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कई बार ब्रेक-अप के बाद बदला लेने के लिए महिलाएं लगा देती हैं रेप का आरोप- हाई कोर्ट

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि जब कोई संबंध टूटता है तब महिलाएं आपसी सहमति से बनाए गए अपने शारीरिक संबंधों को बलात्कार की घटनाएं करार देती हैं। गुरुवार (27 जुलाई) को उच्च न्यायालय ने बलात्कार के एक मामले में एक सरकारी अधिकारी को बरी किए जाने के निचली अदालत के फैसले को कायम रखते हुए यह कहा। न्यायमूर्ति प्रतिभा रानी ने 29 वर्षीय महिला की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। महिला ने हाल ही में अपने पति के खिलाफ घरेलू हिंसा का एक मामला दायर करते हुए बलात्कार के एक मामले में उसके खिलाफ अभियोजन की मांग की थी। महिला ने बलात्कार का यह मामला इस व्यक्ति से 2015 में शादी करने से पहले दर्ज कराया था।

महिला ने उच्च न्यायालय का रूख कर निचली अदालत के मार्च 2016 के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के तहत महिला के पति को बरी किया गया था। अदालत ने कहा कि इसने कई मामलों में कहा है कि दो लोग अपनी इच्छा और पसंद से आपसी शारीरिक संबंध बनाते हैं और जब किसी कारण से संबंध टूट जाता है तब महिलाएं निजी प्रतिशोध के औजार के तौर पर कानून का इस्तेमाल करती हैं। न्यायाधीश प्रतिभा रानी ने अपने फैसले में कहा, “वो गुस्से और हताशा के कारण सहमति के संबंधों को बलात्कार बता देती हैं इसलिए इस कानून का मूल मकसद ही कुंद हो जाता है। बलात्कार और सहमति से बने शारिरिक संबंध के बीच साफ विभाजन रेखा होनी चाहिए, खासकर तब जब मामला शादी का झांसा देकर बलात्कार करने से जुड़ा हो।”

महिला ने जिस व्यक्ति पर बलात्कार का आरोप लगाया था उसे निचली अदालत ने बरी कर दिया था क्योंकि महिला अपने बयान से मुकर गई थी।

एफआईआर दर्ज करने के बाद महिला और पुरुष दोनों हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में एफआईआर रद्द करने की अपील कर चुके थे। दोनों का कहना था कि वो शादी करना चाहते हैं इसलिए एफआईआर रद्द की जाए। हालांकि दोनों अदालतों ने उनकी याचिका ठुकरा दी थी। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका ठुकराए जाने के बाद मुकदमा चला और महिला ने पुरुष के खिलाफ गवाही नहीं दी। हाई कोर्ट ने कहा कि चूंकि महिला पीड़िता और एकमात्र गवाह है तो उसके बयान बदलने के बाद अदालत के पास पुरुष को छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

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