्राप्त करने की प्रक्रिया में हैं। आने वाले समय में एमडीओ की व्यामपकता और भी बढ़ेगी।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि देश कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों के माध्यम से अपनी 80% बिजली की जरूरतों को पूरा करता है। हालाँकि, भारत दुनिया में पांचवा सबसे बड़ा रिकवरेबल यानी पुन: प्राप्ति, योग्य कोयला भंडार होने के बावजूद आयातित कोयले पर काफी निर्भर है।

एक देश के लिए, जिसने अप्रैल-नवंबर 2018 के बीच 156 मिलियन टन से अधिक का आयात किया, एमडीओ मॉडल आयात निर्भरता को कम कर सकता है और भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकता है और विदेशी मुद्रा को बचा सकता है।

Back to top button