ज्योतिष

आईये जानें क्या कहते हैं पुराण वास्तु शास्त्र के विषय में

आचार्या रेखा कल्पदेव:

वास्तुषास्त्र की जानकारी हमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद के साथ-साथ पुराणों एवं अन्य ग्रन्थों से भी मिलती है। परंतु इसके सिद्धांतों का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में किया गया। इन चार वेदों के पष्चात् चार उपवेद भी लिखे गये। इन्हीं उपवेदों में स्थापत्य वेद भी है जो अथर्ववेद का उपवेद है।

कालान्तर में यह स्थापत्यवेद ही वास्तुषास्त्र के रूप में विकसित हुआ। इसके साथ ही मत्स्य पुराण, स्कंद पुराण, अग्नि पुराण, वायु पुराण, गरूड़ पुराण तथा भविष्य पुराण आदि से भी वास्तु के बारे में जानकारी मिलती है। मत्स्य पुराण में शिलाओं पर नक्काशी, समारोह स्थल की स्थिति एवं साज-सज्जा के सिद्धांतों की विस्तृत चर्चा की गई।

वास्तुशास्त्र के विषय में पुराण क्या कहते हैं?

नारद पुराण में मंदिरों के विषय में अनेक उल्लेखनीय तथ्य देखने को मिलता है। इसी प्रकार गरूड़ पुराण में रिहायशी भवनों तथा मंदिरों से संबंधित सिद्धांतों की विस्तृत चर्चा है। मंदिरों के विषय में वास्तु सिद्धांतों की व्याख्या वायु पुराण भी करता है।

परंतु इसमें उन मंदिरों का वर्णन है जो अधिक ऊँचाई पर बनाये गये हैं। स्कंद पुराण में दिए गए नगर योजना सिद्धांतों को यथासंभव ठीक ढंग से अपनाया जाए तो पाश्चात्य सभ्यता के महानगर भी उस कृति के समक्ष फीके पड़ जाएंगे।

इसी तरह अग्नि पुराण में रिहायशी भवन की विस्तृत व्याख्या मिलती है। इन प्राचीन ग्रंथों के अतिरिक्त अन्य ग्रंथों में भी वास्तु की व्यापक एवं विस्तृत जानकारी मिलती है। रामायण, महाभारत, चाणक्य के अर्थशास्त्र, जैन एवं बौद्ध ग्रंथ, समरांगण सूत्रधार, विश्वकर्मा प्रकाश, मयमत, मानसार, वास्तु राजवल्लभ, वाराहमिहिर के ज्योतिष ग्रंथ बृहत् संहिता आदि विभिन्न ग्रंथों में वास्तुशास्त्र के महत्व एवं उपयोगिता का वर्णन है।

वास्तुशास्त्र का प्रामाणिक एवं अधिकृत ग्रंथ

इसके अतिरिक्त भृगु, शुक्राचार्य और बृहस्पति जैसे अठारह महर्षियों ने इस पर विस्तृत प्रकाश डाला है। ये सभी ग्रंथ अपने आप में व्यापक हैं एवं विस्तृत वास्तु सिद्धांतों को समेटे हुए हैं परंतु मालवा के प्रसिद्ध शासक भोज परमार ने ग्यारहवीं शताब्दी में समरांगण सूत्रधार लिखा जो वास्तुशास्त्र का प्रामाणिक एवं अधिकृत ग्रंथ है।

इसमें सभी पूर्ववर्ती ग्रंथों के सिद्धांतों का समावेश है। साथ ही इसमें वास्तु दोषों के निवारण के अत्यंत सरल उपाय बताये गए हैं। ये सारे उपाय भवन को किसी तरह की क्षति पहुँचाए बगैर किए जा सकते हैं।

वास्तुशास्त्र का प्रादुर्भाव वैदिक काल

वास्तुशास्त्र का प्रादुर्भाव वैदिक काल में ही हुआ तथा वैदिक काल से तेरहवीं शताब्दी तक वास्तु कला का प्रचार-प्रसार एवं प्रयोग होता रहा परंतु इसके बाद मुगलों के आने पर इस कला का प्रचलन कम होता गया और धीरे-धीरे लुप्तप्राय हो गई किन्तु दक्षिण भारत में इस कला का प्रचलन जारी रहा।

