कलेक्टर ने खेतों में पराली, पैरा-ठूंठ नहीं जलाने किसानों से की अपील,कहा- राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के निर्देशों का पालन करें

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के प्रावधानों के अनुसार किसी भी किसान द्वारा अपने खेतों में फसल अवशेष जलाने अथवा जलाते हुए पाए जाने पर उनके खिलाफ दण्डात्मक या जुर्माने की कार्रवाई की जाएगी।

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धमतरी, 18 नवम्बर 2020: राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) द्वारा दिए गए निर्देशों के तहत जिले में फसल अवशेष (पराली), पैरा-ठूंठ को जलाने तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित किया गया है। कलेक्टर जयप्रकाश मौर्य ने जिले के किसानों से अपील की है कि वे अपने खेतों में पराली, पैरा-ठूंठ आदि न जलाएं। उन्होंने बताया कि किसानों द्वारा फसल अवशेष ठूंठ को खेतों में जलाने से भूमि में लाभदायक जीवाणुओं के नष्ट होने के साथ-साथ कार्बन डाइआॅक्साइड, नाइट्रस आॅक्साइड, मिथेन गैस एवं विभिन्न प्रकार की जहरीली गैसों से वायु प्रदूषण, मृदा स्वास्थ्य बिगड़ने के अलावा मनुष्यों में दमा, फेफड़े की बीमारी और मानव स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के प्रावधानों के अनुसार किसी भी किसान द्वारा अपने खेतों में फसल अवशेष जलाने अथवा जलाते हुए पाए जाने पर उनके खिलाफ दण्डात्मक या जुर्माने की कार्रवाई की जाएगी। दो एकड़ कृषि भूमि धारक किसानों पर ढाई हजार रूपए, दो से पांच एकड़ कृषि भूमि धारक किसानों पर पांच हजार रूपए जुर्माना तथा पांच एकड़ से अधिक भूमि धारक किसानों पर 15 हजार रूपए का पर्यावरणीय जुर्माना प्रति घटना लगाया जा सकता है।

फसल अवशेष को जलाने की बजाय उनका उचित प्रबंधन करने के लिए किसानों को सुझाव कृषि विभाग के द्वारा दिए जाते हैं। इसके तहत् फसल कटाई के बाद खेत में पड़े हुए अवशेष के साथ ही गहरी जुताई कर पानी भरने से फसल अवशेष कम्पोस्ट में परिवर्तित हो जाते हैं, जिससे अगली फसल के लिए मुख्य एवं सूक्ष्म पोषण तत्व प्राप्त होंगे। फसल कटाई के बाद खेत में बचे हुए अवशेषों को जुताई कर खेत में पलट दें अथवा इकट्ठा कर गढ्ढे या वर्मी कम्पोस्ट टांकों में डालकर कम्पोस्ट बनाने के लिए उपयोग किया जा सकता है।

उप संचालक कृषि ने बताया

उप संचालक कृषि ने बताया कि फसल कटाई के बाद खेत पर पड़े फसल अवशेषों को बिना जलाए बोनी हेतु जीरोसीडड्रिन इत्यादि से बुवाई करने से खेत की नमी के साथ-साथ ऊपर पड़े हुए फसल अवशेष भी नमी संरक्षण का कार्य करते हैं, जिससे खरपतवार नियंत्रण एवं बीजों के सही अंकुरण के लिए मल्चिंग के रूप में कार्य होगा। फसल अवशेषों का उपयोग मशरूम उत्पादन के लिए भी किया जा सकता है। भूमि को फसल अवशेष से प्राप्त होने वाले कार्बनिक तत्व जो कि मृदा में मिलकर उर्वरक के रूप में परिवर्तित होकर फसलों को मिलती है, जिससे मृदा संगठन एवं संरचना में सुधार के साथ ही भूमि की जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है।

खेत में ही वेस्ट डिकम्पोजर तरल पदार्थ से फसल अवशेषों को सड़ाकर खाद तैयार कर रासायनिक खाद क्रय करने की राशि में बचत की जा सकती है। जैसे कि एक टन पैरा न जलाकर डिकम्पोजर से सड़ाकर कम्पोस्ट खाद बनाने पर पांच किलोग्राम नत्रजन, 12 किलोग्राम स्फुर एवं पांच किलोग्राम पोटाश खाद खेत में तैयार करने से कीट व्याधि एवं खरपतवारों की रोकथाम तो होती ही है। साथ ही फसल लागत कम एवं उपज अधिक तथा आमदनी में वृद्धि किया जा सकता है।

निर्धारित मापदण्ड अनुसार फसल अवशेष प्रबंधन किए जाने पर किसानों को प्रति एकड़ एक हजार रूपए प्रोत्साहन, अनुदान राशि प्रदान की जाती है। अतः किसानों से अपील की गई है कि वे अधिक से अधिक संख्या में फसल अवशेष प्रबंधन कर योजना का लाभ उठाएं। योजना की जानकारी के लिए किसान अपने क्षेत्रीय ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी/वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी कार्यालय में सम्पर्क कर सकते हैं।

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