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सियासी ताने-बाने के बीच उलझी महागठबंधन की डोर

पटना : टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ परि जाये. बिहार की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को रहीम के दोहे के आईने में भले आप न देखें, पर बिहार के सबसे बड़े सियासी परिवार पर मंडराता राजनीतिक संकट महागठबंधन की गांठ के बीच फंसकर रह गया है. तेजस्वी यादव के भविष्य को लेकर चल रही बयानबाजी के बीच, नीतीश कुमार का एक नेशनल टीवी चैनल को दिया गया बयान काफी चर्चा में है.

उन्होंने, मंगलवार एक टीवी चैनल से कहा कि तेजस्वी के मुद्दे पर उनकी सरकार को खतरा नहीं है, लेकिन राजनीतिक जानकारों की मानें तो बिहार की सियासत में शतरंज के मोहरे बिछ चुके हैं और बहुत जल्द उसका परिणाम दिखने लगेगा. अंदर की खबरों पर गौर करें, तो यह बात निकलकर सामने आयी है कि नीतीश कुमार चाहते हैं कि सीबीआई द्वारा भ्रष्टाचार के मामले में अभियुक्त बनाये गये उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव 29 जुलाई तक स्वयं ही इस्तीफा दे दें.

वहीं दूसरी ओर, जानकार कहते हैं कि लालू यादव के लिए परिवार सर्वोपरि है. तेजस्वी यादव को लालू यादव अपनी राजनीतिक विरासत सौंपने का एलान कर चुके हैं, ऐसे में वह तेजस्वी को सुरक्षित करने के लिए हर तरह के उपाय करेंगे.

राजद के सूत्रों की मानें तो तेजस्वी मसले पर जवाब देने के लिए लालू परिवार अपने आपको तैयार कर चुका है. कानून विदों से सलाह के बाद स्वयं लालू यादव ने कमान को अपने हाथों में ले ली है. राजद के एक नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं कि नीतीश कुमार और उनकी पार्टी इस मसले पर बैकफुट पर है. महागठबंधन टूटने की स्थिति में सबसे ज्यादा नुकसान नीतीश कुमार को होगा. राजद को सहानुभूति मिलेगी.

नीतीश कुमार यह बात बखूबी जानते हैं. इतना ही नहीं, उस नेता ने कहा कि जदयू के कुछ असंतुष्ट भी लालू यादव से लगातार संपर्क में हैं. वह कहते हैं कि परिस्थितियां बदलने पर राजद बड़ा फैसला ले सकता है. क्योंकि, राजद के पास संख्या बल भी है.

राजद के नेता मानते हैं कि नीतीश कुमार का दिल्ली में दिया गया बयान से यह स्पष्ट है कि जदयू अब मामले को सलटाने के मूड में है. लगातार जदयू के प्रवक्ताओं द्वारा बयानबाजी के बाद भी तेजस्वी का पूरी मजबूती के साथ टीके रहना, कहीं न कहीं लालू की रणनीति का ही नतीजा है.

वहीं, राजनीतिक जानकार कहते हैं कि राजद नेताओं के अति विश्वास में आने का एक कारण यह भी हो सकता है कि 243 सदस्यों वाले विधान सभा में राजद के 80, कांग्रेस के 27, जदयू के 71 और भाजपा के 53 विधायक हैं. भाजपा के सहयोगियों के पांच विधायक हैं. सदन में बहुमत के लिए कुल 122 विधायकों का समर्थन होना चाहिए.

जानकारों की मानें, तो अगर नीतीश कुमार भाजपा के साथ जाते हैं, तो लालू यादव साम,दाम, दंड भेद से 15 विधायक अपने पाले में कर सकते हैं और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना लेंगे. अंदर की खबर है कि बिहार के सीमांचल से जदयू के कई विधायक पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रहे हैं, जिनकी संख्या 20 के करीब बतायी जा रही है.

कहते हैं कि राजनीति में कोई किसी का स्थायी दुश्मन या दोस्त नहीं होता. सत्ता के लिए स्वार्थ के गठबंधन होते हैं. बिहार की राजनीति में भी कुछ ऐसा घटे, इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

जानकारों की इस बात पर हाल के घटनाक्रम की मुहर भी स्पष्ट दिख रही है. जदयू के वरिष्ठ नेता शरद यादव ने तेजस्वी का खुलकर बचाव किया है. शरद यादव का बयान सामने आने के बाद भी नीतीश कुमार ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

शरद यादव ने गत वर्ष ही पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद छोड़ा है और वह लगातार महागठबंधन के समर्थन में बयान दे रहे हैं. यह भी कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का विरोध जिन प्रदेशों के अध्यक्ष ने किया, उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. जानकार, कहते हैं कि शरद यादव खुलकर लालू का समर्थन कर रहे हैं.

उधर, लालू अकेले जीतन राम मांझी और मायावती पर डोरे डाल रहे हैं. मायावती को राज्यसभा भेजने की बात कहकर, उन्होंने दलितों का दिल जीतने की कवायद शुरू कर दी है. मांझी और मायावती का राष्ट्रीय जनाधार कुछ नहीं है, लेकिन भाजपा की दलितों के बीच बढ़ती पैठ को तोड़ने के लिए लालू अभी से अपनी रणनीति पर काम कर रहे हैं.

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