हमारे यहां जैसे ही अंग्रेजों का शासन काल शुरू हुआ इस अद्भुत कला का ह्रास होता चला गया। लोग अपने जीवन में इसे अपनाने के बजाय ढोंग मानने लगे परन्तु आज के भौतिकता भरे जीवन में जहाँ पल-पल तनाव, परेशानियां एवं दुखः की अनुभूति हो रही है यह शास्त्र मनुष्य को सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य एवं शांति देने में सामथ्र्यवान साबित हो रहा है। इसी कारण से इस मृतप्राय शास्त्र का वर्तमान समय में हमलोग स्वागत कर रहे हैं एवं इसके सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाकर सुख समृद्धि एवं शांति की प्राप्ति कर रहे हैं।

वास्तुशास्त्र का उदय तथा उसकी संरचना सृष्टि के पंचभूतात्मक सिद्धांत पर ही आधारित है। जिस प्रकार हमारा शरीर पंचमहाभूतात्मक तत्वों से मिलकर बना है उसी प्रकार किसी भी भवन के निर्माण में पंचतत्वों का पर्याप्त ध्यान रखा जाए तो उसमें रहने वाले सुख से रहेंगे। ये पंचमहाभूत-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश है।

हमारा ब्रह्माण्ड भी इन्हीं पांच तत्वों से बना है। इसलिए कहा जाता है ‘यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे’। जिस प्रकार शरीर में इन तत्वों की कमी या अधिकता होने से व्यक्ति अस्वस्थ या रूग्ण हो जाता है उसी प्रकार भवन में इन तत्वों के असंतुलित होने से उसमें निवास करने वाले को नाना प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है।

इसके साथ ही प्रकृति के अनन्त शक्तियों में से कुछ शक्तियां हमें प्रभावित करती हैं जैसे सूर्य की स्थिति, पृथ्वी पर गुरूत्वाकर्षण शक्ति, आभामंडल की शक्तियां, चुम्बकीय शक्ति तथा विद्युत चुम्बकीय शक्ति इत्यादि। ये शक्तियां निर्माण किये गए भवन में विद्यमान रहती हैं जो मानव शरीर की विद्युत चुंबकीय शक्ति को प्रभावित करके शुभ या अशुभ फल देती हैं।

ये शक्तियां जगह-जगह पर पृथ्वी एवं मानव पर हमेशा अलग-अलग प्रभाव एवं महत्व रखती हैं। यही कारण है कि वास्तु शास्त्र सदैव प्रत्येक स्थान पर एक समान फल नहीं देता है। ऐसा परिवर्तन मानव के ग्रह नक्षत्र तथा भौगोलिक अक्षांश में परिवर्तन के कारण होता है। अन्यथा सभी भवनें एक समान ही फल देने वाली होतीं। ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां प्रकृति और हमारे
शरीर को प्रभावित करती रहती हैं।

यदि प्रकृति के विरूद्ध जाएंगे तो प्रकृति के कुप्रभाव का सामना करना पडे़गा। फलस्वरूप हमारी अवनति होगी और यदि प्रकृति के अनुरूप चलेंगे तो सुप्रभाव पड़ेगा जिसके फलस्वरूप उन्नति होगी जो समृद्धशाली एवं सुखमय जीवन के लिए सहायक होगी।

अतः यह आवश्यक है कि हम प्रकृति के अनुसार अपने जीवन को व्यवस्थित करें। वास्तुशास्त्र का सिद्धांत यह भी बतलाता है कि प्रकृति से सामंजस्य स्थापित कर भवन निर्माण किया जाए तो मनुष्य सुख-शांति एवं स्वस्थ जीवन प्राप्त करता है। वास्तुशास्त्र के संबंध में हालायुद्धकोष में कहा गया है:

वास्तु संक्षेपतो वक्ष्ये गृहादो विघ्ननाशनम्।
ईशानकोणादारभ्य ह्योकाशीतिपदे त्यजेत्।।

