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कोरोना: बिहार में सबसे कम डॉक्टर, पर सबसे ज़्यादा डॉक्टरों की मौत

डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ़ नहीं होने की यह समस्या केवल समस्तीपुर के एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की नहीं है

बिहार: बिहार के समस्तीपुर ज़िले के सिंधिया प्रखंड के ग्राम पंचायत बारी में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में पिछले 20 सालों से ना तो कोई चिकित्सक है और ना ही कोई कर्मचारी.

पंचायत के लोग बताते हैं साल 2020 तक वहां चिकित्सक भी थे और कर्मचारी भी. लेकिन उसके बाद फिर कभी कोई नहीं आया.कोरोना वायरस से फैली महामारी की स्थिति में पंचायत के लोगों ने स्थानीय अधिकारियों से कई बार इसकी शिकायत की. हर बार जवाब मिलता है कि यहां कोई पदस्थापना ही नहीं है.

बारी पंचायत के शुभम झा और शशिभूषण झा ने स्वास्थ्य केंद्र पर डॉक्टरों की ड्यूटी लगाने की मांग करते हुए समस्तीपुर के डीएम को भी आवेदन भी दिया. मगर अब तक वहां डॉक्टरों की तैनाती नहीं हो सकी है.

पूरे बिहार का यही हाल

डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ़ नहीं होने की यह समस्या केवल समस्तीपुर के एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की नहीं है. स्टेट हेल्थ सोसाइटी, बिहार के आंकडों की मानें तो राज्य के 534 प्राथमिक संवास्थ्य केंद्रों में से एक भी चालू हालत में नहीं है.

रेफ़रल अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या 466 है, मगर कार्यरत सिर्फ 67 हैं. ऐसा ही हाल अनुमंडल अस्पतालों और सदर अथवा जिला अस्पतालों का भी है. राज्य के 13 मेडिकल कॉलेजों में से भी केवल 10 ही फंक्शनल है.

2011 की जनगणना के हिसाब से देखें तो स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों की जरूरत लगभग दुगनी ज़्यादा हैं. लेकिन यहां जरूरतों की बात करना भी बेमानी लगता है! जो केंद्र और अस्पताल पहले से हैं वे भी नहीं चल पा रहे हैं क्योंकि डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ़ की 60 फीसदी से भी अधिक कमी है.

बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने इसी साल मार्च 2020 में विधानसभा के अंदर राजद के विधायक शिवचंद्र राम की तरफ से उठाए गए प्रश्न का जवाब देते हुए कहा था, “राज्य में चिकित्सा पदाधिकारी के कुल स्वीकृत पद 10609 हैं. जिसमें से 6437 पद रिक्त हैं. यानी 61 प्रतिशत जगहें खाली हैं.

केवल डॉक्टर ही नहीं राज्य में मेडिकल स्टाफ़ और नर्सों की भी भारी कमी है. यहां स्टाफ़ नर्स ग्रेड के कुल स्वीकृत पद 14198 हैं, लेकिन कार्यरत बल महज 5068 है. एनएनएम नर्स के भी 10 हज़ार से अधिक पदें खाली हैं.

28 हज़ार 391 लोगों पर सिर्फ़ एक डॉक्टर

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक प्रति एक हज़ार की आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए. इंडियन मेडिकल काउंसिल भी कहता है कि 1681 लोगों के लिए एक डॉक्टर की आवश्यकता है. इस लिहाज से 2011 की जनगणना के मुताबिक बिहार में एक लाख से अधिक डॉक्टर होने चाहिए.

राज्य के सबसे बड़े कोरोना अस्पताल एनएमसीएच की रिपोर्टिंग के दौरान अस्पताल के सुपरिटेंडेंट ने बताया था कि एनेस्थेशिया विभाग में कोई भी एक सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर नहीं है जबकि पद सृजित 25 हैं. पटना मेडिकल कॉलेज में भी 40 फ़ीसदी डॉक्टरों की कमी है. दरभंगा मेडिकल कॉलेज में भी 50 फ़ीसदी डॉक्टरों की कमी है.

राज्य में डॉक्टरों के जो स्वीकृत पद हैं वे राज्य के अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों के आधार पर बनाए गए हैं. गौरतलब है कि अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों की संख्या आधी से भी कम है.

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