सहकारी बैंकों और सोसायटी काबुली पठान और निजी साहूकारों जैसा क्रूर व्यवहार करते हैं :किसान संगठन

रायपुर।

राष्ट्रीयकृत बैंक, ग्रामीण बैंक सहित सहकारी बैंकों द्वारा केंद्र सरकार की योजना के अनुसार केसीसी के द्वारा किसानों को फसली कर्ज दिया जाता है, सहकारी बैंकों द्वारा सोसायटी के माध्यम से शून्य ब्याज पर खरीफ फसल के लिए अप्रैल माह में किसानों को कर्ज दिया जाता है जिसे मार्च माह तक जमा करने की मियाद होती है किंतु सोसायटी के माध्यम से सहकारी बैंक द्वारा किसानों को दिये गये कर्ज की राशि की वसूली नवंबर से जनवरी माह में ही कर लिया जाता है।

सरकार द्वारा सोसायटी के माध्यम से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों के धान की खरीदी नवंबर माह से जनवरी माह तक की जाती है, सरकार को बेचे गये धान की राशि सीधे किसान के खाते में जमा किया जाना चाहिए लेकिन सहकारी बैंकों द्वारा धान बिक्री की राशि सोसायटी को दी जाती है जिसमें से किसान द्वारा लिए गये कर्ज की राशि काटकर शेष राशि का भुगतान किसानों को किया जाता है।

छत्तीसगढ़ प्रगतिशील किसान संगठन के संयोजक राजकुमार गुप्त ने आरोप लगाया है कि किसानों से कर्ज वसूली के मामले में सहकारी बैंक और सोसायटी काबुली पठान और निजी साहूकार की तरह व्यवहार करते हैं और सरकारी धान खरीदी को एटीएम कार्ड या ब्लैंक चेक की तरह इस्तेमाल करते हैं।

छत्तीसगढ़ प्रगतिशील किसान संगठन के संयोजक ने आगे कहा है कि किसानों को मिलने वाले फसल बीमा और सूखा राहत की राशि को कर्ज की राशि में समायोजित करने में भी सहकारी बैंक और सोसायटी तत्परता दिखाते हैं और ऐसा करने से पहले किसानों की लिखित अनुमति प्राप्त करना भी जरूरी नहीं समझते हैं।

चूंकि किसानों को फसल बीमा और सूखा राहत की राशि का भुगतान करने की जवाबदारी देते हुए राशि सहकारी बैंक को अंतरित की जाती है इसका नाजायज फायदा सहकारी बैंक और सोसायटी द्वारा किसानों के कर्ज की वसूली करने के रूप में उठाया जाता है

छत्तीसगढ़ प्रगतिशील किसान संगठन के संयोजक राजकुमार गुप्त ने आरोप लगाया है कि खरीफ वर्ष 2017-18 में इफ्को टोकियो और रिलायन्स बीमा कंपनियों ने उपज में कमी होने के कारण किसानों को बीमा दावा राशि का भुगतान करने के लिये बैंकों को 1200 करोड़ रुपये की राशि दिया था जिसका भुगतान करने के बजाय बैंक और सोसायटी ने अधिकतर राशि का समायोजन किसानों द्वारा लिये गये कर्ज में समायोजन कर लिया जिसके कारण किसानों को 12 सौ करोड़ रुपये की कर्ज मुक्ति के लाभ से वंचित होना पड़ा है।

छत्तीसगढ़ प्रगतिशील किसान ने पिछले वर्ष बीमा दावा राशि के कर्ज की राशि में समायोजित करने की जांच करने के लिये समिति गठित करने और समायोजित की गई राशि कर्ज मुक्ति के रूप में वापस लौटाने की मांग की है ।

रायपुर।

राष्ट्रीयकृत बैंक, ग्रामीण बैंक सहित सहकारी बैंकों द्वारा केंद्र सरकार की योजना के अनुसार केसीसी के द्वारा किसानों को फसली कर्ज दिया जाता है, सहकारी बैंकों द्वारा सोसायटी के माध्यम से शून्य ब्याज पर खरीफ फसल के लिए अप्रैल माह में किसानों को कर्ज दिया जाता है जिसे मार्च माह तक जमा करने की मियाद होती है किंतु सोसायटी के माध्यम से सहकारी बैंक द्वारा किसानों को दिये गये कर्ज की राशि की वसूली नवंबर से जनवरी माह में ही कर लिया जाता है।

सरकार द्वारा सोसायटी के माध्यम से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों के धान की खरीदी नवंबर माह से जनवरी माह तक की जाती है, सरकार को बेचे गये धान की राशि सीधे किसान के खाते में जमा किया जाना चाहिए लेकिन सहकारी बैंकों द्वारा धान बिक्री की राशि सोसायटी को दी जाती है जिसमें से किसान द्वारा लिए गये कर्ज की राशि काटकर शेष राशि का भुगतान किसानों को किया जाता है।

छत्तीसगढ़ प्रगतिशील किसान संगठन के संयोजक राजकुमार गुप्त ने आरोप लगाया है कि किसानों से कर्ज वसूली के मामले में सहकारी बैंक और सोसायटी काबुली पठान और निजी साहूकार की तरह व्यवहार करते हैं और सरकारी धान खरीदी को एटीएम कार्ड या ब्लैंक चेक की तरह इस्तेमाल करते हैं।

छत्तीसगढ़ प्रगतिशील किसान संगठन के संयोजक ने आगे कहा है कि किसानों को मिलने वाले फसल बीमा और सूखा राहत की राशि को कर्ज की राशि में समायोजित करने में भी सहकारी बैंक और सोसायटी तत्परता दिखाते हैं और ऐसा करने से पहले किसानों की लिखित अनुमति प्राप्त करना भी जरूरी नहीं समझते हैं।

चूंकि किसानों को फसल बीमा और सूखा राहत की राशि का भुगतान करने की जवाबदारी देते हुए राशि सहकारी बैंक को अंतरित की जाती है इसका नाजायज फायदा सहकारी बैंक और सोसायटी द्वारा किसानों के कर्ज की वसूली करने के रूप में उठाया जाता है

छत्तीसगढ़ प्रगतिशील किसान संगठन के संयोजक राजकुमार गुप्त ने आरोप लगाया है कि खरीफ वर्ष 2017-18 में इफ्को टोकियो और रिलायन्स बीमा कंपनियों ने उपज में कमी होने के कारण किसानों को बीमा दावा राशि का भुगतान करने के लिये बैंकों को 1200 करोड़ रुपये की राशि दिया था जिसका भुगतान करने के बजाय बैंक और सोसायटी ने अधिकतर राशि का समायोजन किसानों द्वारा लिये गये कर्ज में समायोजन कर लिया जिसके कारण किसानों को 12 सौ करोड़ रुपये की कर्ज मुक्ति के लाभ से वंचित होना पड़ा है।

छत्तीसगढ़ प्रगतिशील किसान ने पिछले वर्ष बीमा दावा राशि के कर्ज की राशि में समायोजित करने की जांच करने के लिये समिति गठित करने और समायोजित की गई राशि कर्ज मुक्ति के रूप में वापस लौटाने की मांग की है ।

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