अर्थात् वास्तु संक्षेप में ईशान आदि कोणों से प्रारम्भ होकर गृह-निर्माण की वह कला है जो गृह में निवास करने वालों को प्राकृतिक विघ्न, उत्पातों व उपद्रवों से बचाता है।

अमर कोष के अनुसार:
”गृहरचना वच्छिन्न भूमे“

गृहरचना के योग्य अविछिन्न भूमि को वास्तु कहते है। वास्तु वह स्थान कहलाता है जिसपर कोई इमारत खडी हो अथवा घर बनाने लायक जगह को वास्तु कहते है। इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है: वास्तु वस्तु से संबंधित वह विज्ञान है जो भवन निर्माण से लेकर भवन में उपयोग की जाने वाली वस्तु के बारे में मनुष्य को बतलाता है।

इसी प्रकार मालवा के प्रसिद्ध शासक भोज परमार ने ग्यारहवीं शताब्दी में स्वरचित ग्रंथ समरांगण सूत्राधार के पहले अध्याय के पांचवें श्लोक में कहा है:

वास्तुशास्त्रादृते तस्य न स्याल्लः क्षणनिश्यचः।
तस्माल्लोकस्य कृपया शास्त्रमतेदृदीर्यते।।

अर्थात् वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों के अतिरिक्त अन्य कोई प्रकार नहीं है जिससे यह निश्चित किया जा सके कि कोई भी भवन सही निर्मित है अथवा नहीं। संक्षेप में वस्तु को सुनियोजित तरीके से रखना ही वास्तु है।

समारांगण सूत्रा धनानि बुद्धिश्च सन्तति सर्वदानृणाम्।
प्रियान्येषां च सांसिद्धि सर्वस्यात् शुभ लक्षणम्।।
यात्रा निन्दित लक्ष्मत्रा तहिते वां विधात कृत।
अथ सर्व मुपादेयं यभ्दवेत् शुभ लक्षणम्।।
देश पुर निवाश्रच सभा वीस्म सनाचि।
यद्य दीदृसमन्याश्रच तथ भेयस्करं मतम्।।

वास्तु शास्त्रादृतेतस्य न स्यल्लक्षनिर्णयः।
तस्मात् लोकस्य कृपया सभामेतंदुरीयते।।

अर्थात्, वास्तु शास्त्र के अनुसार भली भांति योजनानुसार बनाया गया घर सब प्रकार के सुख, धन-संपदा, बुद्धि, सुख-शांति और प्रसन्नता प्रदान करने वाला होता है और ऋणों से मुक्ति दिलाता है।

वास्तु की अवहेलना के परिणामस्वरूप अवांछित यात्राएं करनी पड़ती हैं, अपयश, दुख तथा निराशा प्राप्त होते हैं। सभी घर, ग्राम, बस्तियां और नगर वास्तु शास्त्र के अनुसार ही बनाये जाने चाहिए। इसलिए इस संसार के लोगों के कल्याण और उन्नति के लिए वास्तु शास्त्र प्रस्तुत किया गया है।

इसी तरह नारद संहिता में कहा गया है कि भवन में निवास करने वाले गृह स्वामी को भवन प्रत्येक रूप से शुभ फलदायक, सुख-समृद्धि प्रदाता, ऐश्वर्य, लक्ष्मी एवं धन को बढ़ाने वाला, पुत्र-पौत्रादि प्रदान करने वाला हो इसका विचार वास्तु के अंतर्गत किया जाता है।

सचमुच वास्तुशास्त्र एक गहन विषय है, इसका वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक आधार है। वास्तु के अनुसार बने भवन मंगलदायक एवं कल्याणकारी होते हैं परंतु इसके नियमों का उल्लंघन उसमें निवास करने वालों के लिए विध्वंसकारी एवं विनाशकारी होता है। वास्तु के अनुसार बने भवन मानसिक, शारीरिक एवं भावनात्मक सुख देते हैं। इसी तरह वास्तु के अनुरूप बने परिसर शांति, खुशहाली एवं समृद्धि देते हैं।

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